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अमेरिका का जर्मनी से 5,000 सैनिक हटाने का फैसला: NATO के लिए क्यों है चेतावनी, यूरोप पर बढ़ेगा दबाव

अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिक हटाने का फैसला लिया है. यह फैसला आने वाले महीनों में नाटो के भीतर नए तनाव को जन्म दे सकता है. यूरोप पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव और बढ़ेगा. साथ ही, अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच भरोसे की खाई भी गहरी हो सकती है.

अमेरिका का जर्मनी से 5,000 सैनिक हटाने का फैसला: NATO के लिए क्यों है चेतावनी, यूरोप पर बढ़ेगा दबाव

अमेरिका द्वारा जर्मनी से करीब 5,000 सैनिक हटाने का फैसला महज एक सैन्य पुनर्संतुलन नहीं, बल्कि बहुस्तरीय राजनीतिक संदेश है. पेंटागन ने इसे 'रणनीतिक समीक्षा' का हिस्सा बताया है, लेकिन इसके पीछे डोनाल्ड ट्रंप की पुरानी नीतियों, यूरोप के साथ तनाव और बदलते वैश्विक समीकरण साफ झलकते हैं. यह कदम सीधे तौर पर NATO की एकता, यूरोप की सुरक्षा और अमेरिका की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करता है.

नाटो को सीधा संदेश: खुद की सुरक्षा खुद संभालो

जर्मनी से सैनिकों की वापसी को नाटो सहयोगियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी माना जा रहा है. लंबे समय से अमेरिका यह कहता रहा है कि यूरोपीय देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे. ट्रंप प्रशासन बार-बार इस बात पर जोर देता रहा है कि अमेरिका पर अनुचित बोझ डाला जा रहा है.

इस फैसले के जरिए वॉशिंगटन ने संकेत दिया है कि अब यूरोप को अपनी सुरक्षा जिम्मेदारियों को खुद उठाना होगा. खासकर ऐसे समय में जब रूस-यूक्रेन वॉर ने महाद्वीप की सुरक्षा चिंताओं को और गहरा कर दिया है.

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ईरान-इजरायल तनाव और जर्मनी से खटास

हालिया ईरान-इजरायल-यूएस जंग के दौरान जर्मनी का रुख अमेरिका से पूरी तरह मेल नहीं खाता दिखा. जर्मन नेतृत्व, खासतौर पर चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने अमेरिकी नीतियों की आलोचना की थी. यही वजह मानी जा रही है कि सैनिकों की वापसी केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक दबाव का भी हिस्सा है. अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि उसके फैसलों से असहमति की कीमत चुकानी पड़ सकती है.

ट्रंप डॉक्ट्रिन की वापसी

डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी जर्मनी से सैनिक हटाने की योजना सामने आई थी. उस समय इसे रोक दिया गया था, लेकिन अब वही सोच फिर सक्रिय दिख रही है, 'America First'. इस नीति के तहत अमेरिका अपने संसाधनों को वहां से हटाना चाहता है जहां उसे तत्काल रणनीतिक लाभ नहीं दिखता. यूरोप, खासकर जर्मनी, अब इस प्राथमिकता सूची में नीचे जाता दिख रहा है.

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फोकस शिफ्ट: यूरोप से इंडो-पैसिफिक की ओर

अमेरिका की वैश्विक रणनीति अब तेजी से बदल रही है. चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए वॉशिंगटन का ध्यान Indo-Pacific की ओर शिफ्ट हो रहा है. जर्मनी से सैनिक हटाना इसी बड़े बदलाव का हिस्सा माना जा रहा है. अमेरिका अपने सैन्य संसाधनों को एशिया और मध्य पूर्व जैसे अधिक 'हॉटस्पॉट' इलाकों में केंद्रित करना चाहता है.

जर्मनी में अमेरिकी मौजूदगी: कितना बड़ा असर?

वर्तमान में जर्मनी में लगभग 36,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. इनमें से करीब 14% सैनिकों की वापसी प्रस्तावित है. रामस्टीन एयरबेस जैसे अहम ठिकाने अमेरिका के लिए यूरोप, मध्य पूर्व और अफ्रीका में ऑपरेशंस का केंद्र हैं. इसके अलावा यूरोप और अफ्रीका कमांड का मुख्यालय भी यहीं स्थित है. ऐसे में सैनिकों की कटौती भले सीमित लगे, लेकिन इसका प्रतीकात्मक और रणनीतिक असर काफी बड़ा है.

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यूक्रेन युद्ध के बाद बदला संतुलन

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप पहले ही असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है. ऐसे समय में अमेरिकी सैनिकों की कमी नाटो की सामूहिक रक्षा क्षमता पर सवाल खड़े कर सकती है. यूरोपीय देशों को अब अपनी सैन्य क्षमताओं को तेजी से मजबूत करना होगा, वरना रूस जैसे प्रतिद्वंद्वियों के सामने उनकी स्थिति कमजोर पड़ सकती है.

यूरोप पर दबाव और नाटो में दरार?

यह फैसला आने वाले महीनों में नाटो के भीतर नए तनाव को जन्म दे सकता है. यूरोप पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव और बढ़ेगा. साथ ही, अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच भरोसे की खाई भी गहरी हो सकती है. संकेत साफ है कि अमेरिका अब “सुरक्षा प्रदाता” की भूमिका सीमित करना चाहता है और अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

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