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अमेरिका ने ईरान पर किया ऐतिहासिक जीत का दावा, लेकिन क्या ये है पूरी सच्चाई? जानें इस सीजफायर के 5 बड़े सच

मिडिल ईस्ट जमग में क्या वाकई अमेरिका अपने सभी लक्ष्यों में कामयाब रहा है? इस सीजफायर की 5 बड़ी सच्चाइयां, जो पर्दे के पीछे की कुछ अलग ही कहानी बयां करती हैं.

अमेरिका ने ईरान पर किया ऐतिहासिक जीत का दावा, लेकिन क्या ये है पूरी सच्चाई? जानें इस सीजफायर के 5 बड़े सच
क्या अमेरिका ने युद्ध में अपने लक्ष्य हासिल किए?
  • मिडिल ईस्ट में 40 दिन की जंग के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता से ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर हुआ है
  • होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण बना रहा और अमेरिका ने इसे खोलने का स्पष्ट तरीका नहीं बताया है
  • ट्रंप के सत्ता परिवर्तन के दावे के बावजूद ईरान में कट्टरपंथी नेतृत्व अभी भी सत्ता में है
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मिडिल ईस्ट में 40 दिन की भीषण जंग के बाद आखिरकार ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर पर सहमति बन गई. यह युद्धविराम पाकिस्तान की मध्यस्थता के बाद हुआ. वहीं आगे की बातचीत के लिए इस्लामाबाद में मेज सज चुकी है. लेकिन इस बातचीत से पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ पूरी जीत का दावा कर दिया. वहीं अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका ने अपने सभी सैन्य लक्ष्य हासिल कर लिए हैं. उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिका ने ईरान की नेवी और एयरफोर्स को तबाह कर दिया. इजरायल से भी जीत की एक कहानी सामने आई. इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस संघर्ष को अस्तित्व का संकट बताया और घोषणा की कि अब ईरान से ऐसा कोई खतरा नहीं है. लेकिन असल में इस युद्ध से अमेरिका और इजरायल ने क्या हासिल किया और क्या हासिल करने में नाकाम रहे? आइए समझते हैं.

आखिर क्या थे अमेरिका के लक्ष्य?

करीब 40 दिनों चली इस जंग के दौरान ट्रंप ने ईरान में अपने टारगेट को लेकर कई विरोधाभासी बयान दिए हैं. ट्रंप कभी बोले कि वो ईरान के परमाणु प्रोग्राम को रोकना चाहते हैं तो कभी बोले कि उन्हें ईरान की सैन्य क्षमताओं को तबाह करना है और सत्ता परिवर्तन करना है. इसके अलावा होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान के कंट्रोल का नया विवाद भी उभरा, जो युद्ध से पहले मौजूद नहीं था. अगर इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता में सीजफायर बना रहता है, तो इस जंग के लिए ट्रंप के ज्यादातर दावे अधूरे ही नजर आते हैं. क्योंकि ईरान की परमाणु प्रोग्राम को रोकने या उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करने के दावे अभी भी अनसुलझे सवाल बने हुए हैं.

1. होर्मुज की चाबी अभी भी ईरान के पास

इसके साथ ही सीजफायर डील की घोषणा करते हुए अमेरिका ने कहा कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट खोलने के लिए राजी हो गया है. लेकिन स्थिति तो युद्ध से पहले भी थी ही. ईरान ने 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद ही होर्मुज को बंद किया था, ताकि अमेरिका पर दबाव बनाया जा सके. ईरान के इस अहम रास्ते को बंद करने से पूरी दुनिया में तेल और गैस की कीमतें बढ़ गईं. इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर समझौते के तहत, इस अहम जलमार्ग पर तेहरान का ही कंट्रोल बना रहेगा. X पर जारी एक बयान में, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने कहा कि तेहरान इस जलमार्ग पर अपने सैन्य ऑपरेशन रोकने और जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने की गारंटी देने के लिए तैयार है, बशर्ते अमेरिका अपने हमले रोक दे.

दूसरी ओर अमेरिका ने इस बारे में कोई खास जानकारी नहीं दी कि होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा कैसे खोला जाएगा या वहां से गुजरने का इंतजार कर रहे करीब 2,000 जहाज कितनी जल्दी आगे बढ़ना शुरू करेंगे. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में, ट्रंप ने बस इतना कहा कि अमेरिका 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की भीड़ को कम करने में मदद करेगा' और अमेरिकी सेनाएं वहीं आस-पास मौजूद रहेंगी, ताकि यह पक्का हो सके कि सब कुछ ठीक-ठाक हो जाए. मुझे पूरा भरोसा है कि ऐसा ही होगा.

अटलांटिक काउंसिल के ग्लोबल एनर्जी सेंटर के नॉन-रेजिडेंट सीनियर फेलो इयान राल्बी के मुताबिक, एक ऐसा सीजफायर, जिसमें स्ट्रेट पर ईरान का ही कंट्रोल बना रहता है, युद्ध से पहले की स्थिति के मुकाबले ज्यादा बुरा नतीजा है. NPR से बात करते हुए उन्होंने कहा कि इससे तेहरान काफी मजबूत स्थिति में आ गया है. कुछ मायनों में, यह होर्मुज पर ईरान के कंट्रोल को वैधता देता है. अब ईरान इस स्थिति में है कि वह इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए और भी ज्यादा सक्रियता से कर सकता है.

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2. क्या सच में हुआ सत्ता परिवर्तन?

डोनाल्ड ट्रंप ने युद्ध के दौरान कई बार ईरान में शासन बदलने की बात कही थी. उनका दावा है कि ईरान में पूरी तरह से सत्ता परिवर्तन हो चुका है और अब वहां कम कट्टरपंथी लोग सत्ता में हैं. लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. सत्ता अभी भी उसी शासन के पास है और अब कमान पूर्व अयातुल्ला के बेटे के हाथों में है, जिन्हें पहले से भी ज्यादा कट्टरपंथी माना जाता है. विदेश मंत्रालय के पूर्व सीनियर अधिकारी डैनियल बेनाइम के मुताबिक, ईरान का नेतृत्व शायद बदल गया हो, लेकिन नीतियों में किसी भी तरह के बदलाव के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं.

3. सैन्य ताकत का खात्मा या सिर्फ एक दावा?

अमेरिका का दावा है कि उसने ईरान की सैन्य क्षमताओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है. रक्षा सचिव हेगसेथ के मुताबिक, ईरान की नौसेना अब समुद्र की गहराई में है, वायुसेना का सफाया हो गया है और उनका ड्रोन व मिसाइल कार्यक्रम तबाह हो चुका है. हालांकि, अमेरिकी सेना के पूर्व जनरल जोसेफ वोटेल इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि ईरान की सैन्य क्षमता को भारी झटका जरूर लगा है, लेकिन उनकी सेना अभी भी सक्रिय है और वह इजरायल, खाड़ी देशों और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर लगातार हमले कर रही है.

4. परमाणु कार्यक्रम- अब खतरा कम हुआ या बढ़ गया?

युद्ध का एक बड़ा लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना था. युद्ध की शुरुआत में अमेरिकी-इजरायली हमलों में मारे गए ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने परमाणु हथियारों के खिलाफ 'फतवा' जारी किया हुआ था. लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के प्रोफेसर शिबली तेलहामी का मानना है कि खामेनेई की मौत के साथ ही फतवा भी खत्म हो गया है. उत्तर कोरिया जैसे देशों का उदाहरण देखते हुए, अब ईरान के नए नेतृत्व के पास अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार विकसित करने की पहले से कहीं ज्यादा बड़ी वजह मौजूद है.

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5. बातचीत की मेज पर ईरान का पलड़ा भारी

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस सीजफायर ने ईरान को बातचीत के लिए एक मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है. अब ईरान इस संघर्ष विराम की आड़ में अमेरिका पर अपने प्रतिबंध हटाने, लेबनान जैसे अन्य संघर्षों को समाप्त करने और युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए वित्तीय मुआवजे जैसी बड़ी मांगें मनवाने का दबाव डाल सकता है.

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