सिंगापुर अपनी सख्त कानून व्यवस्था के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है और अब यहां के स्कूलों में अनुशासन को लेकर एक नया और कड़ा नियम लागू होने जा रहा है. सिंगापुर की सरकार ने साफ कर दिया है कि स्कूलों में बदमाशी और गंभीर अनुशासनहीनता को रोकने के लिए अब 9 साल तक के बच्चों को भी बेंत या छड़ी से सजा दी जा सकेगी. शिक्षा मंत्री डेसमंड ली ने संसद में इस नए फ्रेमवर्क की पुष्टि करते हुए बताया कि अगर अनुशासन के अन्य सभी तरीके फेल हो जाते हैं, तो स्कूल इस कदम को उठा सकते हैं.
यह नया नियम साल 2027 से पूरे सिंगापुर के स्कूलों में प्रभावी होगा. सरकार का मानना है कि अनुशासन बनाए रखने के लिए बच्चों को उनके किए की गंभीरता का एहसास कराना जरूरी है. हालांकि, इस फैसले ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और मानवाधिकारों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है.
सिर्फ लड़कों को मिलेगी सजा, लागू होंगे कड़े नियम
सिंगापुर सरकार ने यह भी साफ किया है कि स्कूल अपनी मर्जी से जब चाहे तब किसी बच्चे को छड़ी नहीं मार सकते. इसके लिए बेहद सख्त प्रोटोकॉल तैयार किए गए हैं. शिक्षा मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, छड़ी की सजा केवल छात्रों (लड़कों) के लिए ही तय की गई है; लड़कियों को यह सजा नहीं दी जाएगी. इसके साथ ही, यह सजा तभी दी जा सकती है जब छात्र ने कोई बहुत गंभीर अपराध किया हो.
सजा देने से पहले स्कूल के प्रिंसिपल की अनुमति अनिवार्य होगी और यह काम केवल वही शिक्षक कर पाएंगे जिन्हें इसके लिए अधिकृत किया गया है. सजा देने से पहले बच्चे की परिपक्वता और उसकी गलती की गंभीरता का पूरा आकलन किया जाएगा.
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क्या छड़ी से सुधरेंगे बच्चे, सरकार का तर्क क्या है?
सिंगापुर की संसद में उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए डेसमंड ली ने कहा कि रिसर्च से पता चलता है कि जब बच्चों के सामने स्पष्ट सीमाएं और सख्त परिणाम होते हैं, तो वे बेहतर विकल्प चुनना सीखते हैं. उनका दावा है कि इस कदम से स्कूलों में बुलिंग की घटनाओं में कमी आएगी. सरकार का मानना है कि यह सजा बच्चों को उनकी गलती का एहसास कराने और उन्हें भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बनाने में मदद करेगी.
दूसरी ओर, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस तरह की सजाओं का कड़ा विरोध किया है. अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट में WHO ने कहा है कि शारीरिक दंड का बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, जो जीवनभर उनके साथ रह सकता है. वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि इस तरह की सजा के जोखिम ज्यादा हैं और फायदे न के बराबर हैं.
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