- सोवियत रूस के पास B-4 Howitzer नाम की एक ऐसी तोप थी, जिसका नाम सुनकर ही दुश्मन के पसीने छूट जाते थे
- जबरदस्त मारक क्षमता की वजह से जर्मन सैनिक इसे 'स्टालिन का स्लेजहैमर' यानी 'स्टालिन का हथौड़ा' कहते थे
- B-4 Howitzer को करीब 10 मील दूर तक निशाना साधने के लिए बनाया गया था
रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ता तनाव... आज दुनिया में हथियारों की ताकत सबसे ज्यादा चर्चा में है. हर देश अपने सबसे खतरनाक हथियारों का दम दिखा रहा है. लेकिन आज से करीब 7-8 दशक पहले एक ऐसी तोप थी, जिसका नाम सुनकर ही दुश्मन के पसीने छूट जाते थे. यह थी सोवियत संघ की बी-4 हॉवित्जर (B-4 Howitzer) तोप. इसकी जबरदस्त मारक क्षमता की वजह से जर्मन सैनिक इसे 'स्टालिन का स्लेजहैमर', यानी 'स्टालिन का हथौड़ा' कहते थे. वैसे यह हथियार एक इमारत के सामने हार गया था. चलिए आपको इसकी कहानी सुनाते हैं.
फिनलैंड से बर्लिन तक 'स्टालिन के हथौड़े' ने बरपाया कहर
बी-4 हॉवित्जर को करीब 10 मील दूर तक निशाना साधने के लिए बनाया गया था. लेकिन 1945 में बर्लिन की लड़ाई के दौरान सोवियत सेना ने इसकी तैनाती बिल्कुल अलग तरीके से की. तोप को जर्मन ठिकानों के बेहद करीब ले जाया गया और वहां से सीधे इमारतों पर गोले दागे गए. इसका एक गोला करीब 220 पाउंड का होता था, जो एक ही हमले में पूरी इमारत को मिट्टी में मिलाने की ताकत रखता था. अप्रैल 1945 तक सोवियत सेना इन 17 टन वजनी तोपों से बर्लिन में जर्मन ठिकानों को एक-एक ब्लॉक करके तबाह कर रही थी.
Soviet 203mm howitzer M1931 heavy guns in action on the streets of Berlin in the final days of WWII in Europe pic.twitter.com/KEiSLGbUSx
— hw97karbine (@hw97karbine) July 26, 2026
बी-4 ने सबसे पहले 1939 में फिनलैंड के खिलाफ युद्ध में अपनी ताकत दिखाई. मैनरहाइम लाइन के मजबूत कंक्रीट बंकर इसके गोलों के सामने टिक नहीं पाए. धमाकों के बाद वहां सिर्फ मुड़े-तुड़े लोहे और टूटे कंक्रीट का ढेर बचता था. सोवियत सैनिक इन खंडहरों को मजाक-मजाक में 'करेलियन स्कल्पचर' कहकर बुलाने लगे. दरअसल, करेलियन स्कल्पचर रूस के करेलिया गणराज्य की पारंपरिक और आधुनिक मूर्तिकला शैली का नाम है, जो वहां की लकड़ी, ग्रेनाइट पत्थरों और लोक कथाओं से प्रेरित होती है.
लेकिन एक इमारत के सामने बेबस हो गई यह तोप
इतनी तबाही मचाने वाली बी-4 हॉवित्जर भी आखिरकार एक ऐसी इमारत के सामने बेअसर साबित हुई, जिसे वह ढहा नहीं सकी. यह थी जू फ्लैक टावर. इसकी दीवारें 8 फीट से भी ज्यादा मोटे मजबूत कंक्रीट की थीं. 1940-41 के बीच बने इस टावर कॉम्प्लेक्स में जी-टॉवर (कॉम्बैट टॉवर) और एल-टॉवर (कंट्रोल टॉवर) शामिल थे. जी-टॉवर पर चार 128 मिमी FlaK 40 डुअल-माउंट एंटी-एयरक्राफ्ट गन तैनात थीं, जिन्हें उस समय दुनिया की सबसे ताकतवर तोपों में से एक गिना जाता था. इनके अलावा कई छोटे कैलिबर के हथियार भी यहां मौजूद थे.
बी-4 हॉवित्जर ने इस टावर पर बेहद करीब से लगातार 203 मिमी के गोले बरसाए. लेकिन इतनी गोलाबारी के बावजूद वह पूरी इमारत को नहीं गिरा सकी. सिर्फ इसका एक कोना ही क्षतिग्रस्त हो पाया. टावर के अंदर मौजूद जर्मन सैनिक आखिर तक डटे रहे और उन्होंने तब तक हथियार नहीं डाले, जब तक पूरे जर्मनी ने सरेंडर नहीं कर दिया. यानी जिस बी-4 हॉवित्जर ने फिनलैंड के मजबूत बंकरों को तोड़ दिया, बर्लिन के कई ठिकानों को मलबे में बदल दिया, उसी ताकतवर हथियार को आखिरकार एक ऐसी इमारत मिली, जिसे वह कभी नहीं गिरा सका. शायद यही वजह है कि आज भी बी-4 हॉवित्जर की कहानी सैन्य इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानियों में गिनी जाती है.
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