- रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने ग्रैंड प्रिंस दिमित्री डोंस्कोय के दाहिने हाथ के अवशेष को यूक्रेन भेजा है
- पुतिन ने अगस्त में डोंस्कोय के अवशेषों का निरीक्षण किया और युद्ध के समर्थन में चर्च ने यह कदम उठाया है
- दिमित्री डोंस्कोय ने अपने शासनकाल में क्रेमलिन का निर्माण कराया और मॉस्को की सीमाओं का विस्तार किया था
रूस का एक हीरो, रियल राजकुमार. जिसके हौसले और युद्ध कौशल के सारे रूसी दीवाने हैं. यहां तक की रूसी ऑर्थोडेक्स चर्च उन्हें संत का दर्जा तक दे चुका है. अब यूक्रेन में लड़ रहे अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उसी प्रिंस के दाहिने हाथ के अवशेष को चर्च ने भेजा है. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के युद्ध के समर्थन में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने यह नया कदम उठाया है.
ग्रैंड प्रिंस दिमित्री डोंस्कोय का ताबूत इस गर्मी में क्रेमलिन के अंदर मॉस्को के कैथेड्रल ऑफ द आर्कएंजेल में मरम्मत के काम के दौरान मिला था. डोंस्कोय की मौत 1389 में हुई थी और रूसी राष्ट्रवादी उन्हें 1380 की कुलिकोवो की लड़ाई में मंगोल गोल्डन होर्ड को हराने के लिए बहुत सम्मान देते हैं. पुतिन ने अगस्त में व्यक्तिगत रूप से उन अवशेषों का निरीक्षण किया, जिन्हें विशेषज्ञों ने राजकुमार के अच्छी तरह से संरक्षित अवशेष बताया था. रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च ने इस पूरे संघर्ष के दौरान पुतिन का समर्थन किया है. चर्च ने कहा कि उसने डोंस्कोय के दाहिने हाथ का एक टुकड़ा डोनेट्स्क भेजा है. डोनेट्स्क उन चार यूक्रेनी क्षेत्रों में से एक है जिन्हें पुतिन ने 2022 में रूस में शामिल करने का दावा किया था.
कौन थे दिमित्री डोंस्कोय
दिमित्री डोन्स्कॉय का जन्म 1350 में रूस के मॉस्को में हुआ था. उनकी मौत 19 मई 1389 को मॉस्को में हुई थी. दिमित्री मॉस्को के ग्रैंड प्रिंस इवान 'द फेयर' और उनकी दूसरी पत्नी एलेक्जेंड्रा वासिलीवना वेल्यामिनोवा (जो मॉस्को के मेयर की बेटी थीं) के बेटे थे. नौ साल की उम्र में दिमित्री अनाथ हो गए और मॉस्को रियासत की गद्दी पर बैठे. इवान की वसीयत के अनुसार, दिमित्री के नाबालिग होने के दौरान मेट्रोपॉलिटन एलेक्सी ने रीजेंट (कार्यवाहक शासक) के तौर पर काम करने लगे.
दिमित्री के शुरुआती शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना मॉस्को क्रेमलिन का निर्माण शुरू करना था. यह 1367 में पूरा हुआ. इस नए किले की वजह से, लिथुआनिया-मॉस्को युद्ध (1368–1372) के दौरान शहर लिथुआनिया के एल्गिर्डास द्वारा डाले गए दो घेरों का सामना करने में सफल रहा. यह युद्ध ल्युबुत्स्क की संधि के साथ समाप्त हुआ. 1375 में, दिमित्री ने व्लादिमीर को लेकर त्वेर के मिखाइल द्वितीय के साथ चल रहे विवाद को अपने पक्ष में सुलझा लिया. उत्तर-पूर्वी रूस की रियासतों के अन्य राजकुमारों ने उनके अधिकार को स्वीकार किया और होर्ड के खिलाफ होने वाले संघर्ष के लिए सैनिक भेजे. अपने शासनकाल के अंत तक, दिमित्री ने मॉस्को रियासत के इलाके को दोगुने से भी ज्यादा बढ़ा दिया था.
मंगोलों के साथ की भीषण लड़ाई
दिमित्री के तीस साल के शासनकाल के दौरान रूस पर मंगोलों का दबदबा कमजोर पड़ने लगा. आपसी लड़ाई और सत्ता के लिए परिवार के अंदर की खींचतान की वजह से मंगोल साम्राज्य का एक हिस्सा बहुत कमजोर हो गया था. दिमित्री ने मंगोलों की कमजोर होती पकड़ का फायदा उठाया और खुलकर तातारों को चुनौती दी. हालांकि उनके पास पूरे रूस से टैक्स इकट्ठा करने के लिए अधिकार-पत्र था, लेकिन दिमित्री मंगोलों के खिलाफ पहली रूसी सैन्य जीत का नेतृत्व करने के लिए भी जाने जाते हैं. मंगोल जनरल और गद्दी के दावेदार ममाई ने अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करने के लिए दिमित्री को सजा देने की कोशिश की. 1378 में, ममाई ने एक मंगोल सेना भेजी, लेकिन 'वोज़्हा नदी की लड़ाई' में दिमित्री की सेना ने उसे हरा दिया.
दो साल बाद, ममाई ने खुद मॉस्को के खिलाफ एक बड़ी सेना का नेतृत्व किया. जब दिमित्री डोंस्कोय 'कुलिकोवो के मैदान' में तातारों से लड़ने गए, तो सर्गियस ऑफ रैडोनेज ने उन्हें आशीर्वाद दिया, लेकिन ऐसा तभी किया जब उन्हें यकीन हो गया कि दिमित्री ने झगड़े को सुलझाने के सभी शांतिपूर्ण तरीके अपना लिए हैं. सर्गियस ने रूसी सेना में शामिल होने के लिए दो योद्धा भिक्षुओं अलेक्जेंडर पेरेसवेट और उनके दोस्त रोडियन ओस्ल्याब्या को भेजा. कुलिकोवो की लड़ाई की शुरुआत दो योद्धाओं के बीच आमने-सामने की लड़ाई से हुई.
आखिरकार, दिमित्री ने मंगोलों को हरा दिया. जीत के लिए आभार जताते हुए, दिमित्री ने डुबेन्का नदी पर 'डॉर्मीशन मठ' की स्थापना की और मारे गए योद्धाओं की कब्रों पर 'होली थियोटोकोस के जन्म' (वर्जिन मैरी के जन्म) के सम्मान में एक चर्च बनवाया. 1389 में मॉस्को में अपनी मौत के समय, दिमित्री पहले ऐसे ग्रैंड ड्यूक थे जिन्होंने खान से सलाह लिए बिना ही अपने बेटे, मॉस्को के वासिली प्रथम को अपनी उपाधियाँ सौंप दी थीं.
तो प्रिंस क्यों कहलाए राजा क्यों नहीं
दिमित्री डोंस्कोय को राजा नहीं बल्कि 'ग्रैंड प्रिंस' (महान राजकुमार या वेलिकी क्न्याज़) इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उस समय के रूसी राजनीतिक ढांचे में 'राजा' या 'जार' की पदवी अस्तित्व में ही नहीं थी और संप्रभुता के नियम अलग थे. उस दौर में केवल मंगोल खान को ही सर्वोच्च सम्राट या 'जार' का दर्जा प्राप्त था. रूसी राजकुमारों को शासन करने का अधिकार पत्र खान से ही मिलता था. रूस के किसी शासक द्वारा आधिकारिक रूप से 'जार' की उपाधि 1547 में अपनाई गई, जब दिमित्री डोंस्कोय के परपोते के बेटे इवान चतुर्थ का राज्याभिषेक हुआ.
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