- शी जिनपिंग का भारत दौरा सात वर्षों बाद हो रहा है और दोनों देशों के बीच रिश्तों को सुधारने पर ध्यान केंद्रित है
- भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाएं क्रमशः तीसरी और दूसरी सबसे बड़ी हैं, और व्यापार 151 अरब डॉलर से अधिक हो गया है
- सीमा विवाद को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर और उच्च स्तरीय प्रतिनिधि वार्ताएं लगातार जारी हैं
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट के लिए भारत दौरे पर आ रहे हैं. यह सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि जिनपिंग का दौरा सात साल बाद हो रहा है या शी जिनपिंग 2023 में भारत की अध्यक्षता में हुए जी 20 समिट में नहीं आए थे और अब आ रहे हैं, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण है कि भारत और चीन पहली बार वैचारिक तौर पर एक-दूसरे की ताकत को पहचानते हुए रिश्तों को सुधारने पर ध्यान दे रहे हैं.
ट्रेड एक महत्वपूर्ण फैक्टर
कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार कमर आगा के अनुसार, शी जिनपिंग का भारत आना ये साबित करता है कि दोनों देश एक-दूसरे को गंभीरता से ले रहे हैं. भारत की जीडीपी अब करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच गई है. भारत दुनिया में तीसरे सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. जबकि चीन दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.

हालांकि, दोनों देशों की जीडीपी में काफी अंतर है. चीन की अर्थव्यवस्था भारत से काफी बड़ी है, पर फिर भी चीन के लिए अब भारत को नजरअंदाज करना मुश्किल हो रहा है. दोनों देशों के बीच ट्रेड 151 अरब डॉलर से भी ज्यादा का हो गया है. ऐसे में दोनों देशों का एक-दूसरे के बगैर चलना या बढ़ना काफी मुश्किल है
सीमा विवाद पर बात दूसरा फैक्टर
दूसरी बात जो कमर आगा ने विशेष रूप से इंगित की कि भारत और चीन के बीच कई स्तर पर अब वार्ताएं चल रही हैं. सीमा विवाद को लेकर सैन्य स्तर पर गंभीर वार्ता चल ही रही है. साथ ही टॉप स्तर पर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता भी चल रही है. हाल ही में विशेष प्रतिनिधियों की 25वें दौर की वार्ता में भारत की तरफ से एनएसए अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई. इस दौरान सीमा विवाद को सुलझाने का रोड मैप बनाया गया और इसे जल्द से जल्द सुलझाने पर सहमति बनी.

कमर आगा के अनुसार, भारत सिद्धांत के स्तर पर ये मानता है कि अब युद्ध का समय नहीं है. पीएम मोदी इस बात को हर मंच से और दुनिया के सभी नेताओं के सामने कई बार दोहरा चुके हैं. चीन खुद एक बड़ी शक्ति है. ऐसे में चीन और भारत युद्ध लड़कर कभी सीमा विवाद नहीं सुलझा सकते. इसे सुलझाने का एक ही तरीका है और वह है बातचीत. दोनों देश अब इस बात को समझ चुके हैं और रिश्तों को अगले चरण में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं.
चीन के लिए ये भी अहम
कमर आगा आगे इस बात को जोड़ते हुए बताते हैं कि चीन में ये परिवर्तन सिर्फ भारत की बढ़ती ताकत के कारण नहीं आया है. बल्कि चीन अब नहीं चाहता कि भारत पूरी तरह से उसके खिलाफ हो जाए. भारत पहले से ही क्वाड का सदस्य देश है मगर उसने कभी भी उस गठबंधन को सैन्य गठबंधन बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. यहां तक की गलवान के समय भी. चीन ने इसे नोटिस किया. वहीं अमेरिका चाहता है कि भारत ऑकस गठबंधन में जुड़ जाए. ये 2021 में बना. इसके अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्टेलिया सदस्य और ये एक सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी है. मगर भारत अब तक इसका हिस्सा नहीं बना है. चीन नहीं चाहता कि भारत इसका हिस्सा बने. अगर ऐसा हुआ तो फिर चीन और भारत आमने-सामने होंगे. यही कारण है कि चीन भी भारत के साथ संबंधों को नॉर्मल करने में दिलचस्पी ले रहा है. वो अब भारत को भी एशिया की एक शक्ति के रूप में मानने लगा है और उसके साथ आगे बढ़ने की दिशा में काम करना चाहता है. चीन के साथ इस समिट के दौरान भारत की द्विपक्षीय वार्ता होने की पूरी संभावना है और इसमें ट्रेड और कनेक्टिविटी पर जोर रहेगा.
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