भारत के पड़ोसी मुल्क म्यांमार में रविवार को आम चुनाव का पहला चरण हो रहा है. पांच साल पहले सेना (जुंटा) के सत्ता पर नियंत्रण के बाद पहली बार चुनाव हो रहा है. हालांकि म्यांमार में लोकतंत्र बहाली और राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक सरकार चलाने की संभावना कम है. सेना ने 4 साल पहले आंग सान सू की चुनी सरकार को हटाकर सत्ता हथिया ली थी. 80 साल की सूकी और उनकी पार्टी चुनाव मैदान से बाहर है. म्यांमार इस वक्त गृह युद्ध जैसे हालातों का सामना कर रहा है. सेना ने इन चुनावों को बहुदलीय लोकतंत्र की वापसी बताया है.
सेना के सत्ता हथियाने के बाद जो जन आंदोलन शुरू हुआ था वो अब गृहयुद्ध में तब्दील हो गया है. देश में तीन चरणों में मतदान होगा, दूसरा चरण 11 जनवरी को और तीसरा चरण 25 जनवरी को होगा.मानवाधिकार और विपक्षी समूहों का कहना है कि ये चुनाव न तो स्वतंत्र होंगे और न ही निष्पक्ष. सत्ता सेना के सीनियर नेता जनरल मिन आंग ह्लाइंग के हाथों में ही रहेगी.
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इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के म्यांमार विश्लेषक रिचर्ड हॉर्सी ने कहा कि सेना की रणनीति यह है कि उसकी पसंदीदा यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी भारी बहुमत से जीते. उसे म्यांमार सेना की मुखौटा पार्टी माना जा रहा है. सेना चुनाव करवाकर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के शांति प्रस्ताव लागू करने और लोकतांत्रिक राज बहाली का संकेत देना चाहती है. इससे चीन, भारत और थाईलैंड जैसे पड़ोसी देशों से भी म्यांमार समर्थन हासिल करना चाहता है.
सेना ने 1 फरवरी, 2021 को सत्ता पर कब्जा कर लिया और दावा किया कि 2020 का चुनाव जिसमें सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी. उसमें बड़े पैमाने पर मतदाता पंजीकरण अनियमितताओं के कारण अवैध था.

Myanmar Election
रविवार को देश के 330 कस्बों में से 102 में मतदान हो रहा है. इसके बाद 11 जनवरी और 25 जनवरी को मतदान के और चरण होंगे. लेकिन 65 ऐसे कस्बे बचेंगे, जहां जातीय गुरिल्ला समूहों और हथियारबंद गुटों के साथ चल रहे संघर्ष के कारण मतदान नहीं होगा.
म्यांमार की 80 साल की नेता आंग सान सूकी और उनकी पार्टी चुनाव में भाग नहीं ले रही हैं. सू की 27 साल की जेल की सजा काट रही हैं, जिन पर लगे आरोपों को फर्जी और राजनीति से प्रेरित माना जाता है. उनकी नेशनल लीग पार्टी को नए सैन्य नियमों के तहत आधिकारिक रूप से पंजीकरण कराने से इनकार करने के बाद भंग कर दिया गया था. कई अन्य पार्टियां भी मतदान का बहिष्कार कर रही हैं या अनुचित शर्तों के चलते चुनाव लड़ने से मना कर चुकी हैं.
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विपक्षी दलों ने भी मतदाताओं से बहिष्कार का आह्वान किया है. एशियाई नेटवर्क फॉर फ्री इलेक्शंस के विश्लेषक अमाएल वियर के मुताबिक, म्यांमार की वो राजनीतिक पार्टियां जिन्होंने 2020 में 90% सीटें जीती थीं, वो आज चुनाव मैदान में ही नहीं हैं.
कठोर दंड वाले चुनाव संरक्षण कानून ने राजनीतिक गतिविधियों पर और भी प्रतिबंध लगा दिए हैं. चुनावों की सार्वजनिक आलोचना पर भी रोक है. पिछले कुछ महीनों में पर्चे बांटने या ऑनलाइन गतिविधियों के लिए 200 से अधिक लोगों को पकड़ा गया है. सैन्य समर्थित यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी के चुनाव में भारी बहुमत हासिल करने और 69 साल मिन आंग ह्लाइंग के फिर से राष्ट्रपति पद संभालने की संभावना है.
म्यांमार के आंतरिक संघर्ष में जानमाल का भारी नुकसान हुआ है। स्वतंत्र राजनीतिक कैदी सहायता संघ के अनुसार, सेना के सत्ता हथियाने के बाद से 22,000 से अधिक लोग राजनीतिक अपराधों के लिए हिरासत में हैं. सुरक्षाबलों की कार्रवाई में 7600 से अधिक नागरिकों की मौत हो चुकी है. 3.60 लाख से अधिक लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हैं.
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने कहा कि सैन्य नियंत्रित चुनावों से पहले म्यांमार में हिंसा, दमन और धमकियों का स्तर बढ़ रहा है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि कई लोगों को डर है कि चुनाव केवल उन लोगों की सत्ता को मजबूत करेगा जो वर्षों से गैरकानूनी मौतों के लिए जिम्मेदार हैं, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के हॉर्सी का मानना है कि चुनावों के बाद, म्यांमार में संघर्ष बढ़ने की संभावना है क्योंकि विरोधी यह साबित करने का प्रयास करेंगे कि सेना के पास अभी भी जनता का समर्थन नहीं है,
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