विज्ञापन

सिर्फ 30 मिनट के नोटिस पर कर्फ्यू और फिर जो दिखा उसी पर चला दी गोलियां, काफर कासिम की कहानी

आज से 70 साल पहले, 29 अक्टूबर 1956 को उस पतझड़ के दिन की शाम काफर कासिम के 49 फिलिस्तीनियों की हत्या कर दी गई थी. वे अपने प्रियजनों से आखिरी बार विदा भी नहीं ले सके.

सिर्फ 30 मिनट के नोटिस पर कर्फ्यू और फिर जो दिखा उसी पर चला दी गोलियां, काफर कासिम की कहानी
काफर कासिम गांव की कहानी
Institute for Palestine Studies
  • 29 अक्टूबर 1956 को काफर कासिम गांव में अचानक कर्फ्यू लागू कर फिलिस्तीनी ग्रामीणों को सूचना नहीं दी गई थी.
  • कर्फ्यू लागू होते ही इजरायली बॉर्डर पुलिस ने गांव के बाहर लौट रहे फिलिस्तीनियों की गोली मारकर हत्या कर दी थी.
  • मारे गए लोगों में 23 बच्चे भी शामिल थे, जो खेतों से वापस आ रहे थे और कर्फ्यू की जानकारी नहीं थी.

तारीख थी 29 अक्टूबर 1956. हर सुबह की तरह काफर कासिम गांव में रहने वाले फिलिस्तीनी किसान अपने-अपने खेतों के लिए निकल गए थे. उसमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे, सब शामिल थे. उन्हें नहीं पता था कि उनमें से कुछ कभी वापस गांव नहीं लौटेंगे. इजरायल की स्थापना के 8 साल बीत चुके थे. जो फिलिस्तीनी अपनी जमीन पर ही रह गए थे, वे इजरायली सैन्य शासन के अधीन जी रहे थे. इस शासन ने उनकी आवाजाही पर कई पाबंदियां लगा रखी थीं, जिनमें परमिट सिस्टम और कर्फ्यू शामिल थे. उस दिन, जब मिस्र के खिलाफ युद्ध की तैयारियां चल रही थीं, तो दूसरी बॉर्डर पुलिस बटालियन के कमांडर शमुएल मालिनके को कई फिलिस्तीनी गांवों में कर्फ्यू लगाने का आदेश मिला. इसमें काफर कासिम गांव भी शामिल था.

दोपहर 4 बजे, लेफ्टिनेंट गेब्रियल दाहान के नेतृत्व में बॉर्डर पुलिस की एक टुकड़ी गांव पहुंची. 4:30 बजे इस गांव के मुखिया वादी अहमद को बताया गया कि कर्फ्यू रात 10 बजे के बजाय शाम 5 बजे से लागू हो जाएगा. केवल 30 मिनट का समय, खेतों में गए लोगों को केवल इतना ही वक्त मिला था. कर्नल इस्साकर शादमी ने बॉर्डर पुलिस के मेजर शमुएल मालिनके से कहा था कि इस आदेश को सख्ती से लागू किया जाए. कर्फ्यू के समय के बाद अगर कोई भी ग्रामीण बाहर पाया जाए, तो उसे गोली मार दी जाए.

ठीक 5 बजे, लेफ्टिनेंट गेब्रियल दाहान ने अपने कांस्टेबलों को तीन समूहों में बांटकर अरब गांव 'काफर कासिम' के चारों ओर तैनात कर दिया. एक घंटे से भी कम समय में काफर कासिम लौटने वाली सड़कें मौत का मैदान बन गई थीं. मजदूर अपनी साइकिलों पर आ रहे थे. चरवाहे अपने जानवरों के झुंड के साथ लौट रहे थे. महिलाएं और पुरुष गाड़ियों और ट्रकों में सवार होकर आ रहे थे. उन्हें पता नहीं था कि कर्फ्यू शुरू हो चुका है. लेकिन गांव के प्रवेश द्वारों पर तैनात सुरक्षाबलों को पता था कि इन लोगों को कर्फ्यू की जानकारी नहीं दी गई थी.

शाम के अंत तक 49 फिलिस्तीनियों की हत्या हो चुकी थी

शाम करीब 6 बजे, हत्याओं की खबर बटालियन कमांडर शमुएल मालिनके तक पहुंची. उसने गोलीबारी रोकने का आदेश दिया. लेकिन तब तक दर्जनों परिवारों के लिए बहुत देर हो चुकी थी. उस शाम के अंत तक 49 फिलिस्तीनियों की हत्या हो चुकी थी. इनमें 23 बच्चे थे. वे पुरुष, महिलाएं और बच्चे, जो उस सुबह काम पर जाने के लिए घर से निकले थे, कभी वापस नहीं लौटे. कर्फ्यू जारी रहा और गांव का आसपास के इलाकों से संपर्क काट दिया गया. मृतकों को दफनाने के लिए पड़ोसी गांव जलजुदिन के पुरुषों को बुलाया गया. गांव के पूर्व में सेना की निगरानी में जल्दबाजी में कब्रें खोदी गईं. पीड़ितों को उनके परिवारों से दूर दफना दिया गया.

नरसंहार के लिए सजा मिली, लेकिन उसमें सजा नहीं थी

इस नरसंहार की खबर पर रोक लगा दी गई. लेकिन काफर कासिम में जो हुआ था, उसे छिपाकर नहीं रखा जा सका. खबर प्रेस तक पहुंची और पूरी दुनिया में फैल गई. इजरायल के प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन को नरसंहार की जांच शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसके बाद हत्याओं के जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाया गया.

इजरायल की बॉर्डर पुलिस के 11 अधिकारियों और पुलिसकर्मियों पर मुकदमा चलाया गया. अक्टूबर 1958 में आठ लोगों को दोषी ठहराया गया, जबकि तीन को बरी कर दिया गया. शमुएल मालिनके को 17 साल की जेल की सजा सुनाई गई. गेब्रियल दाहान और शालोम ओफर को 15-15 साल की सजा मिली. पांच अन्य लोगों को सात-सात साल की जेल की सजा सुनाई गई.

लेकिन जल्द ही इन सजाओं को कम कर दिया गया. आरोपियों ने फैसले के खिलाफ अपील की. 3 अप्रैल 1958 को अपील पर फैसला सुनाया गया. मालिनके की सजा घटाकर 14 साल कर दी गई. दाहान और ओफर की सजा घटाकर 10-10 साल कर दी गई. बाकी दोषियों की सजा घटाकर तीन-तीन साल कर दी गई. इसके बाद इजरायली सेना के चीफ ऑफ स्टाफ ने एक बार फिर सजाएं कम कर दीं. मालिनके की सजा 10 साल कर दी गई. गेब्रियल दाहान की सजा आठ साल और ओफर की सजा सात साल कर दी गई. नवंबर 1959 में दोषियों को समय से पहले रिहा करने की प्रक्रिया शुरू हुई. इनमें से कई लोगों को जेल से छोड़ दिया गया.

इसके बाद इजरायल के राष्ट्रपति यित्जाक बेन-ज़वी ने मालिनके की सजा घटाकर सात साल और गेब्रियल दाहान की सजा घटाकर पांच साल कर दी. लेकिन इन सजाओं को भी पूरा नहीं किया गया. मार्च 1960 तक काफर कासिम नरसंहार में दोषी ठहराए गए सभी लोग जेल से बाहर आ चुके थे. सजा सुनाए जाने के बाद उनमें से किसी ने भी डेढ़ साल से ज्यादा समय जेल में नहीं बिताया था. दोषी ठहराए गए लोगों में से दो को बाद में प्रमोशन दिया गया. शमुएल मालिनके को नेगेव परमाणु अनुसंधान केंद्र का प्रभारी बनाया गया.

आज से 70 साल पहले, 29 अक्टूबर 1956 को उस पतझड़ के दिन की शाम काफर कासिम के 49 फिलिस्तीनियों की हत्या कर दी गई थी. वे अपने प्रियजनों से आखिरी बार विदा भी नहीं ले सके. उन्हें ऐसी अंतिम विदाई भी नहीं मिली, जो मृतकों के सम्मान के योग्य होती. वे हमेशा के लिए चले गए. लेकिन उनके नाम रह गए.

ये भी पढे़ं : 'नीतीश होते तो यह सब नहीं होता', अनंत सिंह बोले- कोर्ट में करेंगे सरेंडर, नीरज ने फंसाया

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Israeli Army
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com