इजरायल में कल यानी 27 अक्टूबर को नई सरकार के लिए वोट डाले जाएंगे. 7 अक्टूबर 2023 को हुए हमास के हमले के बाद इजरायल में पहली बार राष्ट्रीय चुनाव होने जा रहे हैं. इन चुनावों को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व पर जनता की राय जानने के मौके के तौर पर देखा जा रहा है. इसे इजरायल के 78 साल के इतिहास का सबसे अहम चुनाव माना जा रहा है. चुनाव के नतीजे नेतन्याहू के दशकों लंबे राजनीतिक करियर को खत्म कर सकते हैं या उन्हें वहां की राजनीति का बेताज बादशाह बना सकते हैं. वह इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं.
नेतन्याहू, उनकी पार्टी और उनकी सरकार में शामिल दूसरी पार्टियों के बीच कड़ा मुकाबला है. हालांकि, उनकी सरकार 1988 के बाद इजरायल की पहली ऐसी संसद है, जिसने समय से पहले भंग हुए बिना अपना पूरा चार साल का कार्यकाल पूरा किया है.
इजरायल में कब होंगे चुनाव?
इजरायल में कल यानी 27 अक्टूबर को चुनाव होंगे. इन चुनावों में नेसेट यानी इजरायल की संसद के सभी 120 सदस्यों को चुना जाएगा. चुनाव के दिन इजरायल में सार्वजनिक छुट्टी रहती है. देश के ज्यादातर हिस्सों में मतदान सुबह 7 बजे शुरू होगा और रात 10 बजे तक चलेगा. कुछ छोटे इलाकों, अस्पतालों और जेलों में मतदान का समय थोड़ा कम होगा.
इजरायल में चुनाव कैसे होते हैं?
इजरायल में लोग किसी एक उम्मीदवार को नहीं, बल्कि किसी राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं. हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक लिस्ट बनाती है. इस लिस्ट में उम्मीदवारों के नाम एक तय क्रम में होते हैं. मतदाता बैलेट पेपर पर अपनी पसंद की पार्टी या उसके उम्मीदवारों की लिस्ट को चुनते हैं. जिस पार्टी को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसके नेता के देश का अगला प्रधानमंत्री बनने की संभावना होती है. हालांकि, सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी के नेता का प्रधानमंत्री बनना तय नहीं होता.
इजरायल में चुनाव की व्यवस्था पूरे देश में पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात पर आधारित है. संसद में जगह पाने के लिए किसी पार्टी को कुल वैध वोटों में से कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करने होते हैं. उम्मीद है कि करीब 10 पार्टियां वोटों की इस न्यूनतम सीमा को पार कर लेंगी.
सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या उसके साथ आने वाली पार्टियों को संसद में कम से कम 61 सीटों का समर्थन चाहिए. इजरायल में अब तक कोई भी पार्टी अकेले इतनी सीटें नहीं जीत पाई है. चुनाव के बाद पार्टियों को मिलकर गठबंधन सरकार बनाने के लिए 28 दिन मिलते हैं. जरूरत पड़ने पर इस समय को 14 दिन तक और बढ़ाया जा सकता है. अगर कोई भी नेता सरकार बनाने में कामयाब नहीं होता, तो देश में दोबारा चुनाव कराए जाते हैं.
साल 2019 के बाद यह इजरायल का छठा चुनाव है. इसलिए यहां इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी पार्टी सबसे ज्यादा सीटें जीतती है. ज्यादा अहम यह है कि कौन-सा नेता 61 सांसदों का समर्थन जुटाकर सरकार बना सकता है.
इजरायल में सरकार कैसे बनती है?
इजरायल के 78 साल के इतिहास में किसी भी एक पार्टी को संसद में अकेले बहुमत नहीं मिला है. इसलिए पार्टियों को मिलकर गठबंधन सरकार बनानी पड़ती है. इसके लिए संसद के कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन जरूरी है. चुनाव के नतीजे घोषित होने के सात दिनों के भीतर इजरायल के राष्ट्रपति अलग-अलग राजनीतिक दलों के चुने हुए प्रतिनिधियों से मिलते हैं. राष्ट्रपति की भूमिका ज्यादातर औपचारिक होती है.
इसके बाद राष्ट्रपति संसद के किसी सदस्य को सरकार बनाने की जिम्मेदारी देते हैं. आमतौर पर यह जिम्मेदारी उस पार्टी या राजनीतिक दल के नेता को दी जाती है, जिसने सबसे ज्यादा सीटें जीती हों. सरकार बनाने की जिम्मेदारी मिलने वाले नेता को दूसरे दलों से बातचीत करने, गठबंधन बनाने और संसद का समर्थन हासिल करने के लिए 28 दिन मिलते हैं. संसद में विश्वास मत हासिल करने के बाद ही वह सरकार बना सकता है.
कौन-कौन हैं प्रधानमंत्री पद के बड़े दावेदार?
1. बेंजामिन नेतन्याहू
नेतन्याहू 1990 के दशक में पहली बार इजरायल के प्रधानमंत्री बने थे. साल 2009 के बाद से वह ज्यादातर समय सत्ता में रहे हैं. वह दुनिया भर में इजरायल का सबसे जाना-पहचाना चेहरा बन चुके हैं. हालांकि, अपने देश में भी उनके समर्थक और विरोधी दोनों बड़ी संख्या में हैं.
उनके समर्थक उन्हें प्यार से 'किंग बीबी' कहते हैं. उनका मानना है कि दुश्मनों से घिरे इजरायल की रक्षा के लिए नेतन्याहू जैसे मजबूत नेता की जरूरत है. हालांकि, नेतन्याहू की मुश्किलें भी कम नहीं हैं. गाजा में कथित युद्ध अपराधों के मामले में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) उन्हें तलाश रहा है. नेतन्याहू इन आरोपों को खारिज करते हैं. इजरायल में भी उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमा चल रहा है, लेकिन वह इन आरोपों से इनकार करते हैं.
अब नेतन्याहू अपने राजनीतिक करियर को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जनमत सर्वे में उनकी लिकुड पार्टी के समर्थन में 7 अक्टूबर के हमले के बाद बड़ी गिरावट दिखाई दी है. इस हमले ने सुरक्षा के मामले में नेतन्याहू की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया था. नेतन्याहू कई सालों से दो अति-रूढ़िवादी यहूदी पार्टियों- यूनाइटेड टोरा जूडिज्म और शास के समर्थन पर निर्भर रहे हैं. ये दोनों पार्टियां चाहती हैं कि उनके समुदाय के लोगों को अनिवार्य सैन्य सेवा से ज्यादातर छूट मिलती रहे. इन समुदायों के लोगों की नौकरी और कामकाज में भागीदारी कम है. वे सरकारी मदद पर भी काफी निर्भर रहते हैं. इन बातों से इजरायल के कई लोग नाराज हैं. युद्ध के समय यह नाराजगी और बढ़ गई है.
इजरायल 3 सालों से गाजा में उलझा है, पिछले साल से ईरान से जंग लड़ रहा है. इजरायल में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लगातार जंग के माहौल से थक चुके हैं. उन्हें नॉर्मल दिन चाहिए. वहीं दूसरे लोगों के लिए जंग इजरायल के अस्तित्व को बचाने का एकमात्र उपाय है.
2. गादी आइजेनकोट
नेतन्याहू के प्रमुख विरोधियों में इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट भी शामिल हैं. गाजा में लड़ाई के दौरान उन्होंने अपना एक बेटा खो दिया था. 66 साल के आइजेनकोट खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर पेश करते हैं, जो पारंपरिक राजनीति से अलग हैं. वह एक सैनिक रहे हैं और सुरक्षा के मामलों में सख्त रुख रखते हैं. उनका साधारण पारिवारिक बैकग्राउंड और परिवार के बलिदान उन्हें नेतन्याहू से अलग बनाते हैं. नेतन्याहू लंबे समय से सत्ता में रहे हैं और उन पर भ्रष्टाचार के मामले भी चल रहे हैं.
आइजेनकोट 'याशार' नाम की नई पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. हिब्रू भाषा में 'याशार' का मतलब 'सीधा' या 'ईमानदार' होता है.
3. नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड
54 साल के नफ्ताली बेनेट भी प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदार हैं. वह दक्षिणपंथी विचारधारा के नेता हैं और पहले कमांडो रह चुके हैं. वह नेतन्याहू के सहयोगी भी रह चुके हैं. इसके अलावा, वह हाईटेक कारोबार से करोड़पति बने हैं. बेनेट ने इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री और मध्यमार्गी नेता यायर लैपिड के साथ हाथ मिलाया है. दोनों की नई पार्टी का नाम 'टुगेदर' यानी 'साथ' है. उनकी पार्टी के संदेशों में युद्ध और संकट से परेशान देश को फिर से जोड़ने और इजरायल को सही रास्ते पर लाने पर जोर दिया गया है.
बेनेट और लैपिड की विचारधारा एक-दूसरे से काफी अलग है. इसके बावजूद, दोनों ने मिलकर 2021 के चुनाव में नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर दिया था.
4. एविगडोर लिबरमैन
68 साल के एविगडोर लिबरमैन इजरायल के पूर्व रक्षा मंत्री हैं. वह कभी नेतन्याहू के करीबी सहयोगी हुआ करते थे, लेकिन अब उनके सबसे बड़े आलोचकों में शामिल हैं. लिबरमैन का रुख नेतन्याहू से भी ज्यादा सख्त माना जाता है. उन्होंने 2018 में नेतन्याहू सरकार से इस्तीफा दे दिया था. उस समय उन्होंने आरोप लगाया था कि नेतन्याहू गाजा में फिलिस्तीनी लड़ाकों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा नरम रुख अपना रहे हैं. लिबरमैन की पार्टी का नाम 'इजरायल अवर होम' यानी 'इजरायल हमारा घर' है. इस पार्टी को देश में पूर्व सोवियत संघ से आकर बसे लोगों के समुदाय का काफी समर्थन मिलता है.
5. यायर गोलान
64 साल के यायर गोलान इजरायल के पूर्व सैन्य जनरल हैं. हमास के 7 अक्टूबर के हमले वाली जगहों में से एक से लोगों को बचाने के लिए उनकी तारीफ की गई थी. गोलान नेतन्याहू के खिलाफ डेमोक्रेट्स पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. उनकी पार्टी का गठन इजरायल की ऐतिहासिक लेबर पार्टी के बचे हुए हिस्सों और छोटी वामपंथी पार्टी मेरेत्ज के आधार पर हुआ है. लेबर पार्टी पहले काफी प्रभावशाली थी, लेकिन अब उसकी राजनीतिक ताकत बहुत कम हो गई है.
ये पार्टियां बदल सकती हैं चुनाव का नतीजा
कुछ पार्टियां ऐसी हैं, जिन्होंने अभी तक नेतन्याहू या उनके विरोधियों में से किसी एक का साफ तौर पर समर्थन नहीं किया है. इन पार्टियों का समर्थन चुनाव के बाद सरकार बनाने में निर्णायक साबित हो सकता है. यानी इनके फैसले से यह तय हो सकता है कि नेतन्याहू सत्ता में लौटेंगे या उनके विरोधी सरकार बनाएंगे.
इनमें राम और जॉइंट लिस्ट नाम की दो पार्टियां शामिल हैं. ये दोनों इजरायल की अरब आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं. देश की कुल आबादी में अरब समुदाय की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है. इसके अलावा, 'पीपल ऑफ इजरायल' नाम की एक नई दक्षिणपंथी पार्टी और 'द रिजर्विस्ट्स' नाम की एक मध्यम-दक्षिणपंथी पार्टी भी है. जनमत सर्वे में इन दोनों पार्टियों के समर्थन में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. ऐसे में चुनाव के बाद सरकार बनाने में इनकी भूमिका अहम हो सकती है.
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