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रमण महर्षि को ढोंगी साबित करने आया था अंग्रेज, आश्रम में घटी ऐसी घटना, झुक गया खुद-ब-खुद सिर

Ramana Maharshi True story: 1931 में लंदन से भारत आए पत्रकार पॉल ब्रंटन हर संत को ढोंगी मानते थे. लेकिन तिरुवन्नामलई के आश्रम में रमण महर्षि के साथ बीती एक रात ने उनके सारे तर्क और अहंकार को बदल कर रख दिया.

रमण महर्षि को ढोंगी साबित करने आया था अंग्रेज, आश्रम में घटी ऐसी घटना, झुक गया खुद-ब-खुद सिर
Real Life story of Ramana Maharshi

साल 1931 में दक्षिण भारत की यात्रा पर आए ब्रिटिश पत्रकार पॉल ब्रंटन आए तो थे रमण महर्षि को ढोंगी साबित करने. लेकिन जो उन्होंने आश्रम में देखा तो उनको विश्वास नहीं हुआ. उस अंग्रेज के तर्क, शंका और पत्रकारिता का अहंकार एक मौन के सामने नतमस्तक हो गया था. यह कहानी है एक ऐसे इंसान की जो आंखों देखी पर भी भरोसा नहीं करता था, जब तक कि वह उसे तराजू पर तोल न ले. लेकिन इस यात्रा ने उसका पूरा वजूद बदलकर रख दिया.

लंदन का शक्की पत्रकार और 'ढोंग' की डायरी

सोचिए जरा, साल 1931 का वक्त है. दक्षिण भारत के एक छोटे से पत्थर के हॉल में 20 लोग एकदम बेसुध, मौन बैठे हैं. इतने स्थिर कि लगता है जैसे वक्त थम गया हो. कोने में एक संत बैठे थे- इतने शांत कि लंदन से आया एक पत्रकार दो घंटे तक यही सोचता रहा कि यह इंसान सांस भी ले रहा है या यह कोई मूर्ति है.  

Real Life story of Ramana Maharshi and Paul Brunton, The 1931 Journey That Shattered a Journalists Ego

उस पत्रकार का नाम था पॉल ब्रंटन

लंदन की धुंध, तीखे सवालों वाले अखबारों और सख्त तर्कों के बीच पले-बढ़े ब्रंटन की जिंदगी का एक ही नियम था- 'जो दिखे नहीं, जो साबित न हो, उस पर आंख मूंदकर यकीन मत करो.' वह सालों से पूरी दुनिया छान मार रहा था, इस तलाश में कि शायद कहीं कोई सच मिल जाए. वह अंगारों पर चलने वालों से मिला, खुद को ईश्वर का दूत बताने वालों के पास गया. लेकिन हर जगह उसे सिर्फ नाटक और पाखंड मिला. उसकी डायरी में जितने भी साधु-संतों के नाम लिखे थे, सबके आगे उसने एक ही शब्द लिखा था- 'ढोंग'. और उस दिन भी वह अपनी डायरी में वही शब्द दर्ज करने आया था.

अरुणाचल की छांव में एक अजीब सी खामोशी

किसी गुमनाम शहर से गुजरते वक्त ब्रंटन ने एक फुसफुसाहट सुनी थी- 'दक्षिण भारत में एक संत हैं. न कोई तमाशा, न भक्तों की भीड़, न कोई चमत्कार. बस एक इंसान जो ध्यान में लीन रहता है.'

ब्रंटन ने मन ही मन सोचा- 'चलो, एक और पाखंडी का नकाब उतारते हैं.' उसने ट्रेन पकड़ी और डायरी में नाम लिखा- रमण महर्षि. नाम के आगे एक खाली जगह छोड़ दी, उसी शब्द 'ढोंग' को लिखने के लिए. तिरुवन्नामलई के स्टेशन पर जब वह उतरा, तो हवा में कुछ अलग ही भारीपन था. चमेली, धूल और 100 साल पुरानी सुलगती अगरबत्ती की महक जैसे हवा में रच-बस गई थी. सामने विशाल अरुणाचल पर्वत खड़ा था- लाल-भूरा, अडिग, जैसे 10,000 सालों से वहीं हो और अगले 10,000 सालों तक वहीं रहने वाला हो. 

Real Life story of Ramana Maharshi and Paul Brunton, The 1931 Journey That Shattered a Journalists Ego

ब्रंटन आश्रम पहुंचा. न कोई सुरक्षा गार्ड, न कोई भव्य दरवाजा, न किसी ने पूछा कि 'तुम कौन हो?' हॉल के भीतर ठंडा माहौल था. लाल टाइल्स पर लोग बैठे थे. कोने में एक सफेद पलंग पर बाघ की खाल और बेदाग गद्दे के ऊपर वह संत विराजमान थे.

ब्रंटन की पैनी पत्रकारिता वाली नजरें किसी दरार को ढूंढ रही थीं- वह छोटी सी गलती जो हर ढोंगी आखिरकार कर ही बैठता है. लेकिन सामने एक दुबला-पतला आदमी था, तांबे जैसी त्वचा, शांत चेहरे पर गहरी आंखें, जो खिड़की के पार किसी अनदेखी दुनिया को देख रही थीं. वहां सन्नाटा इतना गहरा था कि ऊपर झूलते पंखे की रस्सी की धीमी सरसराहट भी साफ सुनाई दे रही थी.

वह मुस्कान जो किसी के लिए नहीं थी

एक घंटा बीता. दो घंटे बीते. ब्रंटन इंतजार करता रहा. 'क्या यह उदासीनता का नाटक है?' उसने सोचा. तभी एक मामूली सी घटना घटी. खिड़की से एक गिलहरी फुदकती हुई आई और सीधे महर्षि के पलंग पर कूद गई. महर्षि न चौंके, न कोई बड़ा उत्साह दिखाया. बस धीरे से एक उंगली आगे बढ़ा दी. गिलहरी ने सूंघा.

उसी पल, महर्षि के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान आई जो किसी दर्शक के लिए नहीं थी, किसी इंसान को प्रभावित करने के लिए नहीं थी. वह बस एक सहज, निष्पाप मुस्कान थी. फिर गिलहरी चली गई और महर्षि वापस उसी अथाह स्थिरता में लौट गए.

ब्रंटन अंदर तक हिल गया. उसने अपने दिल में स्वीकार किया- 'यह आदमी कम से कम अभिनय तो नहीं कर रहा.'

धारदार सवाल का आईना बन जाना

दो घंटे बाद महर्षि ने अपनी बेफिक्र आंखें सीधे ब्रंटन पर टिका दीं. उन आंखों में न कोई परख थी, न जिज्ञासा, बस एक अपनापन था. ब्रंटन ने अपनी डायरी खोली, गला साफ किया और अपने वे तीखे, तार्किक सवाल दागे जो उसने दर्जनों गुरुओं से पूछे थे- "मैं बहुत दूर से आया हूं. ईश्वर क्या है? परम सत्य क्या है?"

उसका पेन कागज पर तैयार था. महर्षि ने उसे एक पल देखा और बड़े सहज भाव से बोले, "यह पूछने से पहले कि ईश्वर क्या है, यह पता करो कि यह पूछने वाला कौन है?" सन्नाटा छा गया. ब्रंटन का पेन हवा में ही जम गया.

उसका तैयार किया हुआ सवाल एक आईना बनकर उसी की तरफ घूम गया था. 'पूछ कौन रहा है?'- इस बात का जवाब उसके पास नहीं था. बरसों में पहली बार उसकी वह डायरी पूरी तरह से बेकार साबित हो चुकी थी. 

Real Life story of Ramana Maharshi and Paul Brunton, The 1931 Journey That Shattered a Journalists Ego


जब तर्क पर दिल भारी पड़ गया

ब्रंटन कई दिनों तक वहीं रुका. महर्षि के नाम के आगे वह 'ढोंग' शब्द कभी लिख ही नहीं पाया. वह खुद से बहाने बनाता रहा कि 'शोध चल रहा है, मौसम अच्छा है, इसलिए रुका हूं.' फिर एक दिन उसने खुद को झटका दिया. उसने कहा- 'बहुत हुआ' और बंबई जाकर यूरोप की जहाज का टिकट कटा लिया.

रात के वक्त जब वह जहाज के डेक पर खड़ा था, नीचे अरब सागर का काला पानी था और ऊपर अनगिनत तारे. वह खुद को अपनी समझदारी की शाबाशी दे रहा था. तभी उसके भीतर से एक आवाज आई- बिना किसी शब्द के, तारों जैसी ठंडी और बिल्कुल साफ- "वापस जाओ."

उसके दिमाग ने दलीलें दीं, तर्क दिए, वजहें गिनाईं. लेकिन वह भीतरी यकीन डिगा नहीं. उसने बाद में लिखा-  "समुद्र बहुत काला था, तारे स्थिर थे, और तुम्हारे सीने में बैठा वह एहसास तुम्हारे सारे तर्कों से बड़ा हो चुका था. तुम झुकते हो, अपना बैग उठाते हो और वापस मुड़ जाते हो." 

 'मैं' का पिघल जाना

ब्रंटन तिरुवन्नामलई वापस लौटा. पहाड़ वैसा ही था, मौन वैसा ही था. एक शाम, उसे हल्का बुखार था. उसने आंखें बंद कीं और महर्षि की बात को याद किया- 'पूछने वाले को ढूंढो, विचार के उद्गम तक जाओ, मैं को खोजो.' 

उसने अपने भागते हुए दिमाग को पकड़ना छोड़ दिया. बंबई का जहाज, लंदन की गलियां, पुरानी बातें- सब तैरते रहे, वह बस देखता रहा. धीरे-धीरे कमरा गायब होने लगा. अगरबत्ती की महक, पंखे की आवाज, शरीर का एहसास- सब धुल गया. विचार ऐसे बुझने लगे जैसे कोई अंधेरी राह में एक-एक करके मोमबत्तियां बुझाता चला जाए.

Real Life story of Ramana Maharshi and Paul Brunton, The 1931 Journey That Shattered a Journalists Ego

और फिर अंतिम मोमबत्ती भी बुझ गई

30 सालों से जिस 'मैं' को वह ढो रहा था, वह अचानक पिघल गया. कोई नया चमत्कार नहीं हुआ था, बस ऐसा लगा जैसे वह किसी बहुत पुराने, जाने-पहचाने घर में भटकते-भटकते वापस लौट आया हो. जब उसकी आंखें खुलीं, तो सामने महर्षि बैठे थे. उनकी नजरें इस बार दूर किसी क्षितिज पर नहीं थीं, बल्कि सीधे ब्रंटन पर थीं- जैसे वे पूरे वक्त इसी पल का, इसी इंसान का इंतजार कर रहे थे. दोनों के बीच कोई शब्द नहीं बोला गया. लेकिन दो आत्माओं ने एक ही सच को एक साथ जान लिया था.

एक बच्चे जैसी बेफिक्र नींद

उस रात पॉल ब्रंटन की डायरी जमीन पर पड़ी रही. उसने उसे उठाने की जहमत तक नहीं उठाई. रात को उसे एक गहरी, बिना किनारों वाली नींद आई. सपने में उसने देखा कि वह 5 साल का बच्चा है और एक बहुत बड़े, सुरक्षित हाथ को पकड़े हुए पहाड़ चढ़ रहा है. पैर फिसले, पत्थर हिले, लेकिन वह हाथ नहीं छूटा. 30 सालों से जो पत्रकार दुनिया के हर इंसान पर शक करता आया था, वह उस रात एक छोटे बच्चे की तरह बेफिक्र होकर सो रहा था.
 

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