- ईरान ने अपने नए सुप्रीम लीडर को चुन लिया है, लेकिन नाम की घोषणा फिलहाल युद्ध खत्म होने तक टाली जा रही है
- ईरान नाम घोषित न करके अमेरिका और इजरायल के हमलों से अपने नए नेता को सीधे निशाना बनाए जाने से बचा रहा है
- ईरान की सेना ने इजरायल को चेतावनी दी है कि अगर हमला जारी रहा तो अरब देशों के तेल ठिकानों को निशाना बनाएगी
ईरान की तरफ से लगातार कहा जा रहा है कि उन्होंने अपने नये सुप्रीम लीडर को चुन लिया है. संडे को भी ऐसे ही बयान आए. मगर साथ ही फिर से ये कह दिया गया कि नाम की घोषणा बाद में की जाएगी. अब सवाल ये है कि अगर नये सु्प्रीम लीडर चुन लिए गए हैं तो फिर नाम घोषणा क्यों नहीं हो रही? दूसरा उससे भी बड़ा सवाल है कि खामेनेई के रहते ही ऐसी कई रिपोर्ट्स थीं कि ईरान ने उनके बाद सुप्रीम लीडर कौन होगा, ये तय कर लिया था. हालांकि, उस समय भी नाम की घोषणा नहीं हुई थी. तो अगर पहले से नाम तय था तो अब फिर से वो प्रक्रिया क्यों चल रही है?
पहले ये बयान पढ़ लें
अमेरिका और इजरायल साफ-साफ कह चुके हैं और लगातार दोहरा रहे हैं कि वो ईरान में अब सुप्रीम लीडर नहीं चाहते. वो लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए व्यक्ति को ईरान की सत्ता में देखना चाहते हैं. ट्रंप ने दो कदम आगे बढ़ते हुए कह दिया है कि ईरान का नया नेता उनकी मर्जी का होगा. संडे को उन्होंने और आगे बढ़ते हुए कह दिया कि अगर ईरान ने उनकी मर्जी के बगैर किसी नेता को चुना तो वो उसे ज्यादा समय तक सत्ता में नहीं रहने देंगे.

तो क्या डर रहा ईरान
क्या अमेरिका और इजरायल के यही बयान ईरान को अपने नये सुप्रीम नेता का नाम बताने से रोक रहे हैं. ये बहुत हद तक सही लग रहा है. कारण ये है कि अगर ईरान अपने नये सुप्रीम लीडर का नाम बता देता है तो अमेरिका और इजरायल का सबसे पहला टारगेट वही होंगे. खामेनेई की मौत ने पहले ही ईरान की जनता और सेना के मनोबल को बहुत हद तक नुकसान पहुंचाया है. अब अगर नये नेता के नाम का ऐलान होने के बाद फिर कोई अनहोनी हो जाती है तो जाहिर है जनता के साथ-साथ सेना में भी हताशा फैल जाएगी. इसलिए ईरान चाहता है कि जब तक युद्ध रुक नहीं जाता, नाम की घोषणा नहीं की जाए.
तो फिर कह क्यों रहा कि नेता चुन लिया
दरअसल, ईरान अपनी जनता और सेना को ये जताना चाहता है कि भले ही खामेनेई की मौत हो गई हो, लेकिन हालात काबू में हैं. ईरान लगातार पलटवार कर भी ये संदेश दे रहा है कि सु्प्रीम लीडर की मौत के बाद भी ईरान मजबूती से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ लड़ रहा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भले ही ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला अचानक किया हो लेकिन ईरान को इस बात का पूरा अंदाजा था कि उस पर इस बार बहुत खतरनाक हमला होगा. यही कारण है कि उसने हर परिस्थिति के हिसाब से पहले से प्लानिंग कर रखी थी. यहां तक की खामेनेई ने अपना उत्तराधिकारी भी तय कर रखा था, ताकी किसी तरह ऊहापोह की स्थिति न बने.
ऐसा कर ईरान को फायदा भी
ईरान को अपने नये सुप्रीम लीडर का नाम नहीं बताकर एक और फायदा है. वो अमेरिका तक हमला करने में सक्षम नहीं है. बहुत तक वो इजरायल को टारगेट कर सकता है. ऐसे में उसकी मजबूरी ये है कि वो अपने पर होने वाले हमलों का जवाब अरब देशों में अमेरिकी ठिकानों पर कर रहा है. ईरान की सेना ने रविवार को ये भी चेतावनी दी कि अगर इजरायल उसके एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले जारी रखता है, तो वह अरब मुल्कों के तेल स्थलों को निशाना बनाएगी. ईरान के केंद्रीय सैन्य कमान के प्रवक्ता इब्राहिम ज़ोल्फ़ागरी ने सरकारी टीवी को बताया, "इस्लामी देशों की सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपराधी अमेरिका और क्रूर जायोनी शासन को ऐसे कायरतापूर्ण, अमानवीय कृत्यों के बारे में जल्द से जल्द चेतावनी दें अन्यथा, क्षेत्र में भी इसी तरह के कदम उठाए जाएंगे, और अगर आप 200 डॉलर प्रति बैरल से अधिक के तेल की कीमत बर्दाश्त कर सकते हैं, तो यह खेल जारी रखें."

जाहिर है, ईरान खुद को बचाने के लिए अभी किसी भी स्तर पर जाएगा. अब अगर ऐसे वक्त में ईरान के नये सुप्रीम लीडर के नाम की घोषणा कर दी जाती है तो फिर आगे सभी पड़ोसी देशों से उसके संबंध बहुत खराब रहेंगे. तो ईरान भले ही काम नये सुप्रीम लीडर के बताए अनुसार कर रहा हो, लेकिन वो चाहता है कि इस जंग का प्लस-माइनस उसके नये सुप्रीम लीडर पर नहीं आए. भविष्य में अगर जंग रुक जाती है तो फिर ईरान उनके नाम की घोषणा कर देगा और फिर संबंधों को नये सिरे से गढ़ना आसान होगा.
ईरान सु्प्रीम लीडर पर इन नामों की चर्चा
सुप्रीम लीडर 99 प्रतिशत सैय्यद परिवार से होगा,आपको बता दें कि ईरान में सैय्यद लोगों की सबसे ज्यादा इज्जत होती है, अयातुल्लाह खुमैनी या आयतुल्लाह खामेनेई दोनों की ही बात करें तो दोनों ही सैय्यद परिवार से थे. अभी कुल छह लोगों ने नाम ईरान के सुप्रीम लीडर के तौर पर चर्चा में हैं. सबसे पहला नाम मुजतबा होसैनी खामेनेई का चर्चा में है. इनकी उम्र लगभग 56 वर्ष है. ये अयातुल्लाह अली खामेनेई के दूसरे बेटे हैं. उनका जन्म 1969 में मशहद में हुआ था. वे एक मध्यम स्तर के शिया धर्मगुरु हैं और लंबे समय से ईरानी सत्ता के पीछे की शक्तियों में सक्रिय माने जाते हैं.

दूसरे आयतुल्लाह सैय्यद मोहम्मद मेहदी मीर बाघेरी का नाम चल रहा है. वो मेंबर ऑफ काउंसिल हैं. वो अयातुल्लाह खामेनई के करीबी भी थे. अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के पोते हसन खुमैनी का नाम भी चर्चा में है. इसके अलावा गोलाम-होसैन मोहसिनी भी रेस में माने जा रहे हैं. वो ईरान के चीफ जस्टिस हैं और गार्जियन काउंसिल के सदस्य हैं. वहीं अयातुल्लाह अली रेजा अराफी के नाम की भी ईरान में खूब चर्चा है. वो एक वरिष्ठ शिया मौलवी और ईरान की मदरसा व्यवस्था के प्रमुख हैं. वे असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के उपाध्यक्ष और गार्जियन काउंसिल के पूर्व सदस्य हैं.
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