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खाड़ी की लड़ाई जनता की जेब तक आई...एशिया और यूरोप में बढ़ रही महंगाई

मिडिल ईस्ट में जंग जारी रहने से आने वाले समय में तेल और गैस की कीमतों के साथ ही जरूरी सामानों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है. यहां तक की इससे अमेरिका और इजरायल भी नहीं बचेंगे और उनके यहां भी महंगाई बढ़ जाएगी.

खाड़ी की लड़ाई जनता की जेब तक आई...एशिया और यूरोप में बढ़ रही महंगाई
जंग लंबी चलने पर हो सकता है यूरोप, एशिया समेत दुनिया भर में पेट्रोल सहित जरूरी वस्तुओं की किल्लत हो जाए.
  • अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध के कारण विश्व में तेल की कीमतों में 25 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गई है
  • कुवैत ने फोर्स मेज्योर लागू कर तेल उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है, जिससे आपूर्ति बाधित हुई है
  • भारत में घरेलू और कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में क्रमशः 60 और 115 रुपये की बढ़ोतरी हुई है

अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से दुनिया में तेल की कीमतों में 25 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है. अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के अनुसार, शनिवार को पेट्रोल की राष्ट्रीय औसत कीमत 3.41 डॉलर प्रति गैलन (0.9 डॉलर प्रति लीटर) तक पहुंच गई, जो पिछले सप्ताह की तुलना में 0.43 डॉलर अधिक है. गोल्डमैन सैक्स ने चेतावनी दी है कि यदि शिपिंग में रुकावट जारी रहता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं. गैस और अन्य जरूरी सामानों की कीमतों में बढ़ोतरी का खतरा मंडरा रहा है.

दुनिया भर में बढ़ेंगी तेल की कीमतें

शुक्रवार को अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत 91 डॉलर प्रति बैरल से कुछ कम रही - 1983 से उपलब्ध आंकड़ों में यह अब तक की सबसे बड़ी साप्ताहिक वृद्धि है, जो संकेत देती है कि कीमतें बढ़ती रह सकती हैं. रॉयटर्स समाचार एजेंसी के अनुसार, जेपी मॉर्गन के विश्लेषकों ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा, "बाजार अब केवल भू-राजनीतिक जोखिम का आकलन करने के बजाय ऑपरेशनल प्राब्लम्स से निपटने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, क्योंकि रिफाइनरी बंद होने और निर्यात प्रतिबंधों से कच्चे तेल के प्रसंस्करण और क्षेत्रीय आपूर्ति प्रवाह में बाधा उत्पन्न होने लगी है."

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रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, कुवैत ने 'फोर्स मेज्योर' घोषित कर दिया है. फोर्स मेज्योर एक कानून शब्द है, इसका मतलब होता है कि बहुत गंभीर कारणों से संगठन अपने दायित्व पूरा करने में असमर्थ है. साफ शब्दों में कहें तो कुवैत ने तेल उत्पादन में भारी कटौती का फैसला किया है. कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (KPC) ने शनिवार से तेल उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है और आधिकारिक तौर पर 'फोर्स मेज्योर' लागू कर दिया है.  अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण पिछले आठ दिनों से मिडल ईस्ट से होने वाली तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप है. इराक और कतर के बाद अब कुवैत ने भी यह कदम उठाया है. विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब के पास तेल स्टोर करने की जगह खत्म हो रही है, जिससे उन्हें भी जल्द ही उत्पादन कम करना पड़ सकता है. ऐसे में जंग जारी रहने पर तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं.

भारत में गैस की कीमतें बढ़ीं

भारत की बात करें तो LPG सिलेंडर के दाम बढ़ गए हैं. 14.2 किलो वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी की गई है, ज‍बकि 19 किलो वाले कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में करीब 115 रुपये की बढ़ोतरी हुई है. कमर्शियल सिलेंडर के दाम 7 दिन के भीतर दूसरी बार बढ़े हैं. इससे पहले 1 मार्च को 28 से 31 रुपये तक की बढ़ोतरी की गई थी. बढ़ी हुई कीमतें शनिवार, 7 मार्च 2026 से ही लागू हो गईं हैं. दूसरी ओर पेट्रोल-डीजल के दाम फिलहाल लगभग स्थिर बने हुए हैं. स्‍थानीय स्‍तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कुछ पैसों का बदलाव देखा जा रहा है. मगर आशंका पेट्रोल-डीजल के कीमतों में बढ़ोतरी की भी बनी हुई है.

जरूरी सामानों पर भी आएगा संकट

वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के आर्थिक नुकसान का दायरा केवल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाले तेल और प्राकृतिक गैस के शिपमेंट तक ही सीमित नहीं है. संघर्ष क्षेत्र में कई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के बंद होने से, जिनमें दुबई का दुनिया का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा भी शामिल है, वैश्विक हवाई माल ढुलाई क्षमता का लगभग पांचवां हिस्सा निष्क्रिय हो गया, जिससे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और कीमती धातुओं के शिपमेंट बाधित हो गए हैं. 

एक्सपर्ट्स ने चेताया

सैन फ्रांसिस्को स्थित फ्रेट फॉरवर्डर और लॉजिस्टिक्स कंपनी फ्लेक्सपोर्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रयान पीटरसन ने बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद से एशिया से यूरोप तक हवाई मार्ग से माल भेजने की लागत में 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो एशिया से संयुक्त राज्य अमेरिका को सामान भेजने की लागत में हुई वृद्धि से दोगुने से भी अधिक है. शिपिंग पर पड़ने वाला यह प्रभाव एक व्यापक आर्थिक सच्चाई को दर्शाता है: यह युद्ध यूरोप और एशिया की अर्थव्यवस्थाओं को संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में कहीं अधिक तेजी से और अधिक गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है.

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अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री मॉरिस ऑब्स्टफेल्ड ने कहा, "यूरोप और एशिया ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, इसलिए ईरान युद्ध से उत्पन्न नकारात्मक व्यापक आर्थिक प्रभावों के प्रति वे अधिक संवेदनशील हैं. भौगोलिक रूप से युद्ध क्षेत्र के निकट होने के कारण भी यूरोप और एशिया युद्ध के झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं."

मतलब साफ है कि आने वाले समय में तेल और गैस की कीमतों के साथ ही जरूरी सामानों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है. यहां तक की इससे अमेरिका और इजरायल भी नहीं बचेंगे और उनके यहां भी महंगाई बढ़ जाएगी. एक्सपर्ट्स इस बात का पूरी तरह अंदेशा जता रहे हैं कि जंग लंबी खींचने पर दुनिया पर महंगाई का खतरा बढ़ जाएगा और सबसे ज्यादा नुकसान एशिया और यूरोप को होगा.

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लेखक के बारे में
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विजय शंकर पांडेय
चीफ सब एडिटर
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