- भारत ने लंबी दूरी के कम लागत वाले स्ट्राइक ड्रोन प्रोजेक्ट्स को तेज गति से विकसित करना शुरू कर दिया है
- शेषनाग और प्रोजेक्ट केएएल ड्रोन की टेस्टिंग तेज है, जिनमें हाईवे से ऑपरेशन की क्षमता शामिल है
- शेषनाग-150 ड्रोन एक हजार किलोमीटर से अधिक रेंज और पांच घंटे से ज्यादा उड़ान क्षमता रखता है
India Attack Drone Project: ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध में शाहेद ड्रोन न सिर्फ फेमस हुए हैं, बल्कि अमेरिका और इजरायल के लिए मुसीबत भी बन गए हैं. कारण कम लागत से बने ये ड्रोन नुकसान तो बड़ा कर ही रहे हैं, इन्हें रोकने या कहें मारने भी अमेरिका-इजरायल को महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है. इस युद्ध का असर भारत में भी देखने को मिल रहा है और भारत ने लंबी दूरी की कम लागत वाली स्ट्राइक ड्रोन प्रोजेक्ट्स को तेज कर दिया है.

किस स्टेज पर हैं ये ड्रोन
एनडीटीवी को पिछले सप्ताह ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद भारत के नये शेषनाग ड्रोन के हाईवे पर लॉन्च की नई तस्वीरें मिली हैं. प्रोजेक्ट केएएल नामक एक अन्य ड्रोन भारत का शाहेद टाइप ड्रोन भी सामने आया है और इसे तेजी से विकसित किया जा रहा है. मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध में, शाहेद ड्रोनों की लगातार सफलता ने यह साबित कर दिया है कि कम लागत वाले मानवरहित सिस्टम एयर डिफेंस को चकमा देकर दुश्मन देश में काफी अंदर तक घुसकर टारगेट पर हमला कर सकत हैं. इस स्थिति ने भारत के सैन्य योजनाकारों के बीच स्वदेशी ड्रोन क्षमताओं को तेजी से विकसित करने के लिए जोश ला दिया है. यही कारण है कि शेषनाग और प्रोजेक्ट केएएल के लंबी दूरी के स्ट्राइक ड्रोन्स की तेज गति से टेस्टिंग चल रही है. खासकर हाईवे से ऑपरेशन भी शामिल हैं. जिससे युद्ध के समय इनका कहीं से भी इस्तेमाल हो सके.
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(KAL ड्रोन की तस्वीर)
ऑपरेशन सिंदूर के बाद डिमांड
यह प्रयास भारतीय सेना के भीतर इस व्यापक मान्यता को दर्शाता है कि लंबी दूरी के स्ट्राइक ड्रोन अब विशिष्ट क्षमताएं नहीं रह गईं हैं, बल्कि आधुनिक युद्ध के आवश्यक उपकरण बन गए हैं, और भारत यह सुनिश्चित करने के लिए तेजी से कदम उठा रहा है कि ये जल्द से जल्द तैनाती के लिए तैयार हों. 3 मार्च को ही एनडीटीवी ने खबर दी थी कि शेषनाग-150 ड्रोन के डेवलपमेंट और टेस्स में चुपचाप लेकिन लगातार प्रगति हो रही है. बेंगलुरु स्थित रक्षा स्टार्टअप न्यूस्पेस रिसर्च टेक्नोलॉजीज (एनआरटी) द्वारा पूरी तरह बनाए गए इस लंबी दूरी के झुंड में हमला करने वाले ड्रोन ने एक साल पहले अपनी पहली उड़ान भरी थी. ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने एनआरटी को युद्धक्षेत्र में अपने कुछ अन्य ड्रोन क्षमताओं को विकसित करने के लिए कहा था. सेना का मकसद स्वदेशी, लंबी दूरी की झुंड में हमला करने की क्षमता करने वाला ड्रोन पाना है.

(शेषनाग 150 ड्रोन की तस्वीर)
शेषनाग कितने खतरनाक
1,000 किलोमीटर से अधिक की ऑपरेशनल रेंज और पांच घंटे से अधिक की उड़ान झमता के साथ, शेषनाग-150 टारगेट के ऊपर मंडरा सकता है. इससे सेना को रियल टाइम निगरानी और हमले के विकल्प मिलते हैं. यह न्यूनतम या बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के दुश्मन के टारगेट को खुद से पहचान सकता है, ट्रैक कर सकता और उन पर हमला करने में सक्षम है. इसके साथ ही 25-40 किलोग्राम के वारहेड भी ले जा सकता है, ताकी जरूरत पड़ने दुश्मन पर हमला कर सके. 25-40 किलो वजन का वारहेड बुनियादी ढांचे, वाहनों या सैनिकों को गंभीर नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त होता है.
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