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This Article is From Jan 18, 2026

हिदुओं की हत्‍या, महिलाओं की आवाज दबाने की भी कोशिश... HRW की रिपोर्ट ने खोली बांग्‍लादेश की पोल

HRW की रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के महीनों में हिंदू और जातीय अल्पसंख्यकों पर हमले कैसे बढ़े हैं. साथ ही कहा है कि महिलाओं को अभी भी राजनीतिक भागीदारी से काफी हद तक अलग रखा जाता है.

हिदुओं की हत्‍या, महिलाओं की आवाज दबाने की भी कोशिश... HRW की रिपोर्ट ने खोली बांग्‍लादेश की पोल
  • बांग्लादेश में अगले महीने आम चुनाव होने हैं, लेकिन महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर हिंसा को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
  • जनवरी से जून 2025 के बीच जेंडर आधारित हिंसा बढ़ी है, जिसे धार्मिक कट्टरता से जोड़कर देखा जा रहा है.
  • हिंदू और जातीय अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं, जिनमें पीट-पीटकर हत्या और अन्य हिंसात्मक घटनाएं शामिल हैं.
ढाका:

बांग्लादेश में आम चुनाव से ठीक पहले हालात ठीक नहीं हैं. एक तरफ हिंदुओं की बेरहमी से की जा रही हत्याएं हैं तो दूसरी तरफ महिलाओं की आवाज को दबाने की कोशिशें बदस्‍तूर जारी है. इन सबके बीच न्यूयॉर्क स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) की एक रिपोर्ट ने बांग्‍लादेश की अंतरिम सरकार की नाकामी को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है.  मानवाधिकारों पर बढ़ते हमले, सांप्रदायिक हिंसा का उफान और महिलाओं को राजनीति से बाहर धकेलने की संगठित कोशिश बताती हैं कि देश में लोकतंत्र और मानवाधिकार जैसे शब्‍द सबसे आखिरी पायदान पर खड़े हैं. साथ ही कट्टरपंथियों की आवाज लगातार बुलंद हो रही है. 

बांग्‍लादेश में अगले महीने आम चुनाव होने जा रहे हैं. HRW ने पुलिस आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया है कि जनवरी से जून 2025 के बीच जेंडर पर आधारित हिंसा में 2024 की इसी अवधि की तुलना में बढ़ोतरी दर्ज हुई है. HRW की वूमन राइट डिविजन के सीनियर कॉर्डिनेटर सुभाजित साहा ने इसे लेकर लिखा है कि बांग्लादेश महिला परिषद (बीएमपी) की अध्यक्ष डॉ. फौजिया मुस्लिम इस बढ़ोतरी को धार्मिक समूहों की बढ़ती गतिविधियों और बयानबाजी को मानती हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं की स्वतंत्रता और समाज में भागीदारी पर रोक लगाना है.

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कट्टरपंथियों ने किया लैंगिक समानता का विरोध 

साथ ही उन्‍होंने कहा कि मई 2025 में कट्टरपंथी धार्मिक समूहों ने अंतरिम सरकार द्वारा लैंगिक समानता और महिलाओं के अधिकारों में सुधार की कोशिशों का विरोध किया और उन गतिविधियों को खत्‍म करने की मांग की जिन्हें वे 'इस्लाम विरोधी' मानते थे. उसके बाद से महिलाओं और लड़कियों को मौखिक, शारीरिक और डिजिटल दुर्व्यवहार काb सामना करना पड़ा है. हिंसा के डर से उनकी आवाज उठाने की क्षमता कम हो गई है.

अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के सत्ता से हटने के बाद 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव देश में होने वाले पहले चुनाव होंगे.

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हालिया दौर में अल्‍पसंख्‍यकों पर हमले बढ़े 

HRW की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हाल के महीनों में हिंदू और जातीय अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं. साहा ने लिखा कि दिसंबर में 27 साल के कपड़ा मजदूर दीपू चंद्र दास की कथित ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी. मानवाधिकार समूहों ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की कम से कम 51 घटनाओं की रिपोर्ट की है, जिनमें 10 हत्याएं शामिल हैं. चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में जातीय अल्पसंख्यकों को सुरक्षाबलों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है.

बांग्‍लादेश में एक दिन पहले ही हिंदू दुकानदार की हत्‍या कर दी गई. गाजीपुर जिले में हिंदू दुकानदार की महज इसलिए पीट-पीटकर फावड़े से हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने अपने कर्मचारी को हमले से बचाने की कोशिश की थी. इससे एक दिन पहले भी हिंदू युवक को कुचलकर मार दिया गया था. इन हमलों को लेकर बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने गहरी चिंता जताई है. मानवाधिकार संगठन का आरोप है कि चुनाव नजदीक आने के साथ अल्पसंख्यक के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा जानबूझकर बढ़ाई जा रही है, जिससे उन्हें डराया जा सके. 

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51 में से 30 दलों में महिला उम्‍मीदवार नहीं 

इसके साथ ही साहा ने लिखा कि बांग्लादेश में पहले दो महिला प्रधानमंत्रियों के होने और 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों में कई महिलाओं की भागीदारी के बावजूद महिलाओं को अभी भी राजनीतिक भागीदारी से काफी हद तक अलग रखा जाता है. आगामी आम चुनावों में 51 राजनीतिक दलों में से 30 में कोई महिला उम्मीदवार नहीं है. बांग्लादेश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों में से एक इस्लामी राजनीतिक समूह जमात-ए-इस्लामी के 276 उम्मीदवारों में से एक भी महिला उम्मीदवार नहीं है.

इसे “शर्मनाक” बताते हुए कई रिपोर्टों में कहा गया है कि फरवरी में होने वाले चुनावों में बांग्लादेश के चुनावों में महिला उम्मीदवारों की भागीदारी अब तक की सबसे कम होगी.

ढाका के स्थानीय मीडिया ने बताया कि ढाका रिपोर्टर्स यूनिटी में इस सप्ताह की शुरुआत में आयोजित 'महिला उम्मीदवारों का नामांकन संकट: दलों की प्रतिबद्धताओं और कार्यान्वयन के बीच का अंतर और चुनाव आयोग की जवाबदेही' शीर्षक से कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कई वक्ताओं ने कहा कि हालांकि देश का चुनाव आयोग अक्सर “लैंगिक समावेशी चुनाव” की बात करता है, लेकिन वास्तविकता में वह कहीं नहीं दिखता है. 

कार्यक्रम के दौरान मंच के नेताओं ने महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का विरोध करते हुए कहा कि वे नहीं चाहते कि महिलाएं विशेष कोटे के माध्यम से संसद में पहुंचे. इसके बजाय वे चाहते हैं कि महिलाएं सीधे चुनाव लड़ें और योग्यता के आधार पर प्रतिनिधित्व हासिल करें. यूनाइटेड न्‍यूज बांग्‍लादेश ने बताया कि कार्यक्रम के दौरान एक वक्ता ने सवाल किया कि यदि राजनीतिक दल अपने घोषणापत्रों और प्रतिबद्धताओं का पालन करने में विफल रहते हैं तो भविष्य में महिलाएं उन पर भरोसा क्यों करेंगी?

2,568 उम्मीदवारों में से केवल 109 महिलाएं

फोरम की नेता समीना यास्मीन ने कहा कि देश में महिला मतदाता कुल मतदाताओं का करीब 50 प्रतिशत या संभव है कि  इससे भी अधिक हैं. साथ ही कहा कि क्या वास्तव में 51 फीसदी आबादी को नजरअंदाज कर और शेष 49 फीसदी पर निर्भर रहकर सत्ता में आना संभव है? बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने इससे पहले ऐसे आंकड़े जारी किए थे, जो इस असमानता को उजागर करते हैं. महिलाओं की आबादी आधी होने के बावजूद उम्मीदवारों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है.

बांग्लादेश के प्रमुख समाचार पत्र 'द डेली स्टार' की रिपोर्ट के अनुसार, 12 फरवरी को होने वाले चुनावों में 2,568 उम्मीदवारों में से केवल 109 यानी 4.24 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनमें से 72 को राजनीतिक दलों द्वारा नामांकित किया गया है, जबकि बाकी निर्दलीय हैं.

जमात-ए-इस्लामी की एक भी महिला उम्‍मीवार नहीं

रिपोर्ट्स बताती हैं कि कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी में यह भेदभाव बेहद साफ दिखता है, जिसने 276 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है और उनमें एक भी महिला नहीं है. इसके बाद इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश का नंबर आता है, जिसने 268 उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं. वहीं बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) का नेतृत्व चार दशकों से अधिक समय तक एक महिला ने किया है. उसने 300 सीटों के लिए 328 उम्मीदवारों में से केवल 10 महिलाओं को टिकट दिए हैं.

बांग्लादेश खिलाफत मजलिस (94 उम्मीदवार), खिलाफत मजलिस (68 उम्‍मीदवार) और बांग्लादेश इस्लामी फ्रंट (27 उम्‍मीदवार) सहित कई पार्टियों ने महिलाओं को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है और केवल पुरुष उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारा है.

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