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कोरोना फैलाने वाले चीन के वुहान लैब को अमेरिका के बड़े वैज्ञानिक ने की थी फंडिंग? हुआ बड़ा खुलासा

अमेरिका के इस बड़े वैज्ञानिक के संबंध जो बाइडेन से जुड़े हुए हैं. पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के पूर्व मुख्य चिकित्सा सलाहकार एंथनी फॉसी को लेकर तुलसी गैबार्ड ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिन सनसनीखेज खुलासे किए हैं.

कोरोना फैलाने वाले चीन के वुहान लैब को अमेरिका के बड़े वैज्ञानिक ने की थी फंडिंग? हुआ बड़ा खुलासा
तुलसी के दावों पर फॉसी ने कोई जवाब अब तक नहीं दिया है.
  • एंथनी फॉसी ने वुहान लैब को चमगादड़ कोरोना वायरस पर रिसर्च के लिए फंडिंग दी थी
  • तुलसी गैबार्ड ने दस्तावेज जारी कर बताया कि फॉसी ने अमेरिकी एजेंसियों और संसद से वायरस लैब लीक की जानकारी छिपाई
  • फॉसी ने महामारी के दौरान गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च को छुपाने के लिए गलत जानकारी और सेंसरशिप को बढ़ावा दिया था

कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को पहली बार ऐहसास कराया कि जिंदगी और मौत का फासला बहुत कम है. दावा किया जाता है कि ये कोरोना वायरस चीन के वुहान लैब से निकला था. अब खुलासा हुआ है कि अमेरिका के एक बड़े वैज्ञानिक ने इस वुहान लैब की फंडिंग की थी. बृहस्पतिवार को अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस (DNI) की निवर्तमान डायरेक्टर तुलसी गैबार्ड ने दावा किया कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन के पूर्व मुख्य चिकित्सा सलाहकार एंथनी फॉसी ने चीन के वुहान में एक रिसर्च लैब को फंड दिया था. यही नहीं उन्होंने अमेरिकी एजेंसियों और यहां तक की अमेरिकी संसद को भी जानबूझकर गलत जानकारी दी.

तुलसी गैबार्ड ने आखिरी दिन खोले राज

तुलसी गैबार्ड ने पिछले महीने अपने बीमार पति की देखभाल के लिए डोनाल्ड ट्रंप के इंटेलिजेंस चीफ का पद छोड़ दिया था. अपने कार्यकाल के आखिरी दिन तुलसी गैबार्ड ने ये धमाका किया है. दस्तावेज जारी करते हुए उन्होंने बताया कि फॉसी ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (WIV) में "चमगादड़ कोरोना वायरस पर खतरनाक गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च" के लिए अमेरिकी टैक्सपेयर्स के लाखों डॉलर दिए थे. फॉसी ने 2020 की शुरुआत में अमेरिका में कोविड के आने पर बाइडन सरकार की रणनीति का नेतृत्व किया था. गैबार्ड के दफ्तर ने एक बयान में कहा कि फॉसी ने "वायरस के लैब से लीक होने की सच्चाई को दबाने के लिए राजनीति की."

बयान में कहा गया, "ये दस्तावेज COVID-19 पर IC (इंटेलिजेंस कम्युनिटी) के आकलन को प्रभावित करने और उनमें हेरफेर करने में फॉसी की सीधी भूमिका का खुलासा करते हैं. साथ ही, ये यह भी बताते हैं कि फॉसी ने 2024 में कांग्रेस से कैसे झूठ बोला, जब उन्होंने शपथ के तहत इंटेलिजेंस अधिकारियों के साथ वायरल रिसर्च पर हुई चर्चाओं के बारे में जानकारी होने या उनमें शामिल होने से इनकार किया था."

फॉसी ने खतरनाक रिसर्च को छुपाए रखा 

तुलसी के ऑफिस ने यह भी कहा कि 85 साल के फॉसी ने दिसंबर 2022 में पद छोड़ने तक 38 सालों तक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीजेज (NIAID) के प्रमुख के तौर पर काम किया. उन्होंने बड़ी फार्मा कंपनियों से जुड़ी "रिस्की कोरोनावायरस रिसर्च" और खरबों डॉलर की "यूनिवर्सल वैक्सीन" बनाने की कोशिशों के लिए फंडिंग की. बयान में कहा गया, "फॉसी पर्दे के पीछे से सलाह देने वाले व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने चुने हुए विशेषज्ञों के साथ मिलकर IC (इंटेलिजेंस कम्युनिटी) पर दबाव डाला कि वे वायरस के प्राकृतिक, जानवरों से उत्पन्न होने की बात को मंजूरी दें, ताकि उनकी खतरनाक रिसर्च छिपी रहे. फॉसी देश के महामारी विशेषज्ञ बन गए और उन्होंने सार्वजनिक रूप से झूठ, गलत जानकारी और सेंसरशिप को बढ़ावा दिया."

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बयान में आगे कहा गया, "महामारी के दौरान, फॉसी और IC के भीतर राजनीति करने वाले नेताओं ने एक ऐसा रिपोर्टिंग सिस्टम बनाया, जो उनके अपने फायदे के लिए था. उन्होंने IC को सलाह देने के लिए NIAID से फंड पाने वाले अपने चुने हुए वैज्ञानिकों को उपलब्ध कराया. इस जानकारी ने आधिकारिक इंटेलिजेंस आकलन को आकार दिया, जिसका इस्तेमाल बाद में लैब-लीक थ्योरी को गलत साबित करने के लिए वैज्ञानिक सहमति के तौर पर सार्वजनिक रूप से किया गया."

डीप स्टेट प्लेबुक जैसे तरीके अपनाए

गैबार्ड के दफ्तर ने यह भी कहा कि फॉसी ने एक "फर्जी पेपर" को इंटेलिजेंस कम्युनिटी के विचार के लिए सही जानकारी के तौर पर बढ़ावा दिया, और इसे पब्लिश करवाने में भी मदद की. इसमें कहा गया है कि सीनियर एनालिस्ट्स ने फॉसी की तारीफ एक "पॉलिसीमेकर" के तौर पर नहीं, बल्कि "असली कोरोनावायरस एक्सपर्ट्स" तक पहुंचाने वाले निष्पक्ष गाइड के तौर पर की, जबकि उन एक्सपर्ट्स को नजरअंदाज किया जो फॉसी की बातों से सहमत नहीं हो सकते थे.

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तुलसी ने कहा कि सच छिपाने के लिए एंथनी फॉसी ने जो तरीके अपनाए, वे "डीप स्टेट प्लेबुक" से सीधे लिए गए हैं. उन्होंने कहा, "COVID-19 महामारी ने हमारे लाखों साथी अमेरिकियों और दुनिया भर के अनगिनत लोगों के लिए भारी मुश्किलें और दर्द पैदा किया. सालों के झूठ, सेंसरशिप और सच छिपाने की कोशिशों के बाद, अमेरिकी लोग पारदर्शिता, सच्चाई और जवाबदेही के हकदार हैं. सच छिपाने के लिए इस्तेमाल किए गए तरीके सीधे 'डीप स्टेट प्लेबुक' से आए हैं: डॉ. फॉसी जैसे राजनीति करने वाले और अपना स्वार्थ देखने वाले नेताओं ने अपनी गलतियों और सत्ता के दुरुपयोग को छिपाया, इंटेलिजेंस के साथ छेड़छाड़ की, कांग्रेस से झूठ बोला और देश को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी अहम जानकारियों तक पहुंच रोककर सही तरीके से चुने गए अमेरिकी राष्ट्रपति को कमजोर किया."

खुफिया विश्लेषकों को धमकी भी दी

DNI ने कहा, "फॉसी ने जून 2024 में कांग्रेस के सामने अपनी सार्वजनिक गवाही के दौरान झूठ बोला था. उस सुनवाई में फॉसी से बार-बार पूछा गया कि क्या उन्होंने महामारी से पहले, उसके दौरान या उसके बाद "वायरल रिसर्च के बारे में FBI, CIA, DIA या किसी भी अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसी" से बात की थी. मगर फॉसी ने बार-बार सवालों से बचने की कोशिश की और फिर झूठा बयान दिया कि, 'कोविड के बारे में मेरी जानकारी में ऐसा कुछ नहीं है'."

बयान में आगे कहा गया है कि कई व्हिसलब्लोअर्स की गवाही से पता चलता है कि जिन खुफिया विश्लेषकों ने कोविड की उत्पत्ति के बारे में फॉसी के निष्कर्षों को चुनौती दी, तो उन्हें "बदले की धमकी दी गई, उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया और अक्सर उनके करियर में भी बाधा आई." गैबार्ड के कार्यालय ने कहा, "इससे असहमति को दबा दिया गया और एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा मिला, जहां सच्चाई को अनुरूपता के लिए कुर्बान कर दिया गया और विश्वसनीय सबूतों को दबा दिया गया." इन आरोपों पर फॉसी की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

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लेखक के बारे में
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विजय शंकर पांडेय
चीफ सब एडिटर
देश और दुनिया देखने और समझने का कौतूहल बचपन से रहा. हिन्दी और संस्कृत से मेलजोल पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण हुआ. युवा होते ही राजनीति दिलचस्प लगने लगी... और पढ़ें
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