अक्सर हमारे देश में एक बात बहुत आसानी से कह दी जाती है कि खेती-किसानी तो घाटे का सौदा है. गांव के युवा हों या शहर के लोग, सब यही मानते हैं कि मिट्टी में सिर्फ पसीना बहता है, पैसा नहीं. ये कहानी है दो सगे भाइयों की, जिन्होंने मखमल की जिंदगी छोड़ी, मल्टीनेशनल बैंक की लाखों की नौकरी को लात मारी और अपनी ही मिट्टी से 800 करोड़ रुपये का साम्राज्य खड़ा कर दिया. मिलिए सत्यजीत और अजिंक्य हांगे से, जिन्हें आज दुनिया 'टू ब्रदर्स ऑर्गेनिक फार्म्स' (Two Brothers Organic Farms) के नाम से जानती है.
गांव से प्यार और दो भाइयों का फैसला
कहानी शुरू होती है महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव 'भोडनी' से. दोनों भाइयों के पिता पिछले 40 साल से खेती कर रहे थे. उन्होंने अपनी जिंदगी की पाई-पाई जोड़कर दोनों बेटों को बोर्डिंग स्कूल भेजा और एमबीए करवाया. दोनों भाइयों की बड़े शहरों में शानदार नौकरी लग गई. एसी कमरे, चमचमाती गाड़ियां, हर महीने खाते में आने वाली मोटी सैलरी जिंदगी में सब कुछ सेट था.
लेकिन जब भी ये दोनों भाई दिवाली की छुट्टियों में गांव आते, तो उनका जाने का मन नहीं करता. छोटे भाई अजिंक्य ने एक दिन अचानक बड़ा फैसला लिया- "मुझे ये नौकरी नहीं करनी, मैं गांव जाकर खेती करूंगा." उसके एक साल बाद बड़े भाई सत्यजीत ने भी इस्तीफा दे दिया. दोनों भाई गांव लौट आए.
गांव में हड़कंप मच गया. लोग कहने लगे, "पढ़-लिखकर दिमाग खराब हो गया है. इतनी बड़ी नौकरी छोड़ भैंस चराने आ गए." माता-पिता भी परेशान थे कि बेटों ने जिंदगी दांव पर लगा दी है.

जब पहली ही फसल पर पड़ा 'बाजार का तमाचा'
दोनों भाइयों ने देखा कि खेतों में जहर (केमिकल और पेस्टिसाइड) घोला जा रहा है, जिससे जमीन बंजर हो रही है. उन्होंने ठान लिया कि वे सिर्फ जैविक (Organic) खेती करेंगे. वे देसी गाय लेकर आए, गोबर और गोमूत्र से खाद बनाई. दिन-रात मिट्टी से प्यार किया, गोबर उठाया. जो खुशी उन्हें एसी ऑफिस में नहीं मिली, वो इस गोबर-मिट्टी में मिल रही थी.
तीन साल की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद पपीते की पहली फसल तैयार हुई. फल बहुत मीठे थे, लेकिन केमिकल ना होने के कारण उन पर थोड़े दाग थे. दोनों भाई बड़े चाव से एक पूरा ट्रक भरकर सुबह 4 बजे मंडी पहुंचे.
वहां जो हुआ, उसने इनके होश उड़ा दिए. व्यापारी ने पर्ची थमाई- दाम मिला सिर्फ 4 रुपये किलो. सत्यजीत ने हैरान होकर पूछा, "इतना बढ़िया, बिना जहर का फल है, ये दाम क्यों?" व्यापारी ने कहा, "ग्राहक पहले आंखों से खाता है, फिर जीभ से. तुम्हारा फल देखने में अच्छा नहीं है, दाम यही मिलेगा." तीन साल की मेहनत के बाद वो दिन ऐसा था जैसे किसी ने चेहरे पर जोरदार तमाचा जड़ दिया हो. पूरे ट्रक की फसल बेचकर हाथ में आए सिर्फ 10000 रुपये.

पिता का ताना
घर लौटे तो बैंक बैलेंस खाली हो चुका था. शहर से लाए 8 लाख रुपये खत्म थे. पिताजी ने साफ कह दिया, "मैंने जिंदगी भर खेती की है, इसमें कोई इज्जत नहीं है, कोई पैसा नहीं है. तुम बहुत बड़ी गलती कर रहे हो."
गांव के लोग भी पीछे नहीं रहे. तंज कसते हुए बोले, "बड़ा आए थे शहर से ज्ञान बांटने. केमिकल बंद करके जैविक खेती कर रहे थे. देख लिया न, पूरा ट्रक बेचकर सिर्फ 10 हजार लाए. बेच दो जमीन और कर लो नौकरी."
हार न मानने की ज़िद: जब 'घी और गुड़' ने बदली बाजी
लेकिन इन दोनों भाइयों ने हार मानने से साफ इनकार कर दिया. उन्होंने फिलिप कॉटलर के मार्केटिंग के नियम याद किए और समझ गए कि उन्हें एक नाम की, एक ब्रांड की जरूरत है. इसी तड़प से जन्म हुआ 'टू ब्रदर्स ऑर्गेनिक फार्म्स' का.
उन्हें समझ आ गया कि सिर्फ फल-सब्जी बेचने से काम नहीं चलेगा क्योंकि उनके पास कोल्ड स्टोरेज के पैसे नहीं थे. उन्होंने अपनी मां से पूछा कि गांव की ऐसी कौन सी चीजें हैं जो साल भर खराब नहीं होतीं? मां ने रास्ता दिखाया- पारंपरिक तरीके से बना 'देसी गाय का घी' और 'गन्ने का गुड़'.
मुंबई के फ्लाईओवर से 800 करोड़ की उड़ान
शुरुआत में मुंबई के फ्लाईओवर के नीचे फल बेचे, फिर मुंबई के एक एग्जिबिशन में दो टेबल लगाकर अपना घी और गुड़ बेचना शुरू किया. लोगों को जब उनकी कहानी और शुद्धता का अहसास हुआ, तो लाइन लग गई. वे हर शनिवार-रविवार 350 किलोमीटर गाड़ी चलाकर मुंबई आते, दिन भर धूप में खड़े होकर माल बेचते और फिर रात को वापस गांव जाकर खेतों में काम करते. धीरे-धीरे उन्होंने अपनी वेबसाइट शुरू की. फिर जो हुआ, वो किसी चमत्कार से कम नहीं था. बेंगलुरु, दिल्ली, लखनऊ पूरे देश से ऑर्डर्स की बाढ़ आ गई.

4 रुपए से ₹800 करोड़ का धंधा
जिस ब्रांड की शुरुआत घर के चूल्हे से हुई थी, आज गांव में 60,000 स्क्वायर फीट की बड़ी फैक्ट्री खड़ी है. जो लोग कभी ताने मारते थे, आज उन्हीं के गांव के 700 लोगों को ये दोनों भाई रोजगार दे रहे हैं. पुणे और मुंबई में इनके ऑफिस हैं. सोचिए, जिस पपीते को बेचने के लिए इन्हें 4 रुपये का भाव मिला था, आज उसी संघर्ष की बदौलत इनकी कंपनी की वैल्यूएशन 800 करोड़ रुपये हो चुकी है.
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