- इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित अंतिम युद्धविराम वार्ता के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है.
- ईरानी प्रतिनिधिमंडल में सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सचिव और विदेश मंत्री शामिल हैं.
- लेबनान पर इजरायली हमलों ने वार्ता को जटिल बना दिया है, जहां हाल के हमलों में सैकड़ों लोग मारे गए हैं,
पाकिस्तान की मेजबानी में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित फाइनल युद्धविराम को लेकर अहम वार्ता शुरू होने वाली है. इस्लामाबाद को अभूतपूर्व सुरक्षा घेरे में रखा गया है और पाकिस्तान इसे अपनी कूटनीतिक अग्निपरीक्षा के तौर पर देख रहा है. स्कूलों में छुट्टी कर दी गई है, रेड जोन सील है और एयर स्पेस पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है.
यह वार्ता ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिम एशिया में हालिया युद्धविराम बेहद नाज़ुक स्थिति में है और लेबनान पर इजरायली हमलों ने हालात को और जटिल बना दिया है.
कौन-कौन शामिल: प्रतिनिधिमंडलों की पूरी तस्वीर
ईरानी दल गुरुवार को इस्लामाबाद पहुंच चुका है. इसमें सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहम्मद बाकिर जोलकद्र, ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद-बगेर कालीबाफ, और विदेश मंत्री अब्बास अरागची शामिल हैं.
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अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार को पहुंचेगा, जिसकी अगुवाई उप राष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे. उनके साथ मिडिल ईस्ट के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, और जेरेड कुशनर भी शामिल होंगे. इसके बाद शनिवार को इस्लामाबाद के सेरेना होटल में औपचारिक वार्ता होगी.
अभूतपूर्व सुरक्षा: इस्लामाबाद ‘रेड अलर्ट' पर
वार्ता स्थल सेरेना होटल को पूरी तरह खाली करा लिया गया है. आसपास की सड़कें सील हैं और राजधानी में आवागमन पर कड़ी पाबंदियां हैं. एयरस्पेस की निगरानी बढ़ा दी गई है. रेड ज़ोन पूरी तरह बंद है. अस्पतालों और रेस्क्यू एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है. फरवरी में हुए आत्मघाती हमले और अफगान सीमा से जुड़े सुरक्षा खतरों को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था सामान्य से कहीं अधिक कड़ी की गई है. पाकिस्तान के गृहमंत्री मोहसिन नकवी ने अमेरिकी चार्जे डी'अफेयर्स नैटली बेकर को भरोसा दिलाया कि विदेशी मेहमानों को फूलप्रूफ सुरक्षा दी जाएगी.
लेबनान बना सबसे बड़ा रोड़ा
अमेरिका-ईरान वार्ता की पृष्ठभूमि में लेबनान सबसे संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरा है. इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि लेबनान में कोई संघर्षविराम नहीं होगा और IDF के हमले जारी रहेंगे. साथ ही, नेतन्याहू ने कैबिनेट को बेरूत से सीधी बातचीत के निर्देश भी दिए हैं.
NBC के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू से ईरान वार्ता को आसान बनाने के लिए लेबनान पर हमले कम करने को कहा था. इज़रायल के हालिया हवाई हमलों से बेरूत में भारी तबाही हुई है. लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, एक ही दिन में 300 से ज़्यादा मौतें और 1,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं.
खामेनेई का सख़्त संदेश: ‘हम अधिकार नहीं छोड़ेंगे'
वार्ता से ठीक पहले ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई के बयान ने संकेत दे दिया है कि तेहरान किस रुख के साथ बातचीत में उतरेगा. खामेनेई ने कहा, 'ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपने वैध अधिकारों से किसी भी सूरत में पीछे नहीं हटेगा. हमारे देश पर हमला करने वाले अपराधियों को बिना सजा के नहीं छोड़ा जाएगा.' उन्होंने दक्षिणी पड़ोसियों को चेतावनी देते हुए कहा कि 'शैतानी ताकतों के झूठे वादों से सावधान रहें' और संकेत दिया कि
होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन को लेकर ईरान कोई बड़ा कदम उठा सकता है.
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किन मुद्दों पर बन सकती है सहमति?
सूत्रों और रिपोर्ट्स के मुताबिक, वार्ता के संभावित एजेंडे में शामिल हैं-
- ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाने पर सहमत हो सकता है.
- लेकिन मिसाइल कार्यक्रम, सेना, हिज़्बुल्लाह और हूतियों पर कोई समझौता नहीं होगा.
- होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग टैक्स/मैनेजमेंट को लेकर अमेरिका-ईरान साझेदारी की संभावना है.
इसके बदले ईरान अमेरिका से तमाम प्रतिबंध हटाने की मांग करेगा. परमाणु संवर्धन की नियमित अंतरराष्ट्रीय जांच पर सहमति बन सकती है. हालांकि, ये अभी केवल अटकलें हैं. असली चुनौती यही है कि दोनों देश युद्धविराम तो चाहते हैं, लेकिन हार स्वीकार नहीं करना चाहते.
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इस्लामाबाद की मेज पर बैठी यह बातचीत सिर्फ अमेरिका और ईरान के लिए नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की दिशा तय कर सकती है. ऐसे में सवाल यही है कि क्या यह वार्ता स्थायी युद्धविराम का रास्ता खोलेगी, या फिर यह शांति एक बार फिर बंदूक़ों की आवाज़ में खो जाएगी?
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