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This Article is From Feb 06, 2026

मुस्लिम ब्रदरहुड के दम पर बांंग्लादेश फतह कर लेगी जमात? अल्पसंख्यकों से महिलाओं तक, डर की 4 वजहें

Bangladesh Election 2026: जमात-ए-इस्लामी ने इस बार के चुनाव में 11 पार्टियों का गठबंधन तैयार किया है. तीन चुनावों में तीनों बार हार का सामना करने वाले जमात के चीफ शफीकुर रहमान को उम्मीद है कि इसबार किस्मत पलटेगी.

मुस्लिम ब्रदरहुड के दम पर बांंग्लादेश फतह कर लेगी जमात? अल्पसंख्यकों से महिलाओं तक, डर की 4 वजहें
Bangladesh Election 2026: जमात-ए-इस्लामी के चीफ शफीकुर रहमान
  • बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव होंगे जो देश के लोकतंत्र के भविष्य का निर्धारण करेंगे
  • जमात-ए-इस्लामी ने 11 पार्टियों का गठबंधन खड़ा किया है, इसके नेता शफीकुर रहमान प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं
  • जमात-ए-इस्लामी के गठबंधन में कट्टरपंथी शामिल हैं, सांस्कृतिक- महिलाओं के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं

Bangladesh Election 2026: बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी के नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार शफीकुर रहमान तीन चुनाव लड़ चुके हैं. उन्हें तीनों बार हार का सामना करना पड़ा है. लेकिन अब इस बार उन्हें आखिरकार जीत की उम्मीद है. भारत के पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में 2024 के विद्रोह के बाद पहली बार 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव होने जा रहे हैं. यह चुनाव तय करेगा कि बांग्लादेश में लोकतंत्र किस रास्ते पर जाने वाला है. शेख हसीना के 16 सालों के शासन के गिराए जाने के बाद का यह पहला चुनाव है और इस बार चुनावी रेस में उनकी पार्टी अवामी लीग नहीं है. उसे बैन कर दिया गया है. 

इस बार मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात ए इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन में है. बांग्लादेश चुनाव से पहले हम आपके लिए यह सीरिज लाए हैं जिसमें हम आपको मैदान में दांव ठोक रहे एक-एक राजनीतिक प्लेयर्स के बारे में बताएंगे. उनका अतीत बताएंगे, उनका वर्तमान बताएंगे. इसी कड़ी में BNP के बाद अब बारी जमात-ए-इस्लामी की कहानी जानने की है. खासतौर पर उसके नेता शफीकुर रहमान की बात करेंगे.

जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश का इतिहास

जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश एक इस्लामी राजनीतिक दल है जिसकी जड़ें 1941 में अबुल आला मौदूदी द्वारा पूर्वी पाकिस्तान में स्थापित मूल जमात-ए-इस्लामी में हैं. इसका उद्देश्य इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित सरकार स्थापित करना था. खास बात है कि 1971 में जब बांग्लादेश की आजादी की जंग चल रही थी तो जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया और ‘रजाकार', अल-बद्र तथा अल-शम्स जैसे सहायक बल बनाए. इन पर युद्ध अपराधों और हत्याओं का आरोप लगाया गया, जिसके कारण विभाजन के बाद इस दल पर बैन लगा दिया गया. 

बाद में 1977 में बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्षता हटाने के साथ यह पार्टी फिर से जिंदा हुई और BNP के साथ गठबंधन करते हुए 2001-06 तक सरकार में शामिल रही. 2009 के बाद युद्ध अपराधों के लिए इसके कई नेताओं को दोषी ठहराया गया और मृत्युदंड या जेल हुआ. 2010 में बांग्लादेश फिर से संवैधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष हो गया. 2013 में जमात का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया था और बाद में 2024 में इसे आतंकवादी संगठन के रूप में घोषित किया गया.

लेकिन हसीना के पतन के बाद सबकुछ बदल गया. बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में इसकी चुनावी भागीदारी की अनुमति दी, जिससे यह राजनीतिक क्षेत्र में लौट रहा है.

क्या धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश में पहली बार बनेगी इस्लामिक गठबंधन की सरकार?

जमात-ए-इस्लामी ने इस बार के चुनाव में 11 पार्टियों का गठबंधन तैयार किया है. 67 साल के डॉक्टर और इस्लामिक धर्मगुरू शफीकुर रहमान को उम्मीद है कि जमात के नेतृत्व वाला यह गठबंधन उन्हें जीत दिला सकता है. हालांकि बांग्लादेश के सेक्युलर संविधान को मानने वालों और वहां के अल्पसंख्यकों को इस बात की चिंता हो रही है कि अगर जमात-ए-इस्लामी की जीत होगी, तो उनकी कीमत पर होगी, उनके अधिकारों पर चोट होगी. जमात और उसके गठबंधन की जीत से धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश में पहली इस्लामवादी नेतृत्व वाली सरकार बनेगी.  

हालांकि रहमान ने चुनावी वादों में कहा कि मैं समाज में नैतिक नवीनीकरण का पक्षधर हूं. खास बात है कि जमात-ए-इस्लामी नैतिकता और नए बांग्लादेश की बात कर रही है लेकिन उसे बांग्लादेश की 9 करोड़ महिलाओं में से एक भी ऐसी महिला नहीं मिली है जिसे पार्टी अपना उम्मीदवार बना सके. बांग्लादेश की पूर्व प्रधान मंत्री हसीना ने अपने कार्यकाल में चरमपंथियों पर कार्रवाई की थी. लेकिन अब उनके पतन के बाद से, प्रमुख इस्लामी नेताओं को जेल से रिहा कर दिया गया है.


शफीकुर रहमान का प्लान क्या है?

1- मुस्लिम ब्रदरहुड

रहमान इस्लामी समूहों के गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, जो काफी हद तक वैचारिक रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ जुड़ा हुआ है. यह पूरा गठबंधन दशकों में अपने लिए सबसे बड़ा अवसर महसूस कर रहा है. उनकी पार्टी और कई अन्य इस्लामी संगठन लंबे समय से बांग्लादेश के 1971 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पाकिस्तान का समर्थन करने के आरोपों से घिरे हुए हैं, जिससे आज भी गुस्सा फूट रहा है. हालांकि जमात के स्टूडेंट विंग ने ढाका यूनिवर्सिटी सहित देश भर में कई यूनिवर्सिटी चुनावों में जीत हासिल की है. इन चुनावों को अक्सर राष्ट्रीय वोट के लिए एक लिटमस टेस्ट के रूप में देखा जाता है.

2- अल्पसंख्यकों का डर

रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावना ने बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदायों को डराकर रख दिया है. बांग्लादेश की लगभग 10 प्रतिशत आबादी गैर-मुस्लिम है, जिनमें से अधिकांश हिंदू हैं. रहमान ने इस डर को कम करने की कोशिश करते हुए जोर देकर कहा कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा "जाति या पंथ की परवाह किए बिना" की जाएगी. उन्होंने एक एक हिंदू उम्मीदवार को भी टिकट दिया है. इतना ही नहीं उन्होंने भारत के साथ "संतुलित" रिश्ते की भी बात की है.

3- जमात की कट्टरता

लेकिन सच्चाई तो यह है कि रहमान के जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन में कट्टरपंथी भी शामिल हैं जिन्होंने सांस्कृतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है, जिन्हें वे "इस्लामिक विरोधी" मानते हैं. वे संगीत और थिएटर उत्सव को बंद करना चाहते हैं, महिला फुटबॉल मैच को बैन करना चाहते हैं. यहां तक की उन्हें पतंगबाजी समारोह भी रास नहीं आ रहा. अधिक हिंसक तत्वों ने सूफी मंदिरों को तोड़ दिया है, और यहां तक ​​कि एक सूफी नेता के शरीर को कब्र से खोदकर आग लगा दी है.

4- महिलाओं को लेकर सोच

बांग्लादेश का नेतृत्व लंबे समय से शक्तिशाली महिलाओं द्वारा किया गया है. इसमें हसीना और उनकी लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी, तीन बार की दिवंगत प्रधान मंत्री खालिदा जिया शामिल हैं. लेकिन अब इसी बांग्लादेश में जमात ने किसी महिला को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया है. रहमान ने पिछले साल महिलाओं की नौकरियों के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा था कि वह घर पर रहने वाली माताों को प्रोत्साहित करना चाहते हैं. अब चुनाव के बीच भी वो अपनी ऐसी ही सोच को दिखा रहे हैं. उन्होंने एक रैली में कहा, "हम महिलाओं को घर में बंद नहीं करना चाहते - हमारे पास ताले खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं."

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