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न घर हैं न ठिकाना, बस चलते जाना... पूरा परिवार खोने के बाद रास नहीं आता है अपना घर, 30 साल से साइकिल पर खाक छान रहा यह बुजुर्ग

झांग ने अपने घर को छोड़ कर यात्रा को अपनी जिंदगी का मकसद बनाया, जो उन्हें पुराने दुखों से दूर रखता है और उन्हें सुकून देता है.

न घर हैं न ठिकाना, बस चलते जाना... पूरा परिवार खोने के बाद रास नहीं आता है अपना घर, 30 साल से साइकिल पर खाक छान रहा यह बुजुर्ग

चीन के 90 वर्षीय बुजुर्ग झांग झोंगयी को उनके परिजनों के खोने के गम ने अंदर तक तोड़ दिया है. जब 1990 के दशक में एक के बाद एक हुए हादसों ने उनके पूरे परिवार को उनसे छीन लिया, तो उन्होंने घर की चारदीवारी में कैद होकर रोने के बजाय सड़कों को अपना हमसफर बना लिया. पिछले 30 सालों से झांग अपनी साइकिल और अब अपनी ट्राइसिकल (तिपहिया साइकिल) पर सवार होकर पूरे चीन की खाक छान रहे हैं.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, हेनान प्रांत के कैफेंग शहर के रहने वाले झांग की यह यात्रा महज सैर-सपाटा नहीं है. दरअसल वह अपने भीतर के खालीपन को भरने की एक अंतहीन तलाश पर हैं.

झांग के जीवन में दुखों का पहाड़ 1990 के दशक में टूटा था. एक भीषण सड़क दुर्घटना में उनके बेटे, बहू और महज 8 साल के पोते की मौत हो गई. इस सदमे ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया. उनकी पत्नी इस गहरे दुख को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और अगले ही साल बीमारी के कारण उन्होंने भी दम तोड़ दिया. देखते ही देखते झांग इस दुनिया में बिल्कुल अकेले रह गए.

न घर हैं न ठिकाना... बस चलते जाना

खाली घर की यादें झांग को कचोटती थीं, इसलिए उन्होंने एक साहसी फैसला लिया. उन्होंने अपनी साइकिल उठाई और अपने घर को पीछे छोड़कर निकल पड़े. उनका मकसद किसी मंजिल तक पहुंचना नहीं, बल्कि चलते रहना था ताकि यादों का पीछा छोड़ा जा सके.

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई, झांग की हिम्मत कम नहीं हुई, बस उनकी सवारी बदल गई. अब वह साइकिल की जगह तिपहिया साइकिल का इस्तेमाल करते हैं. इन तीन दशकों में उन्होंने चीन के लगभग हर हिस्से को अपनी आंखों से देखा है. वह झिंजियांग के रेगिस्तानों से लेकर गांसु के पहाड़ों और शंघाई, झेजियांग और फुजियान जैसे आधुनिक शहरों तक का सफर तय कर चुके हैं.

झांग अक्सर नेशनल हाईवे के किनारे-किनारे चलते हैं. पहाड़ों, झीलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए उन्हें जो सुकून मिलता है, वह उन्हें अपने गांव की बंद कोठरी में कभी महसूस नहीं हुआ. झांग का कहना है कि घर लौटने का ख्याल ही उन्हें उन पुराने जख्मों की याद दिला देता है, जिन्हें वे पीछे छोड़ आए हैं.

इतना चलने के बाद क्या है झांग की आखिरी इच्छा?

झांग की यह भावुक कर देने वाली कहानी तब दुनिया के सामने आई जब फुजियान में बाई शियाओबाई नाम की एक महिला ने उनसे मुलाकात की. बाई ने न केवल उनकी आर्थिक मदद की, बल्कि उनके खाने-पीने और रहने का इंतजाम भी किया. झांग की याददाश्त अब उम्र के साथ धुंधली होने लगी है, लेकिन उनकी जीने की जिजीविषा और लोगों की दयालुता के कारण आज भी वह सफर कर पा रहे हैं.

हाल ही में, इस बुजुर्ग यात्री ने अपने गृह नगर लौटने की इच्छा जाहिर की है. कैफेंग के स्थानीय अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि जब वे वापस लौटेंगे, तो उन्हें हर संभव सरकारी सहायता और देखभाल मुहैया की जाएगी. फिलहाल, झांग अपनी ट्राइसिकल के पैडल मारते हुए अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे हैं. अब यात्रा ही उनका इलाज है और सड़कों पर चल रहे वाहन, पेड़-पहाड़ ही उनका परिवार है.

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