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This Article is From Oct 31, 2025

एक विवाह ऐसा भी.....जब दुल्हन खुद बारात लेकर पहुंच गई दूल्हे के घर, जानें फिर क्या हुआ

जोजोड़ा विवाह की परंपरा के तहत दुल्हन अपने साथ बारात लेकर दूल्हे के घर जाती है. बारात में दुल्हन के साथ एक दो नहीं बल्कि 100 से अधिक मेहमान होते हैं. लड़के वाले भव्य तरीके से दूल्हन का स्वागत करते हैं. उसके बाद दूल्हे के घर पर ही शादी की रस्में की जाती है.

एक विवाह ऐसा भी.....जब दुल्हन खुद बारात लेकर पहुंच गई दूल्हे के घर,  जानें फिर क्या हुआ
इस तरह के विवाह को जोजोड़ा कहा जाता है. इसका शब्द का अर्थ होता है जो जोड़ा भगवान खुद बनाते हैं.
  • उत्तरकाशी और हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती कई गांवों में अभी भी जोजोड़ा विवाह परंपरा चली आ रही है.
  • इस परंपरा में दुल्हन अपने साथ बारात लेकर दूल्हे के घर जाती है और शादी की रस्में लड़के के घर होती है.
  • यह परंपरा लगभग पांच दशक पहले लुप्त हो चुकी थी, लेकिन उत्तरकाशी के कुछ गांवों ने इसे आज भी जीवित रखा गया है.
देहरादून:

गाजे-बाजे के साथ बारात लेकर अगर कोई दुल्हन शादी करने के लिए दूल्हे के घर पहुंच जाए, तो ये देखकर आपका रिएक्शन क्या होगा. आप पक्का हैरान हो जाएंगा. क्योंकि आमतौर पर दूल्हा ही बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है, लेकिन उत्तरकाशी में ऐसे कई गांव हैं, जहां पर इसी तरह से शादी होती है. जहां दूल्हे की जगह दुल्हन बारात लेकर जाती है. उत्तरकाशी और हिमाचल प्रदेश के बॉर्डर क्षेत्र में बसे कई गांवों में सालों से ये परंपरा चली आ रही है. परंपरा के अनुसार दुल्हन फेरे और जयमाला से पहले ही दूल्हे की गैरमौजूदगी में घर से विदा होती है. दुल्हन अपने साथ बारात लेकर दूल्हे के घर जाती है. बारात में दुल्हन के साथ एक दो मेहमान नहीं बल्कि 100 से अधिक होते हैं. लड़के वाले भव्य तरीके से दूल्हन का स्वागत करते हैं. उसके बाद दूल्हे के घर पर ही शादी की रस्में की जाती है.

कई गांवों में चली आ रही है 'जोजोड़ा' विवाह परंपरा 

इस तरह के विवाह को जोजोड़ा कहा जाता है. इसका अर्थ होता है जो जोड़ा भगवान खुद बनाते हैं. दुल्हन के साथ बारात में जाने वाले बारातियों को जोजोड़िये कहा जाता है. इस परंपरा के पीछे एक खास उद्देश्य भी छुपा हुआ है. दरअसल ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बेटी के पिता पर आर्थिक बोझ न पड़े. ये परंपरा काफी गांवों से विलुप्त हो गई, लेकिन कुछ ऐसी गांव अभी भी हैं जिन्होंने इसे जीवित रखा है.

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लगभग पांच दशक पहले यह परंपरा लगभग लुप्त हो चुकी थी. लेकिन बंगाण क्षेत्र में न सिर्फ ग्रामीण इस परंपरा के गवाह बने बल्कि बाहर से आए लोग भी इस लुप्त हो चुकी परंपरा के गवाह बने. दरअसल उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील में आराकोट के कलीच गांव में कुछ दिन पहले पूर्व प्रधान कल्याण सिंह चौहान के बेटे मनोज चौहान की शादी हुई थी. यह शादी आम विवाह से खास थी. क्योंकि ग्राम जाकटा के जनक सिंह की बेटी कविता बारात लेकर मनोज चौहान के घर पहुंची थी. कविता ढोल नगाड़ों, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और 100 से ज्यादा बारातियों को लेकर कलीच मनोज चौहान के घर पहुंची थी. जहां पर इनकी शादी करवाई गई.

उत्तरकाशी जिले की मोरी तहसील में आराकोट और इससे लगता हुआ बाबर, जौनसार का चकराता, देहरादून का क्षेत्र और हिमाचल बॉर्डर क्षेत्र में इस तरह की परंपरा अभी भी चली आ रही है.

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