- इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी, पाइपलाइन लीकेज और सुधार की शिकायतें कम से कम 2022 से दर्ज थीं
- मध्य प्रदेश सरकार ने 2004 में एशियन डेवलपमेंट बैंक से जलापूर्ति सुधार के लिए 906 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था
- CAG ने 2013-18 के बीच 4481 पानी के नमूनों को BIS मानकों से नीचे पाया, पर कार्रवाई में भारी लापरवाही सामने आई
इंदौर में जो हुआ, वह कोई 'अचानक हुआ हादसा' नहीं था. यह एक ऐसी त्रासदी थी, जो सालों से सरकारी फाइलों में लिखी जा रही थी और बार-बार अनदेखी की जा रही थी. NDTV के हाथ लगे दस्तावेज़ बताते हैं कि भगीरथपुरा में दूषित पानी,पाइपलाइन लीकेज और नई पाइपलाइन बिछाने की ज़रूरत को लेकर शिकायतें और प्रस्ताव कम से कम 2022 से दर्ज थे. लेकिन ये फाइलें सिस्टम की गलियों में भटकती रहीं जब तक ज़मीन पर लाशें नहीं गिरीं और सच तो यह है कि इस संकट की जड़ें 2022 में नहीं, 2004 में बो दी गई थीं.
2004 - 906 करोड़ रु.-“हर घर साफ पानी”
साल 2004 में मध्य प्रदेश सरकार ने एशियन डेवलपमेंट बैंक से 200 मिलियन डॉलर (तब लगभग ₹906 करोड़) का कर्ज लिया.उद्देश्य था इंदौर, भोपाल, जबलपुर और ग्वालियर की जलापूर्ति सुधारना और हर नागरिक को साफ पीने का पानी देना.लेकिन 15 साल बाद, 2019 में, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने इस “वॉटर रिफॉर्म” की पोल खोल दी. CAG ने कहा, इंदौर और भोपाल में दूषित और प्रदूषित पानी सप्लाई हो रहा है, पाइपलाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर हैं, लीकेज बहुत ज़्यादा हैं, मॉनिटरिंग कमजोर है और सिस्टम में भ्रष्टाचार और लापरवाही घुस चुकी है सुधारों की सिफारिश की गई लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं बदला।
2025 - जब पानी दवा नहीं, जहर बन गया
आज इंदौर में कम से कम 11 लोगों की मौत दूषित पानी पीने से हो चुकी है।भगीरथपुरा में लोगों के घरों में नल से पानी नहीं, बीमारी आई.अस्पतालों में बेड भर गए.और “देश का सबसे साफ शहर” नए साल में एक ऐसा दाग लेकर दाखिल हुआ जिसे कोई रैंकिंग नहीं धो सकती.सरकार ने कहा सीवेज पानी पीने की लाइन में मिल गया.जांच बैठा दी गई.निलंबन हुए.कार्रवाई के आदेश हुए.लेकिन असली सवाल लोगों का है, अगर शिकायतें लगातार थीं, तो कार्रवाई लाशों के बाद ही क्यों?
फाइलों की टाइमलाइन: महीनों की नींद, मौतों के बाद दौड़
NDTV ने नगर निगम की जो फाइलें देखीं वो एक बेहद परेशान करने वाली तस्वीर दिखाती हैं, जुलाई 2022- भगीरथपुरा टैंक क्षेत्र की पाइपलाइन के लिए ₹2.4 करोड़ का टेंडर निकला, नवंबर 2022 - मेयर-इन-काउंसिल से मंजूरी मिली, फरवरी 2023- महीनों बाद जरूरी साइन हुए, नवंबर 12, 2024 नई फाइल बनी, फिर भी काम नहीं हुआ. अगस्त 8, 2025 -दूसरा टेंडर निकला (9 महीने बाद), सितंबर 17, 2025-टेंडर खोलने की तारीख तय, पर काम नहीं शुरू हुआ, 30 दिसंबर 2025 मौतों के बाद फाइल पर साइन, अगले दिन टेंडर खोला गया, काम फास्ट-ट्रैक पर, सवाल है जो काम महीनों में नहीं हुआ, वह मौतों के बाद घंटों में हो गया. अब जांच “क्या लीक हुआ” से हटकर “किसने रोका” पर आ गई है.
CAG की चेतावनी: जो लिखा था, वही हुआ
2019 की CAG रिपोर्ट आज भविष्यवाणी नहीं, चार्जशीट लगती है, तब CAG ने कहा इंदौर और भोपाल में पानी की आपूर्ति और वितरण में 30% से 70% का अंतर मतलब आधा पानी “गायब”. लीकेज शिकायतों पर कार्रवाई में 22 से 182 दिन की देरी, 2013–18 के बीच 4,481 सैंपल BIS मानकों पर फेल, पर रिकॉर्ड में कार्रवाई का पता नहीं. 23 में से 45 टंकियों की सफाई और जैविक जांच नहीं,बिना जांच का बोरवेल पानी सप्लाई सभी 20 सैंपल मानकों से बाहर, ₹470 करोड़ पानी का बकाया, कोई वॉटर ऑडिट नहीं, कोई मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं यानी सिस्टम ऐसा था जिसमें लीकेज दिखता नहीं, ज़िम्मेदारी तय नहीं होती और बीमारी तभी पकड़ी जाती है जब लोग मरने लगते हैं. भगीरथपुरा के संदर्भ में ऑडिट का सबसे डरावना हिस्सा पानी की गुणवत्ता से जुड़ा है.
पहले भी कई नमूनों मानकों के नीचे पाए गए थे
CAG ने दर्ज किया कि वर्ष 2013 से 2018 के बीच जांच किए गए 4,481 पानी के नमूने (भौतिक, रासायनिक और बैक्टीरियोलॉजिकल) BIS 10500 मानकों से नीचे पाए गए, यानी वे “अप्रतिकूल” थे. लेकिन रिकॉर्ड से यह पता नहीं चल सका कि नगर निगमों ने इन पर कोई कार्रवाई की भी या नहीं. रिपोर्ट में स्वतंत्र परीक्षणों का भी हवाला दिया गया, जिनमें 54 नमूनों में से 10 नमूने टर्बिडिटी और फीकल कॉलिफॉर्म के कारण फेल पाए गए.इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 8.95 लाख लोगों (भोपाल में 3.62 लाख और इंदौर में 5.33 लाख) को दूषित पानी की आपूर्ति की जा रही थी.इसी अवधि में लोक स्वास्थ्य विभाग ने 5.45 लाख जलजनित बीमारियों के मामलों की रिपोर्ट की.
CAG ने यह भी पाया कि जांच की गई 45 ओवरहेड टंकियों/रिज़रवॉयर में से 23 में न तो सफाई की गई थी और न ही गाद की अनिवार्य जैविक जांच जिससे इंजीनियरों और पर्यवेक्षकों द्वारा निगरानी की गंभीर कमी सामने आई. इसके अलावा CAG ने बताया कि इंदौर नगर निगम बिना किसी गुणवत्ता परीक्षण के बोरवेल का पानी सप्लाई कर रहा था. संयुक्त परीक्षणों में सभी 20 बोरवेल नमूने BIS मानकों से बाहर पाए गए कुछ में फीकल कॉलिफॉर्म भी मिला जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिम की ओर इशारा करता है. भगीरथपुरा कोई अपवाद नहीं है.यह उस सिस्टम का नतीजा है जिसे सालों पहले फेल घोषित किया जा चुका था लेकिन चलने दिया गया.क्योंकि यहां सिर्फ पाइपलाइन नहीं टूटी. यहां भरोसा टूटा.और कुछ लोगों के लिए ज़िंदगी भी.
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