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सूखा मौसम, विकास या इंसानी चूक... उत्तराखंड में जंगलों की आग क्यों बन रही है हर साल की कहानी?

उत्तराखंड के जंगल एक बार फिर आग की चपेट में हैं. बिना बारिश, लंबा ड्राई सीजन, मानवीय गतिविधियां, बड़े निर्माण और जलवायु परिवर्तन ने जंगलों की आग को और भयावह बना दिया है. विशेषज्ञ बता रहे हैं कि हिमालय में जंगलों के जलने के पीछे क्या‑क्या कारण हैं.

सूखा मौसम, विकास या इंसानी चूक... उत्तराखंड में जंगलों की आग क्यों बन रही है हर साल की कहानी?
गर्मी में सुलग रहे उत्तराखंड के जंगल (एआई इमेज)
  • उत्तराखंड में इस वर्ष फरवरी से अप्रैल तक जंगलों में आग की घटनाएं बढ़कर 230 से अधिक दर्ज हुई हैं
  • जंगल ऊंचाई के अनुसार चीड़, बांज और देवदार जैसे विभिन्न पेड़ों से बने हैं, जिनमें आग लगने के कारण अलग-अलग
  • जंगलों में आग लगने के मुख्य कारणों में मानवीय गतिविधियां जैसे सिगरेट फेंकना और घास उगाने के लिए आग लगाना शामिल

एक तरफ उत्तर भारत में गर्मी कहर ढहा रही है, ठीक इसी समय उत्तराखंड में जंगल सुलग रहे हैं. चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, चकराता, पौड़ी, अल्मोड़ा और बागेश्वर में सबसे ज्यादा जंगलों में आग लगी है. उत्तराखंड में 15 फरवरी से 28 अप्रैल तक अब तक जंगलों में आग लगने की 230.5 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 154.97 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ है. सवाल यह है कि आखिर उत्तराखंड में जंगलों में आग क्यों लग रही है और उसके पीछे क्या कारण हैं.

बिना बारिश के सूखे मौसम में धधकते उत्तराखंड के जंगल

उत्तराखंड एक हिमालयी राज्य है, जहां भरपूर मात्रा में ग्लेशियर, जंगल और पहाड़ हैं, लेकिन इसके बावजूद हर साल जंगल की आग इस खूबसूरत राज्य पर साया बनकर छा जाती है. इस समय उत्तराखंड के जंगल धु‑धु कर जल रहे हैं. मार्च के आखिरी कुछ दिन और अप्रैल का महीना बीत गया, लेकिन ज्यादातर इलाकों में बारिश नहीं हुई. बिना बारिश के मौसम निकल जाने की वजह से उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की घटनाएं रिकॉर्ड हुई हैं.

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ऊंचाई के हिसाब से उत्तराखंड के जंगलों की बनावट

उत्तराखंड के पूर्व मुख्य वन संरक्षक श्रीकांत चंदोला के मुताबिक जंगलों में आग लगने की घटनाएं मानवीय भी हैं और प्राकृतिक भी. वे बताते हैं कि उत्तराखंड के जंगल दो हिस्सों में बंटे हैं. 1000 से 1500 मीटर तक के क्षेत्रों में चीड़ के जंगल हैं और 1500 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर बांज के घने जंगल पाए जाते हैं, जिन्हें जलावन और चारे के लिए काफी महत्व दिया जाता है. 2500 मीटर से ऊपर के इलाकों में देवदार, कैल, स्प्रूस, फर और बुरांश के पेड़ पाए जाते हैं.

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जंगलों की आग में मानवीय और प्राकृतिक दोनों कारण

श्रीकांत चंदोला का कहना है कि मानवीय पहलू की बात करें तो सबसे ज्यादा आग इंसानों की वजह से ही लगती है. लोग बीड़ी‑सिगरेट फेंक देते हैं या खाना बनाने के लिए आग जलाते हैं, जो जंगल में फैल जाती है. इसके अलावा घास उगाने के लिए भी जंगलों में आग लगाई जाती है, ताकि मवेशियों को हरी घास मिल सके. वे यह भी कहते हैं कि कई बार प्राकृतिक तौर पर भी जंगलों में आग लगने की घटनाएं होती हैं. पूर्व मुख्य वन संरक्षक के मुताबिक उत्तराखंड में ज्यादातर आग चीड़ के जंगलों में लगती है.

चीड़ और बांज के जंगलों में आग का खतरनाक स्वरूप

अगर ड्राई सीजन ज्यादा लंबा हो जाए तो बांज के जंगलों में लगने वाली आग ज्यादा भयानक हो जाती है, जिसे कंट्रोल करना नामुमकिन होता है. चीड़ की पत्तियों को पीरूल कहा जाता है और चीड़ के जंगलों में लगने वाली आग पेट्रोल की आग की तरह तेजी से फैलती है. इसके अलावा चीड़ के पेड़ से निकलने वाला ‘लिसा' नाम का पदार्थ भी पेट्रोल की तरह ही आग पकड़ता है और बेहद ज्वलनशील होता है. पर्यावरणविद और प्रोफेसर एसपी सती के मुताबिक उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर कंस्ट्रक्शन हुआ है, जिसमें सड़क और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हैं.

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कंस्ट्रक्शन, ब्लास्टिंग और जलवायु परिवर्तन का असर

इसकी वजह से जंगलों का तेजी से कटान हुआ है और पहाड़ों को खोदा गया है. वे कहते हैं कि सड़क निर्माण के दौरान हुई ब्लास्टिंग से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौजूद बड़े जलस्रोत, झरने और भूमिगत जल को नुकसान पहुंचा, जिनकी वजह से जंगलों में आद्रता बनी रहती थी. प्रोफेसर सती का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से मौसमी चक्र बदल रहा है. गर्मियों का मौसम लंबा हो रहा है और बारिश कम हो रही है. यही कारण है कि जंगल सूख रहे हैं और आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं.

बढ़ता टूरिज्म, ड्राई स्पेल और घटती आद्रता

इसके साथ ही उत्तराखंड में सड़कों का विकास और गाड़ियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. चारधाम और टूरिज्म सीजन में भारी संख्या में गाड़ियां आती हैं, जिससे हिमालयी क्षेत्र गर्म हो रहा है और वातावरण में आद्रता बेहद कम हो जाती है. उत्तराखंड मौसम विज्ञान केंद्र के निदेशक सीएस तोमर के मुताबिक अप्रैल के महीने में पिछले 15 दिनों तक ड्राई स्पेल रहा, यानी बारिश ना के बराबर हुई. इसकी वजह से हवा में आद्रता खत्म हो गई, जिसने जंगलों की आग को और भड़काया.

उनका कहना है कि जब बारिश नहीं होती और हवा में आद्रता नहीं रहती, तो आग लगने की घटनाएं ज्यादा होती हैं. हालांकि मौसम विभाग के अनुसार अगले कुछ दिनों में उत्तराखंड के कई ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश की संभावना है, जिससे आग की घटनाओं पर काबू पाया जा सकेगा.

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