मध्य प्रदेश में स्कूली शिक्षा के ढांचे और उसकी साख को लेकर बेहद हैरान करने वाले आंकड़े सामने आए हैं. राज्य के सरकारी स्कूलों में लगातार बच्चों की उपस्थिति घट रही है, जिसका सीधा असर स्कूलों के अस्तित्व पर पड़ रहा है. खुद सरकार द्वारा विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह सालों के भीतर प्रदेश में पहली से बारहवीं कक्षा तक के करीब 28 लाख छात्रों का नामांकन कम हो गया है. वहीं, बीते एक दशक में 32 हजार से अधिक सरकारी प्राथमिक स्कूल बंद या मर्ज हो चुके हैं. शिक्षा व्यवस्था के इस ढर्रे को लेकर अब सरकार के अपने ही आंकड़ों में विरोधाभास के सवाल भी खड़े होने लगे हैं.
28 लाख बच्चों ने छोड़ा सरकारी स्कूलों का साथ
कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल के लिखित जवाब में स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने जो आंकड़े पेश किए हैं वह सरकारी शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाती है. वर्ष 2020-21 से लेकर 2026-27 के बीच कक्षा 1 से 12 तक के नामांकन में भारी गिरावट दर्ज की गई है. इनमें सबसे बड़ा झटका प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 8) को लगा है, जहां 25.40 लाख बच्चों का नामांकन कम हुआ है. वहीं कक्षा 9 से 12 के बीच करीब 2 लाख छात्रों की संख्या घटी है. नामांकन में आई इस भारी कमी के चलते प्राथमिक विद्यालयों का ताना-बाना बिखर रहा है और पिछले 10 सालों में सरकारी प्राथमिक स्कूलों की संख्या 1,14,237 से घटकर 81,663 पर आ गई है.

हजारों स्कूलों में गिनती के छात्र, नियमित शिक्षकों का अकाल
प्रदेश के हजारों स्कूल अब केवल नाममात्र के रह गए हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 6,082 स्कूल ऐसे संचालित हो रहे हैं जहाँ 10 से भी कम छात्र नामांकित हैं, जबकि करीब 13,820 स्कूलों में बच्चों की संख्या 20 से भी कम है. शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होने का एक बड़ा कारण नियमित शिक्षकों की घटती संख्या भी माना जा रहा है. वर्ष 2016-17 में जहां प्रदेश में 3,45,043 नियमित शिक्षक कार्यरत थे, वहीं 2025-26 में यह आंकड़ा सिमटकर 3,19,826 रह गया है. नियमित शिक्षकों की जगह व्यवस्था को अतिथि शिक्षकों के भरोसे ढकेला जा रहा है, जिनकी संख्या 63,986 से बढ़कर 81,563 पहुंच चुकी है.
मूलभूत सुविधाओं का अभाव और सरकार के दावों में विरोधाभास
आंकड़ों का सबसे दिलचस्प और विवादित पहलू मूलभूत सुविधाओं को लेकर सरकार के दावों में सामने आया है.
विधायक प्रताप ग्रेवाल के मुताबिक, फरवरी 2026 में खुद सरकार ने स्वीकार किया था कि प्रदेश में 5,735 स्कूल जर्जर हैं और 3,500 से अधिक स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए शौचालय नहीं हैं. उनके मुताबिक महज कुछ महीनों के भीतर जर्जर और शौचालय विहीन स्कूलों का आंकड़ा शून्य बता देना और शिक्षकों की स्वीकृत संख्या में भारी अंतर पेश करना सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े करता है.
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अध्ययन के लिए बनाई गई संस्था भी मौन
सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन और बदहाल होते ढर्रे के कारणों का पता लगाने के लिए सरकार ने मई 2025 में 'अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान' को विस्तृत अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी थी. हालांकि, लंबा समय बीत जाने के बाद भी संस्थान की रिपोर्ट अब तक सामने नहीं आ सकी है. एक तरफ सरकार जमीनी कारणों को समझने में देरी कर रही है, तो दूसरी तरफ घटती छात्र संख्या और विरोधाभासी आंकड़े यह बता रहे हैं कि मध्य प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था इस वक्त गंभीर आंतरिक संकट से जूझ रही है.
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