- उत्तराखंड में लगभग चार हजार चार सौ नब्बे प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू किया गया है.
- प्राधिकरण ने संकटग्रस्त जल स्रोतों की पहचान कर पुनरुद्धार के लिए मोबाइल एप्लीकेशन विकसित की है.
- जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड के प्राकृतिक जल स्रोत सूखने या मार्ग बदलने की स्थिति में हैं.
उत्तराखंड में लगातार जैसे-जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ रहा है, आबादी भी पहाड़ों से लेकर मैदानों में बढ़ रही है और जिसके कारण सबसे ज्यादा जरूरत पीने के पानी की हो रही है. लेकिन बढ़ते निर्माण के कारण उत्तराखंड के प्राकृतिक जल स्रोत या तो सूख रहे हैं या फिर उनकी हालत बहुत ही खराब हो गई है. इसके अलावा कई जल स्रोतों ने अपना रास्ता ही बदल दिया है. ऐसे में उत्तराखंड में प्राकृतिक जल स्रोतों और बारिश पर आधारित नदियों को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया गया है.
प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम शुरू
राज्य में लगभग 4490 प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया गया है, जिसमें 396 ऐसे जल स्रोत हैं जो संकटग्रस्त हो चुके हैं. इसके अलावा राज्य के 13 जिलों में पौड़ी जिला में सबसे ज्यादा प्राकृतिक जल स्रोत संकटग्रस्त हैं और इन सभी प्राकृतिक स्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन प्राधिकरण यानी सारा के द्वारा किया जाएगा.
जैसे-जैसे विकास होता है, उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है. कभी जंगलों को काटकर तो कभी पहाड़ों को काटकर. इसका सीधा असर प्राकृतिक जल स्रोतों और बारिश पर आधारित नदियों पर पड़ता है, क्योंकि जब बारिश होती है तब उसका पानी बिना किसी रुकावट के सीधे नीचे बह जाता है. न तो वह रुकता है और न ही वह पानी भूमिगत हो पाता है, क्योंकि ज्यादा जंगलों के कटान की वजह से मिट्टी का कटाव तेजी से होता है.
वहीं, दूसरी ओर, पहाड़ों को काटने से कई प्राकृतिक स्रोत या तो सूख जाते हैं या फिर अपना रास्ता बदल लेते हैं. ऐसे में बढ़ती आबादी के लिए पीने के पानी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है. पिछले कुछ सालों में जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन हुआ है और मौसमी चक्र में बदलाव आया है, उससे पीने के पानी की समस्या और बढ़ गई है.

पहाड़ी राज्य में हजारों प्राकृतिक स्रोत
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में हजारों प्राकृतिक स्रोत हैं, जिनका उपयोग इंसान पीने के पानी के लिए करते हैं. इन प्राकृतिक स्रोतों का उपयोग न सिर्फ इंसान बल्कि वन्य जीव भी करते हैं. इसके अलावा वर्षा पर आधारित उत्तराखंड में कई नदियां हैं. जब बारिश होती है तो ये नदियां काफी रिचार्ज हो जाती हैं, जिससे इनमें साल भर पानी बना रहता है. लेकिन उत्तराखंड में पिछले कुछ सालों में तेजी से सड़कों का निर्माण हुआ है, बड़े-बड़े बांध बने हैं और लोगों की बसावट के लिए कंक्रीट का जंगल फैल गया है. ऐसे में इसका सीधा असर प्राकृतिक स्रोतों और वर्षा पर आधारित नदियों पर पड़ रहा है.
सरकार ने लोगों से नदियों की जानकारी देने की अपील
उत्तराखंड सरकार ने राज्य के प्राकृतिक स्रोतों को बचाने और वर्षा पर आधारित नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन प्राधिकरण यानी सारा का गठन किया है. इस प्राधिकरण ने ‘भागीरथी' मोबाइल एप्लीकेशन भी बनाया है, जिसमें उत्तराखंड के सभी नागरिकों से अपील की गई है कि वे अपने गांव, कस्बों और शहरों में प्राकृतिक जल स्रोतों और वर्षा पर आधारित नदियों की जानकारी दें. इस मोबाइल एप्लीकेशन को ‘धारा मेरी, नौला मेरा, गांव मेरा, प्रयास मेरा' थीम के साथ शुरू किया गया था, जिसमें राज्य के नागरिकों से अपील की गई थी कि वे संकटग्रस्त या सूखते जल स्रोतों की पहचान कर उनकी स्थिति, जानकारी और तस्वीरें सरकार के साथ साझा करें. इसके बाद स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन प्राधिकरण यानी सारा एप्लीकेशन से मिली जानकारी को संबंधित जिलाधिकारी या अधिकारियों से सत्यापित कराकर उन्हें पुनर्जीवित करने का काम करेगी.
पूरे राज्य से लगभग 4490 प्राकृतिक स्रोत अभी तक चिन्हित
स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन प्राधिकरण यानी सारा में पूरे राज्य से लगभग 4490 प्राकृतिक स्रोत अभी तक चिन्हित किए गए हैं, जिनके पुनर्जीवन का काम शुरू कर दिया गया है. इन प्राकृतिक स्रोतों में धारा, नौला, गदेरा और नदियां शामिल हैं. ये सभी ऐसे स्रोत हैं, जिनसे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले गांव, शहर और बड़े कस्बों में पीने के पानी की सप्लाई की जाती है. वहीं 4490 प्राकृतिक जल स्रोतों में करीब 1151 स्रोत ऐसे हैं जो 20% तक संकटग्रस्त हैं, 1269 स्रोत 21% से 40% तक संकटग्रस्त हैं, 986 स्रोत 41% से 60% तक, 605 स्रोत 61% से 80% तक और 396 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
उत्तराखंड के 13 जिलों में सबसे ज्यादा पौड़ी जिले में प्राकृतिक स्रोत या वर्षा पर आधारित नदियां संकटग्रस्त हैं.
- टिहरी जिले में 20% से कम 181 प्राकृतिक स्रोत संकटग्रस्त हैं, 186 स्रोत 21% से 40% तक, 151 स्रोत 41% से 60% तक, 77 स्रोत 61% से 80% तक और 47 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- पौड़ी जिला—20% से कम 138 स्रोत, 21% से 40% में 162 स्रोत, 41% से 60% में 165 स्रोत, 61% से 80% में 111 स्रोत और 81% से अधिक में 72 स्रोत संकटग्रस्त हैं.
- अल्मोड़ा जिला—152 स्रोत 20% से कम, 170 स्रोत 21% से 40%, 109 स्रोत 41% से 60%, 80 स्रोत 61% से 80% और 41 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- पिथौरागढ़ जिला—96 स्रोत 20% से कम, 107 स्रोत 21% से 40%, 110 स्रोत 41% से 60%, 103 स्रोत 61% से 80% और 184 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- देहरादून जिला—140 स्रोत 20% से कम, 163 स्रोत 21% से 40%, 78 स्रोत 41% से 60%, 36 स्रोत 61% से 80% और 84 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- चमोली जिला—102 स्रोत 20% से कम, 122 स्रोत 21% से 40%, 83 स्रोत 41% से 60%, 58 स्रोत 61% से 80% और 32 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- रुद्रप्रयाग जिला—145 स्रोत 20% से कम, 118 स्रोत 21% से 40%, 63 स्रोत 41% से 60%, 17 स्रोत 61% से 80% और 17 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- नैनीताल जिला—59 स्रोत 20% से कम, 107 स्रोत 21% से 40%, 78 स्रोत 41% से 60%, 47 स्रोत 61% से 80% और 30 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- बागेश्वर जिला—55 स्रोत 20% से कम, 45 स्रोत 21% से 40%, 49 स्रोत 41% से 60%, 21 स्रोत 61% से 80% और 12 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- चंपावत जिला—40 स्रोत 20% से कम, 39 स्रोत 21% से 40%, 58 स्रोत 41% से 60%, 22 स्रोत 61% से 80% और 11 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- उत्तरकाशी जिला—38 स्रोत 20% से कम, 37 स्रोत 21% से 40%, 38 स्रोत 41% से 60%, 27 स्रोत 61% से 80% और 12 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- उधम सिंह नगर जिला—3 स्रोत 20% से कम, 12 स्रोत 21% से 40%, 4 स्रोत 41% से 60%, 6 स्रोत 61% से 80% और 0 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
- हरिद्वार जिला—2 स्रोत 20% से कम, 1 स्रोत 21% से 40%, 0 स्रोत 41% से 60%, 0 स्रोत 61% से 80% और 8 स्रोत 81% से अधिक संकटग्रस्त हैं.
स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन प्राधिकरण की एसीईओ कहकशा नसीम ने बताया कि प्राधिकरण का उद्देश्य प्राकृतिक स्रोतों को पुनर्जीवित करना है, ताकि पीने के पानी की कोई परेशानी न हो. उन्होंने बताया कि पुनर्जीवन के लिए विशेषज्ञों की टीम लगाई गई है, जिसमें स्थानीय लोगों की भी भागीदारी सुनिश्चित की गई है. इसके अलावा प्राकृतिक स्रोतों की मैपिंग और चिन्हांकन किया जा रहा है तथा राज्य और जिला स्तर पर समन्वय स्थापित कर काम किया जा रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि उत्तराखंड की 12 नदियों को भी पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया गया है और उनके पानी को निर्मल व स्वच्छ बनाने पर काम चल रहा है.
कहकशा नसीम ने बताया कि तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण मौसमी चक्र में बदलाव आया है, यही वजह है कि जो प्राकृतिक स्रोत पहले गांवों में मौजूद थे, वे अब सूखने के कगार पर पहुंच रहे हैं. इसके अलावा अंधाधुंध निर्माण भी इसके लिए जिम्मेदार है. प्राकृतिक स्रोतों और नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए हाइड्रोलॉजिकल विभाग से अध्ययन कराया जा रहा है और लगातार इसकी समीक्षा की जा रही है. साथ ही पेयजल निगम, जल संस्थान, सिंचाई, लघु सिंचाई, वन विभाग और ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से, स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ इस दिशा में काम किया जा रहा है.
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