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बद्रीनाथ में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से पर्यावरण पर बढ़ा खतरा, बर्फबारी घट रही और मक्खियां बढ़ी रही हैं

हिमांशु जोशी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    जून 01, 2026 15:12 pm IST
    • Published On जून 01, 2026 15:10 pm IST
    • Last Updated On जून 01, 2026 15:12 pm IST
बद्रीनाथ में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या से पर्यावरण पर बढ़ा खतरा, बर्फबारी घट रही और मक्खियां बढ़ी रही हैं

बद्रीनाथ में पर्यटकों की बढ़ती संख्या धार्मिक पर्यटन और प्लास्टिक कचरे की वजह से पारंपरिक जीवनशैली बदल रही है. अलकनंदा समेत आसपास के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है.

अंबिका प्रसाद कोटियाल बद्रीनाथ मंदिर के पीछे स्थित झंडा मोहल्ला गांव के निवासी हैं. कोटियाल छह भाई हैं. उनके पिता की बद्रीनाथ में कपड़ों की दुकान और रेस्टोरेंट है, जिसे अब वह संभाल रहे हैं. कोटियाल के मुताबिक पिछले कुछ सालों में यहां के मौसम, पर्यावरण और जीवनशैली में तेजी से बदलाव आया है. कोटियाल बताते हैं कि पहले यहां बादलों की गर्जना सुनाई नहीं देती थी, लेकिन पिछले दस-पंद्रह सालों में मौसम का स्वरूप बदल गया है. अब यहां अक्सर बादलों की तेज आवाज सुनाई देती है और बेमौसम बारिश भी होने लगी है.

बर्फबारी में आई गिरावट 

कोटियाल के मुताबिक करीब 40 साल पहले मंदिर के पीछे की पहाड़ियों में अप्रैल-मई में एक से डेढ़ फुट तक बर्फ गिरती थी. लेकिन अब बर्फबारी केवल अक्तूबर-जनवरी से बीच सिमट कर रह गई है. अगर अप्रैल-मई में बर्फबारी होती भी है तो वह चार-पांच इंच तक ही होती है. कोटियाल बर्फबारी में आई कमी का असर नदियों के जलस्तर पर भी देख रहे हैं. वो बताते हैं कि पानी की मात्रा पहले की तुलना में काफी घट गई है.

बदरीनाथ में धार्मिक पर्यटन बढ़ने के साथ ही वहां के बाजार का स्वरूप भी बदल गया है. उनके अनुसार पहले श्रद्धालु मुख्य रूप से मंदिर और पूजा-पाठ से जुड़े सामान ही खरीदते थे, लेकिन अब गर्म कपड़ों का कारोबार तेजी से बढ़ा है.

खेतों में बनते किराये के ढांचे

इसका असर पहाड़ की खेतीबाड़ी पर भी पड़ा है. कोटियाल के मुताबिक आसपास के गांवों में पहले आलू, फाफर जैसे मोटे अनाज और मूली की खेती बड़े पैमाने पर होती थी. हालांकि पिछले करीब दस सालों में खेती का दायरा लगातार सिमट रहा है. अब कई लोग खेतों में फसल बोने की जगह वहां अस्थायी झुग्गियां और कमरे बनाकर उन्हें किराए पर देना शुरू कर दिया है.
उनके अनुसार पर्यटन आधारित गतिविधियां अब स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बनती जा रही हैं. इस वजह से पारंपरिक खेती धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही है.

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता कूड़ा

अलकनंदा नदी, कूड़े और बढ़ते निर्माण कार्यों को लेकर भी स्थानीय लोग चिंता जता रहे हैं. कोटियाल बताते हैं कि करीब 30 साल पहले यहां बहुत कम कूड़ा निकलता था. कूड़े में अधिकतर मालू के पत्तों से बनी प्लेटें जैसी प्राकृतिक चीजें होती थीं, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाने वाली होती थीं. इस तरह के कूड़े को स्थानीय लोग जमीन में दबा देते थे. लेकिन अब स्थिति यह है कि बद्रीनाथ से ट्रकों में भरकर प्लास्टिक का कूड़ा बाहर ले जाना पड़ रहा है.

उन्होंने तप्त कुंड को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने बताया कि तप्त कुंड का गर्म पानी प्राकृतिक रूप से औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है. इस पानी में श्रद्धालु दर्शन से पहले स्नान करते हैं. लेकिन अब तीर्थ यात्रा पर आए कई श्रद्धालु उसमें साबुन और शैंपू का इस्तेमाल करने लगे हैं, यही पानी सीधे अलकनंदा नदी में जाकर मिल रहा है, जिससे नदी का जल प्रदूषित हो रहा है. इस प्रदूषण ने स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है.

तुलसी की महक हुई है कम और मक्खियों का आगमन

भास्कर डिमरी, बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति के पूर्व सदस्य हैं. वो बताते हैं कि पर्यावरण संकट का असर पिछले 15 सालों में यहां की तुलसी में भी देखने को मिल रहा है. वो बताते हैं कि पहले यहां उगने वाली तुलसी की महक दूर तक महसूस की जा सकती थी. लेकिन अब उसकी खुशबू और आकार दोनों ही कम हो गए हैं. डिमरी के मुताबिक पिछले दो सालों से यहां मक्खियां और उनसे मिलते-जुलते अन्य कीट-पतंगे भी दिखाई देने लगे हैं. उनका मानना है कि बढ़ता कूड़ा और बदलता पर्यावरण, इसकी एक बड़ी वजह हो सकते हैं.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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