- प्रतापगढ़ के कुंडा स्थित बेंती कोठी में दशहरे के अवसर पर राजा भैया ने परंपरागत शस्त्र पूजन किया
- इस पूजा में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पांच सौ से अधिक हथियारों का पूजन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुए
- राजा भैया का राजनीतिक सफर 30 सालों से ज्यादा पुराना है और वे सात बार कुंडा से विधायक चुने गए हैं
विजयादशमी पर एक बार फिर प्रतापगढ़ के कुंडा स्थित बेंती कोठी चर्चा का केंद्र बन गई. कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने परंपरा के मुताबिक शस्त्र पूजन किया। केसरिया पगड़ी पहने राजा भैया वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा-अर्चना करते नजर आए. इस दौरान 500 से अधिक हथियारों का पूजन किया गया, जिनमें कई आधुनिक हथियार भी शामिल बताए गए. बड़ी संख्या में समर्थक भी अपने लाइसेंसी असलहों के साथ बेंती कोठी पहुंचे.
हर साल करते हैं शस्त्र पूजन
दशहरे पर होने वाला यह शस्त्र पूजन वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा माना जाता है. पूजा के दौरान आरती, प्रसाद वितरण और अन्य धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. राजा भैया ने इसे सनातन संस्कृति की परंपरा और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक बताया.
हालांकि बेंती कोठी में सजे हथियारों की तस्वीरें हर साल सिर्फ धार्मिक आयोजन की वजह से ही चर्चा में नहीं रहतीं. यह आयोजन राजा भैया की उस राजनीतिक पहचान और प्रभाव की भी याद दिलाता है, जिसकी चर्चा कुंडा से लेकर लखनऊ तक होती रही है.
तीन दशक से ज्यादा पुराना है राजनीतिक सफर
राजा भैया का राजनीतिक सफर तीन दशक से ज्यादा पुराना है. वह 1993 में पहली बार कुंडा से विधायक चुने गए थे और उसके बाद लगातार सात बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं. वह उत्तर प्रदेश सरकार में पांच बार मंत्री भी रह चुके हैं. बाद में उन्होंने जनसत्ता दल लोकतांत्रिक का गठन कर अपनी अलग राजनीतिक राह बनाई.
कुंडा क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ और समर्थकों के बीच प्रभाव उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जाती है. वहीं दूसरी ओर उनकी बाहुबली छवि और विभिन्न विवादों को लेकर भी उनका नाम समय-समय पर चर्चा में रहा है. हालांकि आरोप और अदालत में साबित अपराध अलग-अलग विषय हैं.
दशहरे पर बेंती कोठी का यह आयोजन एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है. समर्थक इसे परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बताते हैं, जबकि राजनीतिक जानकार इसे राजा भैया के लंबे समय से कायम प्रभाव और रसूख की झलक के रूप में भी देखते हैं. कुंडा की राजनीति में इस परंपरा की चर्चा हर साल दशहरे के साथ फिर शुरू हो जाती है.
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