- विधानसभा चुनाव से पहले कुंडा में राजा भैया द्वारा बाबा बागेश्वर की कथा आयोजन का ऐलान किया गया है
- सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के प्रवचनों पर आपत्ति जताते हुए राजा भैया पर भी तंज कसा है
- कुंडा विधानसभा सीट का जातीय समीकरण अहम है. यहां यादव, ब्राह्मण, दलित समाज की अच्छी खासी आबादी है
उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव है और उससे पहले राजनीति के केंद्र में कथाएं आ गई हैं. राज्य के अलग-अलग हिस्सों में कथाएं हो रही हैं. पिछले दिनों रायबरेली के ऊंचाहार में प्रदीप मिश्रा कथा करने पहुंचे थे, जिसका आयोजन मंत्री मनोज पांडेय ने कराया था. अब राजा भैया ने कुंडा में बाबा बागेश्वर की कथा का आयोजन कराने का ऐलान किया है. इस बीच सपा मुखिया अखिलेश यादव खुद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के खिलाफ मुखर हैं. यहां तक कि उन्होंने इशारों में राजा भैया पर भी अटैक कर दिया है कि कथावाचक तो चले जाएंगे, लेकिन आयोजकों को यहीं रहना है. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के प्रवचन के एक हिस्से को भगवान कृष्ण के खिलाफ बताते हुए अखिलेश हमलावर हैं. ऐसे में सवाल यह है कि धीरेंद्र कृष्ण के बहाने कुंडा के आयोजन और राजा भैया की चर्चा क्यों तेज की गई है. जानकार मानते हैं कि इसके पीछे कुंडा विधानसभा सीट का समीकरण है.
अखिलेश यादव इस सीट पर राजा भैया के खिलाफ पीडीए वाली गोलबंदी करना चाहते हैं. संयोग की बात है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का आयोजन पहले से तय था, लेकिन अब उनके बयान की चर्चा करके अखिलेश यादव हमला बोल रहे हैं. शायद उन्हें लगता है कि इसके जरिए पीडीए वाली एकजुटता बन सकेगी. 2022 के चुनाव को भी शायद सपा के एक उदाहरण के तौर पर देख रही है, जब गुलशन यादव को राजा भैया के मुकाबले उतारा गया था. राजा भैया को 30,315 वोटों से जीत मिली थी. भले ही राजा भैया जीत गए थे, लेकिन बीते 20 सालों में उनकी जीत का यह सबसे कम अंतर था. यही कारण है कि अखिलेश यादव एक संभावना देख रहे हैं कि शायद कुंडा में राजा भैया को घेरा जा सकता है.
कुंडा का जातीय समीकरण भी इसकी एक वजह है. कुंडा में भले ही लगातार राजा भैया का दबदबा बना हुआ है, लेकिन किसी एक जाति की आबादी को देखें तो सबसे ज्यादा 75 हजार यादव हैं. इसके अलावा 90 हजार दलित वोटर हैं और इनमें सबसे प्रभावी पासी समाज के लोग हैं. फिर 50 हजार ब्राह्मण हैं और 18 हजार ठाकुर हैं. वैश्य समाज की आबादी 10 हजार ही है. 30 हजार कुर्मी और 55 हजार मुसलमान हैं. इसके अलावा 15 हजार आबादी मौर्य समाज की है. इस तरह सवर्ण समाज की बात करें तो उनकी आबादी सब मिलाकर 80 हजार के करीब ही हैं. वहीं अखिलेश यादव जिस पीडीए का नारा दे रहे हैं, वह ढाई लाख के करीब है.
2022 में राजा भैया की जीत का सबसे कम था अंतर
ऐसे में राजा भैया को पीडीए का नारा देते हुए घेरने की कोशिश हो सकती है. राजा भैया के खिलाफ लामबंदी और फिर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान के बहाने सपा खुद को नई ताकत मिलती देख रही है. बीते 5 चुनावों में राजा भैया की जीत का सबसे कम अंतर 2022 में ही था और इसी के चलते सपा को अब एक उम्मीद दिख रही है. राजा भैया ने 2002 में सपा के मोहम्मद शमी को 81,678 को हराकर जीत हासिल की थी. तब उन्हें विधानसभा के 82 पर्सेंट वोट मिले थे. फिर 2007 में बसपा के शिवप्रकाश मिश्रा को 53,128 वोटों से हराया था.
लगातार तीन चुनाव में सपा ने राजा भैया के मुकाबले नहीं उतारा था कैंडिडेट
2012 में फिर से उन्हीं शिव प्रकाश को 88 हजार वोट से हराया था. 2017 में वह भाजपा के मुकाबले 1 लाख से ज्यादा वोटों से जीते थे. 2007 से 2017 तक तीन चुनावों में सपा ने राजा भैया के खिलाफ कैंडिडेट नहीं उतारा था. लेकिन 2022 में उतारा और आक्रामक प्रचार भी किया. अखिलेश यादव ने कुंडा में कुंडी लगाने वाली बात भी कही थी. गुलशन यादव ने पूरे दम से चुनाव लड़ा था और राजा भैया की जीत का अंतर पहली बार इतना कम हो गया. शायद यही वजह है कि सपा ने राजा भैया की घेरेबंदी पहले से ही तेज कर दी है.
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