इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और मुआवजे को लेकर अबतक की सरकारी कार्यप्रणाली पर नाराजगी व्यक्त की है. एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए एक व्यापक पुनर्वास ढांचा लागू करने में राज्य सरकार की विफलता पर चिंता व्यक्त करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के प्रमुख सचिव (गृह) और महिला व बाल कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है.
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि कोर्ट द्वारा बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद और पिछले आदेशों में विशेष प्रश्न उठाए जाने के बाद भी इस बात का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि राज्य सरकार द्वारा एसिड हमले से बचे लोगों के लिए एक व्यवस्थित और व्यापक नीति अभी तक क्यों नहीं बनाई गई है? कोर्ट के सामने पेश की गई सामग्री से यह पता नहीं चलता कि इस मुद्दे को समय-सीमा के अंदर और प्रभावी ढंग से हल करने के लिए उच्चतम प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस प्रयास किया गया है.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल एकमुश्त मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है बल्कि राज्य की जिम्मेदारी पीड़ितों के संपूर्ण पुनर्वास तक विस्तारित होती है. कोर्ट ने माना कि ऐसे हालात में इस मामले पर संबंधित डिपार्टमेंट के सबसे सीनियर अधिकारियों के साथ सीधे बातचीत करने की जरूरत है ताकि एक प्रभावी नीति बनाने में अगर कोई रुकावट आ रही है तो उसे पहचाना जा सके और बिना किसी और देरी के सही कदम उठाए जा सकें.
कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना और नागरिकों के जीवन और शारीरिक सुरक्षा की रक्षा करना, संविधान की सातवीं सूची की लिस्ट-II के अंतर्गत राज्य का दायित्व है. ऐसे जघन्य अपराधों के मामलों में जिनसे किसी नागरिक का जीवन स्थायी रूप से प्रभावित हो जाता है, राज्य का दायित्व केवल अपराधी के अभियोजन तक सीमित नहीं होता बल्कि पीड़ितों के समुचित पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना भी उसका संवैधानिक कर्तव्य है जो संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त है.
याचिकाकर्ता की ये मांग
इलाहाबाद हाईकोर्ट अब इस मामले में 25 मई को अगली सुनवाई करेगी. यह आदेश जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिविजन बेंच ने फर्रुखाबाद से जुड़ी एक एसिड अटैक सर्वाइवर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. दरअसल, याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि वह एक एसिड अटैक सर्वाइवर है और उसे ज़्यादा मुआवजा और सरकारी नौकरी चाहिए. इस मामले में हाईकोर्ट में फरवरी 2026 से लगातार सुनवाई चल रही है.
याचिकाकर्ता ने मुआवजा बढ़ाने और सरकारी नौकरी की मांग की है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता जो घटना के वक्त सिर्फ 24 साल की थी उसे अब तक कुल मिलाकर मात्र 6 लाख रुपये का मुआवजा मिला है जो उसकी आजीवन पीड़ा और पुनर्वास की जरूरतों के मुकाबले बेहद कम है. कोर्ट ने कहा कि घटना के लगभग नौ साल बीत जाने के बावजूद राज्य सरकार द्वारा कोई ठोस पुनर्वास प्रयास रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है.
कोर्ट ने SC के इस फैसले का दिया हवाला
कोर्ट ने कहा कि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि एसिड अटैक सर्वाइवर अक्सर न सिर्फ़ शारीरिक सेहत से बल्कि रोज़ी-रोटी, सामाजिक स्वीकृति, शादी, इमोशनल सिक्योरिटी और समाज में इज्जतदार हिस्सेदारी की उम्मीदों से भी वंचित रह जाते हैं. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के Parivartan Kendra Vs Union of India के फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक पीड़ितों को 10 लाख रुपये तक मुआवजा देने की बात कही थी और यह स्पष्ट किया था कि मुआवजा केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि इसमें मानसिक पीड़ा, सामाजिक बहिष्कार और जीवनभर के नुकसान को भी शामिल किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले में कोर्ट में Laxmi Vs Union of India & Others का भी हवाला दिया गया, जिसमें न्यूनतम तीन लाख रुपये मुआवजा निर्धारित किया गया था. हाईकोर्ट ने कहा कि एसिड अटैक पीड़ितों की समस्या केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें चिकित्सा उपचार, पुनर्निर्माण सर्जरी, मनोवैज्ञानिक परामर्श, शिक्षा, रोजगार और समाज में सम्मानजनक पुनर्स्थापन शामिल है. कोर्ट ने राज्य सरकार के हलफनामे को भी अपर्याप्त बताते हुए कहा कि इसमें किसी ठोस नीति, समयसीमा या पुनर्वास तंत्र का उल्लेख नहीं है.
कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस गंभीर मुद्दे को राज्य द्वारा हल्के में लिया जा रहा है, जबकि यह पीड़ितों के जीवन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है. संवैधानिक पहलुओं पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के जीवन और गरिमा की रक्षा करना राज्य का दायित्व है और ऐसे मामलों में केवल अपराधी को सजा देना पर्याप्त नहीं, बल्कि पीड़ित के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी राज्य की है जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुनिश्चित की जानी चाहिए.
जताई नाराजगी
कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि एफिडेविट और विचार-विमर्श का अवलोकन किया है, लेकिन कोर्ट ने पाया है कि कोर्ट के बार-बार दिए गए आदेश और सुप्रीम कोर्ट के परिवर्तन केंद्र बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया, (2016) में की गई टिप्पणियों के बावजूद राज्य ने आज तक कोई ठोस पॉलिसी फ्रेमवर्क नहीं बनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक सर्वाइवर्स द्वारा झेले गए जीवन भर के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक नतीजों को पहचानते हुए साल 2016 में पीड़ित को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया था.
कोर्ट ने इन अधिकारियों को किया तलब
यह देखते हुए कि ऐसे मामलों में मुआवजा किसी तय या सिंबॉलिक रकम तक सीमित नहीं हो सकता है और इसमें लगी चोटों की प्रकृति, जारी मेडिकल ट्रीटमेंट, रिकंस्ट्रक्टिव प्रोसीजर, सामाजिक कलंक, सामान्य जीवन का नुकसान और लंबे समय तक सम्मान और मौकों से वंचित रहने का ध्यान रखना ज़रूरी है. कोर्ट के सामने पेश किए गए डॉक्यूमेंट्स में सिर्फ़ विभागों के बीच हुई बातचीत के बारे में बताया गया है लेकिन एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए कोई पहचाने जा सकने वाला पॉलिसी स्ट्रक्चर, सुझाए गए उपाय, टाइमलाइन, रिहैबिलिटेशन सिस्टम, या फाइनेंशियल फ्रेमवर्क नहीं बताया गया है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई पर संबंधित अधिकारी विस्तृत नीति, पुनर्वास योजना, मुआवजा निर्धारण के मानक और सहायता तंत्र के साथ उपस्थित हो. मामले की अगली सुनवाई 25 मई 2026 को निर्धारित की गई है.
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