Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में पत्नी को राहत देते हुए पत्नी द्वारा पति को नपुंसक बताने से जुड़े मानहानि के मामले में ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को सही तरीके से परखे बिना ट्रायल कोर्ट ने आदेश पारित किया था. कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा दिया गया बयान पति के प्रति बिना किसी गलत भावना के अच्छी नीयत से दिया गया है और उसका बयान पति की मेडिकल जांच रिपोर्ट से साबित होता है. इसलिए इन बातों पर विचार किए बिना ही ट्रायल कोर्ट द्वार समन आदेश पास कर दिया गया है और इसे रद्द किया जाना चाहिए. यह आदेश जस्टिस अचल सचदेव की सिंगल बेंच ने एक महिला द्वारा बीएनएसएस की धारा 528 में दायर अर्जी को मंजूर करते हुए दिया है.
मामले के अनुसार, महिला ने यह अर्जी अपर सिविल जज-फर्स्ट/एसीजेएम गोरखपुर द्वारा मानहानि मामले जारी समन के खिलाफ हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी. ट्रायल कोर्ट ने पति की तरफ से अपनी पत्नी याची महिला के खिलाफ आईपीसी की धारा 500 में मुकदमा दर्ज कराया था, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट ने महिला को समन आदेश जारी किया था.
पत्नी ने नपुंसक बताकर छवि खराब की- पति
महिला ने अपने पति को नपुंसक बताया था, जिसके बाद पति ने मानहानि का मामला दर्ज कराया. आरोप था कि पत्नी ने उसे नपुंसक बताते हुए उसकी छवि समाज में खराब की. इस पर ट्रायल कोर्ट ने 21 दिसंबर 2024 को पत्नी के खिलाफ समन जारी कर दिया था, जिसे चुनौती देते हुए पत्नी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया. पत्नी की ओर से दलील दी गई कि उसने जो आरोप लगाए वो वास्तविक तथ्यों पर आधारित हैं.
आवेदक महिला की शादी 25 नवंबर 2022 को हुई थी, लेकिन पति की शारीरिक अक्षमता के कारण विवाह कभी संपन्न (consummate) नहीं हो सका. इस संबंध में 27 अगस्त 2024 को गुरुग्राम के एक अस्पताल में कराए गए पोटेंसी टेस्ट में पति के हार्मोन स्तर कम पाए गए, जिससे उसकी स्थिति की पुष्टि होती है.
पति ने दवाब डालने के लिए की शिकायत
आवेदक महिला के अधिवक्ता ने कोर्ट में यह दलील दी कि उसके पति ने उसके खिलाफ एक फरवरी 2024 को एक शिकायत इसलिए दर्ज कराई थी, ताकि उस पर दबाव डालकर उससे अपने खिलाफ चल रहे सभी आपराधिक मामले वापस करवा सके.
पत्नी ने यह भी बताया कि उसने पति और उसके परिजनों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के मामले भी दर्ज कराए हैं. वहीं, पति ने कार्यवाही के जवाब में मानहानि की शिकायत दर्ज कराई, ताकि उस पर दबाव बनाया जा सके. पति की ओर से कहा गया कि पत्नी ने उसे नपुंसक बताकर उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई और यह बात परिवार व समाज में फैल गई जिससे उसकी छवि खराब हुई.
पत्नी के बयान की पुष्टि मेडिकल जांच रिपोर्ट से हुई
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी व्यक्ति को बिना ठोस चिकित्सीय प्रमाण के सार्वजनिक रूप से नपुंसक कहना प्रथम दृष्टया मानहानि हो सकता है. हालांकि, यदि ऐसा आरोप किसी वैध शिकायत या कानूनी कार्यवाही के तहत, सद्भावना में और अधिकृत प्राधिकरण के समक्ष किया गया हो तो उसे आईपीसी की धारा 499 के अपवाद के तहत संरक्षण मिल सकता है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इससे साफ पता चलता है कि पत्नी द्वारा दिया गया ऐसा बयान पति के प्रति द्वेष के बिना सद्भाव से दिया गया है और उसके बयान की पुष्टि पति की मेडिकल जांच रिपोर्ट से होती है.
कोर्ट के समक्ष आवेदक द्वारा उठाई गई दलील यह है कि आवेदक द्वारा पति के खिलाफ आपराधिक शिकायत में लगाया गया आरोप एक मेडिकल जांच रिपोर्ट द्वारा पुष्ट होता है. पति के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करने के बाद आवेदक ने हिंदू विवाह अधिनियम तहत सक्षम न्यायालय के समक्ष विपरीत पक्ष से तलाक की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की थी.
कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद माना कि ऐसा आरोप चोट पहुंचाने के द्वेषपूर्ण इरादे से नहीं लगाया गया है, बल्कि एक वास्तविक शिकायत के हिस्से के रूप में लगाया गया है. कोर्ट ने कहा कि ऐसा मामला तलाक का आधार हो सकता है बशर्ते मेडिकल जांच रिपोर्ट हो और शादी पूरी न हुई हो.
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर सही ढंग से विचार नहीं किया. इसलिए समन आदेश को रद्द करते हुए पत्नी को राहत देते हुए याचिका को कोर्ट ने स्वीकार कर लिया.
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