कुछ लोग फिल्मों में सिर्फ एक्टिंग करने नहीं आते, वो अपने पीछे एक पूरी विरासत छोड़ जाते हैं. ये कहानी भी ऐसे ही एक कलाकार की है, जिसकी जिंदगी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं थी. पापा डॉक्टर थे और मम्मी नर्स, इसलिए सबको लगा कि बेटा भी पढ़-लिखकर बड़ी नौकरी करेगा. पढ़ाई में तेज था, किताबों का दीवाना था और कविताएं लिखना उसे सबसे ज्यादा पसंद था. फिर जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि कवि बनने का सपना देखने वाला ये लड़का थिएटर और फिल्मों का बड़ा नाम बन गया. बाद में वही शख्स सलमान खान की टाइगर फ्रेंचाइजी में उनके बॉस के रोल में नजर आया और नई जनरेशन का भी फेवरेट बन गया. ये कहानी है गिरीश कर्नाड की, जिनका जन्म 19 मई 1938 को हुआ.
ऑक्सफोर्ड पहुंचा तो बदल गई सोच
गिरीश कर्नाड का जन्म महाराष्ट्र में हुआ था. बचपन से ही पढ़ाई में काफी अच्छे थे. घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था, इसलिए गिरीश का झुकाव भी किताबों की तरफ हो गया. आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें रोड्स स्कॉलरशिप मिली और वे इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंच गए. वहां उन्होंने फिलॉसफी, पॉलिटिक्स और इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की. लेकिन असली मजा उन्हें लाइब्रेरी में घंटों बैठकर कविताएं और कहानियां पढ़ने में आता था.

कवि बनने निकले थे, बन गए स्टार
ऑक्सफोर्ड में रहते हुए गिरीश कर्नाड का सपना था कि वे एक बड़े कवि बनें. लेकिन वहीं उन्हें एहसास हुआ कि भारतीय कहानियों में इतना दम है कि उन्हें पूरी दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है. बस यहीं से उनकी जिंदगी बदल गई. उन्होंने नाटक लिखना शुरू किया और साल 1961 में लिखा गया उनका पहला नाटक 'ययाति' जबरदस्त चर्चा में आ गया. इसके बाद 'तुगलक', 'हयवदन' और 'नागमंडल' जैसे नाटकों ने उन्हें थिएटर की दुनिया का बड़ा नाम बना दिया.
थिएटर से फिल्मों तक छा गए गिरीश
राइटिंग के बाद गिरीश कर्नाड ने एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा और यहां भी लोगों को खूब इंप्रेस किया. 'मंथन', 'निशांत', 'डोर', 'इकबाल' और 'मालगुडी डेज' जैसे प्रोजेक्ट्स में उनका काम आज भी याद किया जाता है. स्क्रीन पर उनका शांत अंदाज और दमदार डायलॉग डिलीवरी लोगों को अलग ही फील देती थी.

सलमान खान के बॉस बनकर जीता दिल
नई जनरेशन के लिए गिरीश कर्नाड की सबसे यादगार फिल्मों में 'एक था टाइगर' और 'टाइगर जिंदा है' शामिल हैं. इन फिल्मों में उन्होंने रॉ चीफ का रोल निभाया था. सलमान खान के बॉस के तौर पर उनका किरदार काफी पावरफुल दिखाया गया था. कम स्क्रीन टाइम में भी वे हर सीन में अलग छाप छोड़ जाते थे. 10 जून 2019 को गिरीश कर्नाड इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनकी फिल्में, नाटक और किरदार आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं.
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