EMI vs No Cost EMI: महंगे गैजेट्स और लेटेस्ट स्मार्टफोन खरीदने का शौक रखने वाले कॉलेज स्टूडेंट्स के लिए 'EMI' एक वरदान जैसा लगता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि EMI और No-Cost EMI के बीच बहुत अंतर होता है. जहां एक ओर सामान्य EMI में आपको ब्याज (Interest) देना होता है, वहीं No-Cost EMI के पीछे डिस्काउंट और प्रोसेसिंग फीस का एक अलग गणित होता है. इसी कड़ी में आज हम आपको ईएमआई और नो कॉस्ट ईएमआई के बीच अंतर बताने जा रहे हैं, जो कॉलेज स्टूडेंट्स को जरूर पता होने चाहिए.
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क्या होता है EMI? (What Is EMI)
EMI का मतलब इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट (Equated Monthly Instalment) होता है. यह एक ऐसी सुविधा है, जिसमें किसी प्रोडक्ट की पूरी कीमत एक साथ देने के बजाय उसे तय समय में हर महीने किस्तों में चुकाया जाता है. आम EMI में बैंक या फाइनेंस कंपनी लोन की रकम पर ब्याज लेती है. उदाहरण के तौर पर, अगर कोई स्टूडेंट 60,000 रुपये का लैपटॉप 12 महीने की EMI पर करीब 14 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ खरीदता है, तो उसकी मंथली इंस्टॉलमेंट लगभग 5,400 रुपये होगी. इस तरह एक साल में टोटल पेमेंट करीब 64,800 रुपये हो जाएगा, यानी उसे लगभग 4,800 रुपये अतिरिक्त ब्याज के रूप में चुकाने होंगे.

क्या होती है No-Cost EMI? (What is No Cost EMI)
नो‑कॉस्ट EMI को अक्सर बिना ब्याज वाली किस्त कहा जाता है, लेकिन इसमें असल में ब्याज पूरी तरह खत्म नहीं होता. इसमें होता यह है कि बैंक तो EMI पर ब्याज लगाता ही है, लेकिन उस ब्याज की रकम के बराबर डिस्काउंट पहले ही सेलर या ब्रांड दे देता है. उदाहरण के तौर पर जैसे अगर 60,000 रुपये के लैपटॉप पर 12 महीने का ब्याज 4,800 रुपये बनता है, तो सेलर उसकी कीमत घटाकर 55,200 रुपये कर देता है. इसके बाद बैंक इसी घटे हुए दाम पर EMI बनाता है और ब्याज जोड़ता है. आखिर में डिस्काउंट और ब्याज एक‑दूसरे को बराबर कर देते हैं, और ग्राहक कुल मिलाकर 60,000 रुपये ही चुकाता है. इसी वजह से इसे नो‑कॉस्ट EMI कहा जाता है.
कॉलेज स्टूडेंट के लिए कौन सा ऑप्शन है बेहतर?
कॉलेज स्टूडेंट्स को EMI या नो‑कॉस्ट EMI चुनते समय टोटल पेमेंट, मिलने वाले डिस्काउंट पर जरूर ध्यान देना चाहिए. इसके अलावा उन्हें यह भी देखना चाहिए कि वे हर महीने की किस्त बिना भविष्य की आर्थिक परेशानी के आराम से चुका पाएंगे या नहीं. बता दें, कि EMI से किसी सामान की कीमत आसान किस्तों में चुकाई जा सकती है, लेकिन ब्याज लगने की वजह से कुल खर्च बढ़ जाता है. वहीं नो‑कॉस्ट EMI में भुगतान की सुविधा तो मिलती है और अगर अतिरिक्त चार्ज कम हों, तो प्रोडक्ट की कीमत भी नहीं बढ़ती.
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