- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंपनियों को बेहतर AI मॉडल के लिए स्वच्छ और विश्वसनीय डेटा चाहिए.
- पर लेखक, प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता अपने अधिकारों और किताबों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं.
- यह देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट, कॉपीराइट नियम और लाइसेंसिंग मॉडल किताबों की दुनिया को किस दिशा में ले जाते हैं
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई बुकसेलर्स ने शिकायत की कि कोई बड़ी मात्रा में किताबें खरीद रहा है. इनमें दुर्लभ किताबें, पुरानी किताबें और सस्ते पेपरबैक तक शामिल हैं. बाद में सामने आया कि इनमें से कई किताबें AI मॉडल की ट्रेनिंग के लिए खरीदी जा रही थीं. दरअसल, बीते कुछ वर्षों में चैट जीपीटी, जेमिनी, क्लाउट समेत अन्य बड़ी AI कंपनियों ने इंटरनेट पर मौजूद अरबों शब्दों से अपने AI मॉडल को ट्रेन किया है. लेकिन अब स्थिति बदलती हुई दिख रही है. साथ ही बढ़ रहे हैं कॉपीराइट को लेकर मुकदमे. ऐसे में AI कंपनियां अब इंसानों की लिखी गई, भरोसेमंद और हाई क्वालिटी कंटेंट की तलाश कर रही हैं. यही कारण है कि उनकी नजरें अब किताबों की ओर हैं.
'द गार्डियन' की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया के बुक सेलर्स को बिचौलियों से दुर्लभ किताबों से लेकर सस्ती पेपरबैक तक की मांग मिली थी. वहीं, 'फॉर्च्यून' ने डच बुक सेलर से जुड़ी ऐसी ही एक घटना की रिपोर्ट दी. इनमें से कई किताबों की कोई और कॉपी उपलब्ध नहीं है.

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आखिर किताबें ही क्यों?
AI के लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) जितना अधिक और अच्छे से अच्छा डेटा रीड करते हैं, आपके और हमारे सवाल पर उनका जवाब उतना ही बेहतर और सटीक होता जाता है. लार्ज लैंग्वेज मॉडल बड़ी मात्रा में टेक्स्ट डेटा का उपयोग करके इंसानी भाषा को समझने, उसका अनुमान लगाने और जिस अंदाज में इंसान लिखता है ठीक उसी तरह नया टेक्स्ट लिखने में सक्षम है.
अब चूंकि किताबों में लिखे गए टेक्स्ट की एडिटिंग भी इंटरनेट पर मौजूद अधिकांश टेक्स्ट से बेहतर होती है. इतना ही नहीं, किसी भी विषय पर लंबा लेख और उसके विभिन्न पहलुओं को शामिल करना किताबों की खूबी रही है. साथ ही भिन्न प्रकार की किताबें विभिन्न विषयों पर गूढ़ जानकारी देती हैं. इन सबसे ऊपर, पुरानी किताबों में दी गई जानकारियां और लिखे गए शब्द मूलतः ओरिजनल ही होते हैं जिनकी लिखावट इंटरनेट पर बहुत कम मात्रा में है.
ऐसे में एक्सपर्ट्स कहते हैं कि साल 2022 से पहले छपी किताबें AI के इस काम के लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं, जिनमें लिखे गए कंटेंट मूलतः ओरिजनल हैं. यानी AI अब इंसानों की ओरिजनल राइटिंग स्टाइल सीखने के लिए किताबों को बेहतरीन स्रोत मान रहा है.
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डिस्ट्रक्टिव स्कैनिंग
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विरोध की सबसे बड़ी वजह क्या?
हालांकि इस पूरी विवाद की सबसे बड़ी वजह किताबों को खरीदने पर नहीं बल्कि उन्हें स्कैन करने के तरीके को लेकर है. एंथ्रोपिक के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन के एक कानूनी मामले में सामने आया कि उस पर मुकदमा करने की सबसे बड़ी वजह बनी- डिस्ट्रक्टिव स्कैनिंग.
डिस्ट्रक्टिव स्कैनिंग वो प्रक्रिया है जिसमें स्कैन करने के बाद किताबों को नष्ट कर दिया जाता है. इस प्रक्रिया में सबसे पहले किताबों की बाइंडिंग हटा कर एक-एक पन्ने को अलग कर दिया जाता है. फिर उन्हें अलग-अलग कर हाई स्पीड स्कैनर पर डाला जाता है. स्कैन होने के बाद ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (ओएमआर) टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से डिजिटल टेक्स्ट में बदल दिया जाता है. ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी में किसी भी कागजात, फोटो या स्कैन किए गए डॉक्युमेंट्स पर छपे हुए या हाथ से लिखे अक्षरों को पहचान कर उन्हें ऐसे डिजिटल टेक्स्ट में बदल दिया जाता है, जिसे कंप्यूटर पढ़ सके, सर्च कर सके और यहां तक कि एडिट भी कर सके.
इसके बाद वहीं टेक्स्ट AI मॉडल की ट्रेनिंग में इस्तेमाल होता है. इस प्रक्रिया के पूरी होने के बाद कई मामलों में किताबों को बाद में रीसाइकिल या नष्ट कर दिया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में मूलतः नई किताबों का इस्तेमाल ही किया जाता है.
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कंपनियां ऐसा क्यों करती हैं?
दरअसल, कई किताबें डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद नहीं होतीं. अगर होती भी हैं तो उसके कंटेंट तक पहुंचना मुश्किल होता है क्योंकि ऐसे अनेकों मौजूद किताबों पर प्रकाशकों का कंट्रोल होता है. हाथ से स्कैन करना बेहद धीमा और महंगा होता है. वहीं किताबों की बाइंडिंग काटने से पन्नों से ओसीआर अधिक सटीक टेक्स्ट निकाल पाता है. इस प्रोसेस के इस्तेमाल से बहुत कम समय में किताबों को पूरी तरह डिजिटल बनाया जा सकता है. साथ ही कंपनियों को यह बेहद सस्ता पड़ता है और तकनीकी रूप से अधिक प्रभावी भी होता है.
क्या सभी संस्थाएं किताबें काटती हैं?
ऐसा नहीं है. उदाहरण के लिए इंटरनेट आर्काइव सालों से किताबों को इंटरनेट पर आर्काइव करती आ रही है. लेकिन उसका दावा है कि वो ऐसे स्कैनर्स का इस्तेमाल करती है जिसमें किताबों को नष्ट नहीं करना पड़ता है. इस प्रोसेस में किताबों की बाइंडिंग खोले बगैर उन्हें स्कैन किया जाता है. इससे मूल किताब पूरी तरह सुरक्षित रहती है. हालांकि इस तकनीक को अपनाया जाना महंगा होता है.
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किताब बेचने वाले क्यों चिंतित हैं?
ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अन्य देशों के कई बुकसेलर्स ने देखा कि बड़ी संख्या में किताबें खरीदी जा रही हैं. लेकिन खरीदार सीधे AI कंपनियां नहीं थीं. इसमें एजेंट या बिचौलिये काम कर रहे थे. इनमें से कई किताबें बेहद दुर्लभ थीं. यह कितनी दुर्लभ थीं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इनमें से कुछ किताबों की सेकेंड कॉपी भी उपलब्ध नहीं थीं. इससे यह आशंका भी जाहिर की गई कि इसमें सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहरों को भी AI में बदलने की लिए नष्ट किया जा सकता है.
गूगल बुक से कितना अलग है आज का ये ताजा विवाद?
करीब दो दशक पहले गूगल ने गुगल बुक्स प्रोजेक्ट शुरू किया था. उसका उद्देश्य दुनिया भर की किताबों को डिजिटल बनाकर उन्हें खोजने योग्य बनाना था.
उस समय भी कॉपीराइट को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली थी. लेकिन जानकारों का कहना है कि अब मामला अलग है. गूगल बुक्स का उद्देश्य लोगों को किताबें खोजने और पढ़ने में मदद करना था, जबकि AI कंपनियों का उद्देश्य किताबों को मशीन से पढ़े जाने वाले डेटा में बदलकर AI मॉडल को ट्रेन करना है.
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क्या यह कानूनी है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किताबों को खरीद कर उन्हें स्कैन करके AI को ट्रेन करना कॉपीराइट्स कानून का उल्लंघन नहीं है, इस पर पूरी दुनिया में बहस चल रही है. हालांकि भारत में अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.
भारत के कॉपीराइट एक्ट 1957 की धारा- 52 में फेयर डिलिंग का प्रावधान है. इसमें कुछ परिस्थितियों में कॉपीराइट कंटेंट का सीमित उपयोग बिना अनुमति किया जा सकता है.
बगैर किसी अनुमति के कॉपीराइट कंटेंट का सीमित इस्तेमाल रिसर्च, सेल्फ स्टडी, रिव्यू, न्यूज रिपोर्टिंग जैसी चीजों के लिए किया जा सकता है.
वहीं कानून के कुछ जानकारों का मानना है कि अगर डिजिटाइजेशन केवल AI की ट्रेनिंग तक ही सीमित रहे और इसका कोई कमर्शियल इस्तेमाल नहीं किया जाए, तो इसे उचित माना जा सकता है. हालांकि इस पर अंतिम फैसला अदालतों को ही करना होगा.
लेखक और प्रकाशकों की चिंता बिल्कुल उचित?
लेखकों और प्रकाशकों का कहना है कि उनकी किताबों का उपयोग बिना उनकी सहमति के किया जा रहा है. न ही उन्हें इसकी कोई रॉयल्टी मिलती है, जबकि उन्हीं के कंटेंट से सीख कर AI फ्यूचर में प्रतिस्पर्धी कंटेंट तैयार कर सकता है. इससे क्रिएटिव इंडस्ट्री पर प्रतिकूल आर्थिक असर भी पड़ सकता है.
यही कारण है कि एक्सपर्ट्स ये कह रहे हैं कि AI से बनाए गए कंटेंट की स्पष्ट लेबलिंग हो. साथ ही लेखकों के लिए मुआवजा फंड भी बनाया जाए. और AI कंपनियां बगैर लाइसेंस लिए किताबों का उपयोग न करें.
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