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Explained: जिस बिल पर अभी नहीं लगी मुहर, उस पर इतना विवाद क्यों? ट्रंप के सांसद ने क्यों कहा 'ईसाई विरोधी'

फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) में सरकार संशोधन करने जा रही है. इसे अभी पेश नहीं किया गया है लेकिन इस पर विवाद शुरू हो गया है.

Explained: जिस बिल पर अभी नहीं लगी मुहर, उस पर इतना विवाद क्यों? ट्रंप के सांसद ने क्यों कहा 'ईसाई विरोधी'
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने FCRA को ईसाई विरोधी बताया है.
नई दिल्ली:

एनजीओ को मिलने वाले विदेशी चंदे से जुड़े कानून फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA)  को केंद्र सरकार संशोधित करने जा रही है. यह बिल अब तक संसद के किसी भी सदन में पेश नहीं हुआ है, लेकिन इस पर विवाद शुरू हो गया है. इस बिल पर अमेरिका भी आपत्ति जता रहा है. अमेरिकी सांसद राइली मूर ने इसे 'ईसाई विरोधी' बताया है.

राइली मूर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन से वेस्ट वर्जीनिया से सांसद हैं. मूर ने आरोप लगाया कि FCRA में प्रस्तावित संशोधन भारत सरकार को चर्चों और रिलीजियस चैरिटी का प्रबंधन अपने हाथ में लेने की इजाजत देंगे और यह 'ईसाइयों पर हमला' होगा.

FCRA भारत में एनजीओ, चैरिटी, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे को रेगुलेट करता है. इसे 1976 में इमरजेंसी के समय लागू किया गया था. अब केंद्र सरकार इसे संशोधित करने जा रही है. इस संशोधन पर ही विवाद हो रहा है.

क्या है FCRA?

FCRA वह कानून है जो यह नियंत्रित करता है कि कोई भारतीय, एनजीओ, ट्रस्ट और कंपनियां विदेश से आने वाले फंड, गिफ्ट या चीजों को किस तरह से ले सकते हैं और उनका उपयोग कर सकते हैं.

FCRA तीन काम करता है:-

  • पहला: यह तय करता है कि कौन विदेशी चंदा ले सकता है और किन शर्तों के तहत.
  • दूसरा: यह तय करता है कि उस फंड को किस प्रकार लिया जाना चाहिए, उसका लेखा-जोखा कैसे रखा जाना चाहिए और उसकी जानकारी कैसे दी जानी चाहिए.
  • तीसरा: यह विदेशी फंडिंग वाली उन गतिविधियों पर रोक लगाता है जो भारत की संप्रभुता, सुरक्षा या कानून व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं.

इस कानून के तहत, विदेश से फंडिंग लेने वाले हर संगठन को सरकार के पास रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी है. संगठन को हर साल ऑडिट रिपोर्ट दाखिल करनी होती है और बताना होता है कि फंडिंग कहां से मिली थी और उसका इस्तेमाल कैसे किया गया.

1976 में लागू होने के बाद FCRA में 1984 में बड़ा संशोधन किया गया था, जिसके बाद विदेशी फंडिंग लेने वाले हर एनजीओ को सरकार के पास रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य किया गया. विदेशी फंडिंग लेने वाले हर संगठन को हर 5 साल में रजिस्ट्रेशन रिन्यू करवाना होता है.

2020 में इस कानून में एक बड़ा संशोधन हुआ था, जिसके बाद विदेशी फंडिंग को सिर्फ नई दिल्ली की SBI ब्रांच में खोले गए अकाउंट में ही ले सकते हैं.

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अब क्या करने जा रही है सरकार?

  • डेजिग्नेटेड अथॉरिटी: बिल में 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' बनाने का प्रस्ताव है, जो लाइसेंस रद्द होने पर एनजीओ की संपत्ति को अपने नियंत्रण में ले लेगा, उसका प्रबंधन करेगा या जरूरत पड़ने पर उसे बेच भी सकेगा. पहले ऐसा कोई प्रावधान नहीं था.
  • स्थायी नियंत्रण: लाइसेंस रद्द होने पर संगठन की संपत्तियां और पैसा सरकार के पास अस्थायी रूप से आ जाता था. लाइसेंस रिन्यू होने पर उसे वापस कर दिया जाता था. अब एक तय समय में लाइसेंस रिन्यू नहीं करवाया तो तय समय के बाद संपत्ति और पैसे पर सरकार का नियंत्रण होगा. 
  • धार्मिक स्थलों का संरक्षण: अगर किसी धार्मिक संस्था का लाइसेंस रद्द होता है तो भी उसके धार्मिक स्वरूप को नहीं बदला जा सकता. धार्मिक संस्थान को किसी दूसरे काम में उपयोग में नहीं लिया जा सकता.
  • अपील का अधिकार: अगर कोई एनजीओ अथॉरिटी के फैसले से खुश नहीं है तो 90 दिनों के भीतर समीक्षा के लिए आवेदन कर सकता है. एनजीओ के पास जिला कोर्ट में अपील करने का अधिकार भी होगा.
  • लाइसेंस रद्द: बिल में प्रावधान किया गया है कि अगर कोई एनजीओ अपना लाइसेंस खत्म होने से पहले उसे रिन्यू नहीं करवाता है, तो लाइसेंस अपने आप ही रद्द हो जाएगा.
  • सजा: FCRA के तहत जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी. FCRA के उल्लंघन के लिए जेल की सजा को 5 साल से घटाकर 1 साल कर दी गई है.

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ईसाई विरोधी क्यों बताया जा रहा इसे?

इस बिल को लेकर विवाद हो रहा है. अमेरिकी सांसद राइली मूर ने इस बिल को 'ईसाई विरोधी' बताया है. उन्होंने तो यहां तक कहा कि अगर बिल पास होता है तो इससे भारत-अमेरिका के रिश्तों पर भी असर पड़ेगा.

मूर ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'भारत में ईसाई तब से हैं, जब हमारे प्रभु यीशु मसीह के पुनर्जीवित होने के कुछ ही दशकों बाद सेंट थॉमस मालाबार तट पर आए थे, लेकिन इतने लंबे इतिहास के बावजूद भारतीय संसद FCRA नियमों में ऐसे बदलाव पर विचार कर रही है, जिससे सरकार चर्चों और चैरिटी का प्रबंधन अपने हाथ में ले सकेगी.'

उन्होंने आगे कहा, 'यह ईसाइयों पर सीधा हमला है. अगर यह बिल आगे बढ़ता है तो यह भारत के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंधों में बड़ी चिंता का विषय बन जाएगा.'

ट्रंप की पार्टी के सांसद राइली मूर इसे 'ईसाई विरोधी' बताकर भ्रम फैला रहे हैं. प्रस्तावित बिल में कहीं भी चर्च या ईसाई चैरिटी का प्रबंधन सरकार के हाथों में जाने की बात नहीं है. यह बिल सभी धार्मिक संगठनों पर लागू होगा. ऐसे सभी धार्मिक संगठन इसके दायरे में आएंगे, जिन्हें विदेश से चंदा मिलता है.

इस बिल में खासतौर पर धार्मिक स्थलों के संरक्षण की भी बात है. अगर किसी भी धार्मिक संगठन का लाइसेंस रद्द होता है और अथॉरिटी उसे अपने कब्जे में लेती है तो भी उसका स्वरूप नहीं बदला जाएगा. अगर कोई मंदिर है तो वह मंदिर ही रहेगा और चर्च है तो चर्च ही रहेगी. इसके अलावा, बिल में यह भी प्रावधान है कि नियंत्रण के बाद अथॉरिटी को यह पक्का करना होगा कि उसका इस्तेमाल किसी और दूसरे काम में भी नहीं होगा.

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क्या संपत्ति पर सरकार का कब्जा होगा?

केंद्र सरकार की ओर FCRA के संशोधित पर एक प्रेस रिलीज जारी की गई है. इसमें साफ किया गया है कि यह कानून धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होता है. सरकार ने यह भी साफ किया है कि कोई भी धार्मिक संगठन विदेशी फंडिंग ले सकता है.

एक आरोप यह लगाया जा रहा है कि बिल पास हुआ तो लाइसेंस रिन्यू न होने पर सरकार संपत्तियों पर कब्जा कर लेगी. इसे लेकर सरकार का कहना है कि डेजिग्नेटेड अथॉरिटी सिर्फ विदेशी फंडिंग से बनाई गई संपत्तियों का ही प्रबंधन करती है और वह भी तब जब किसी संगठन का रजिस्ट्रेशन खत्म हो चुका हो. 

सरकार ने साफ किया है कि संपत्तियों का नियंत्रण अस्थायी होता है और रजिस्ट्रेशन रिन्यू करवाने के बाद संगठन को वापस कर दी जाती है. इसके अलावा, अगर आपत्ति है तो संगठन को अपील करने का अधिकार भी होगा.

हालांकि, पहले लाइसेंस रिन्यू करवाने के लिए कोई समयसीमा नहीं थी. अब इसमें समयसीमा तय होगी और लाइसेंस रद्द होने के बाद एक तय समय पर उसे रिन्यू करवाना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो संपत्तियों पर स्थायी नियंत्रण अथॉरिटी का होगा.

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