एशियाई खेल 2026 में भारतीय गोल्फ ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है. जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियाई खेलों में भारत की युवा गोल्फर प्रणवी उर्स ने महिला व्यक्तिगत गोल्फ स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया. उनकी इस उपलब्धि के साथ ही एशियाई खेलों में गोल्फ के स्वर्ण पदक का भारत का 24 साल लंबा इंतजार समाप्त हो गया. प्रणवी उर्स ने प्रतियोगिता में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 15 अंडर 195 के स्कोर के साथ स्वर्ण पदक हासिल किया. तीनों राउंड में उनकी निरंतरता और दबाव के बीच शानदार प्रदर्शन ने उन्हें प्रतियोगिता में सबसे आगे रखा. उनकी इस सफलता को भारतीय महिला गोल्फ के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है.
2002 के बाद 24 साल का इंतजार हुआ खत्म
एशियाई खेलों में भारत को गोल्फ में आखिरी व्यक्तिगत स्वर्ण पदक वर्ष 2002 के बुसान एशियाई खेलों में मिला था, जब शिव कपूर ने पुरुष व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था. इसके बाद भारतीय गोल्फ को एशियाई खेलों में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा. प्रणवी उर्स ने इस सिलसिले को तोड़ते हुए महिला गोल्फ में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया और 24 साल बाद भारतीय गोल्फ को फिर से एशियाई खेलों के शीर्ष पायदान तक पहुंचाया.
क्यों खास है यह उपलब्धि
इस ऐतिहासिक उपलब्धि को लेकर चंडीगढ़ गोल्फ क्लब के अध्यक्ष के मेजर (रिटायर्ड) आर एस विर्क से विशेष बातचीत की गई. उन्होंने प्रणवी उर्स की सफलता को भारतीय गोल्फ के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि एक भारतीय महिला खिलाड़ी का एशियाई खेलों में गोल्फ का स्वर्ण पदक जीतना पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है.
मेजर विर्क के अनुसार, यह सफलता केवल एक पदक तक सीमित नहीं है. इससे देश की युवा पीढ़ी, विशेषकर युवा महिला खिलाड़ियों को गोल्फ को करियर के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी उपलब्धियां देश में गोल्फ की लोकप्रियता और स्वीकार्यता को और बढ़ाने में मदद करती हैं.
आखिर गोल्फ में 24 साल क्यों लगे?
भारतीय गोल्फ को एशियाई खेलों में दोबारा स्वर्ण पदक हासिल करने में 24 वर्ष क्यों लगे, इस सवाल पर मेजर विर्क ने कहा कि इसके पीछे सबसे बड़ी चुनौती ग्रासरूट स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान और उन्हें लगातार अवसर उपलब्ध कराना रही है. उन्होंने कहा कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन लंबे समय तक टैलेंट हंट और खिलाड़ियों को शुरुआती स्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक तैयार करने की व्यवस्थित व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं रही.
उन्होंने यह भी कहा कि गोल्फ को लंबे समय तक समाज के एक सीमित और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग से जुड़े खेल के तौर पर देखा जाता रहा. इसका सीधा असर इस खेल की पहुंच पर पड़ा. हालांकि अब स्थिति बदल रही है और छोटे शहरों तथा अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी भी गोल्फ में अपनी पहचान बना रहे हैं.
‘गोल्फ सिर्फ अमीरों का खेल' वाली सोच बदल रही है
मेजर विर्क ने कहा कि गोल्फ को लेकर देश में धारणा तेजी से बदल रही है. पहले जहां इस खेल को महंगे संसाधनों और सीमित सुविधाओं के कारण आम युवाओं से दूर माना जाता था, वहीं अब विभिन्न सरकारी योजनाओं, निजी संस्थाओं और खेल संगठनों की पहल से इसकी पहुंच बढ़ रही है.
उनके मुताबिक, यदि प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को कम उम्र में पहचान कर सही कोचिंग, अभ्यास की सुविधा, उपकरण और प्रतियोगिताओं का अनुभव दिया जाए तो भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई और गोल्फर तैयार किए जा सकते हैं.
खेलो इंडिया ने बढ़ाया ग्रासरूट स्पोर्ट्स पर फोकस
मेजर विर्क ने खेलो इंडिया जैसी पहलों को भी महत्वपूर्ण बताया. वर्ष 2018 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य देश में खेल संस्कृति को मजबूत करना, जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान करना और खिलाड़ियों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है. उन्होंने कहा कि खेलों को केवल बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय जिला और छोटे शहरों तक ले जाना जरूरी है। ऐसे क्षेत्रों में कई प्रतिभाएं मौजूद हैं, जिन्हें केवल सही मंच और मार्गदर्शन की आवश्यकता है.
उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले वर्षों में इस तरह की पहलों से गोल्फ समेत अन्य खेलों में भी नए खिलाड़ी सामने आएंगे और भारत अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपनी पदक संख्या बढ़ा सकेगा.
सीएसआर से खेलों को मिल सकता है बड़ा सहारा
भारतीय खेलों को मजबूत करने के लिए मेजर विर्क ने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी की भूमिका पर भी जोर दिया. उन्होंने सुझाव दिया कि CSR के दायरे में आने वाली कंपनियां किसी एक खेल को व्यवस्थित रूप से एडाप्ट कर सकती हैं. इसके तहत खिलाड़ियों के प्रशिक्षण, कोचिंग, उपकरण, प्रतियोगिताओं और अन्य जरूरी सुविधाओं का खर्च उठाया जा सकता है.
मेजर विर्क के अनुसार, यदि कॉर्पोरेट जगत किसी एक खेल को लंबे समय के लिए अपनाकर उसके खिलाड़ियों और पूरे इकोसिस्टम को सहयोग दे, तो इससे भारत में खेल प्रतिभाओं को लगातार बेहतर संसाधन मिलेंगे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने की संभावनाएं भी मजबूत होंगी. उन्होंने कहा कि खिलाड़ी के पास प्रतिभा होना पहला कदम है, लेकिन उसे विश्वस्तरीय खिलाड़ी बनाने के लिए लंबे समय तक विशेषज्ञ कोचिंग, आधुनिक सुविधाएं, फिटनेस सपोर्ट, प्रतियोगिता का अनुभव और आर्थिक सहयोग जरूरी है. सीएसआर इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
प्रणवी उर्स की जीत भारतीय गोल्फ के लिए नई उम्मीद
प्रणवी उर्स का एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना भारतीय गोल्फ के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. 24 साल बाद गोल्फ में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक मिलने से इस खेल को लेकर नई उम्मीद पैदा हुई है. मेजर विर्क ने कहा कि प्रणवी उर्स की उपलब्धि आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी. जरूरत इस बात की है कि इस सफलता को केवल एक पदक के तौर पर न देखा जाए, बल्कि इसके बाद देश में गोल्फ के लिए मजबूत ज़मीनी स्तर पर प्रतिभाओं की पाइपलाइन तैयार की जाए.
भारतीय गोल्फ में प्रतिभा, सही प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग का मेल आगे भी कायम रहा तो आने वाले एशियाई खेलों और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए और बड़ी उपलब्धियों की उम्मीद की जा सकती है.
रिपोर्टर: अंकुर कपूर
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