प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कंबोडिया से संचालित एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड सिंडिकेट का भंडाफोड़ करते हुए राजस्थान और पंजाब में एक साथ छापेमारी की है. यह कार्रवाई जोधपुर, नागौर, किशनगढ़ (अजमेर) और लुधियाना सहित कुल 7 ठिकानों पर की गई. जांच में सामने आया है कि यह पूरा नेटवर्क फर्जी और दुरुपयोग किए गए सिम कार्डों के जरिए भारत में साइबर ठगी को अंजाम दे रहा था, जिसमें स्थानीय सिम वेंडरों ने आम लोगों के आधार और पहचान दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल कर हजारों सिम बिना उनकी जानकारी के एक्टिवेट किए.
भारत के लोगों से करते थे ठगी
जांच में सामने आया कि राजस्थान के सिम विक्रेताओं ने आम लोगों के दस्तावेजों का दुरुपयोग कर करीब 36 हजार फर्जी सिम कार्ड एक्टिवेट किए, जिन्हें मलेशिया के रास्ते कंबोडिया भेजकर देशभर में सैकड़ों करोड़ रुपये की ठगी की जा रही थी. लगभग 2.3 लाख मोबाइल नंबरों का विश्लेषण किया गया, जिनमें कई नंबर साइबर फ्रॉड गतिविधियों में इस्तेमाल होते मिले. यह सिम कार्ड पहले भारत से मलेशिया भेजे जाते थे, और वहां से इन्हें कंबोडिया में बैठे साइबर ठगों तक पहुंचाया जाता था, जहां से भारतीय नागरिकों को कॉल कर ठगी की जाती थी.
पुलिस अधिकारी बनकर करते थे कॉल
पूरे रैकेट में ठगी का तरीका बेहद संगठित था, जिसमें फर्जी पुलिस अधिकारी बनकर 'डिजिटल अरेस्ट' करते थे. मनी लॉन्ड्रिंग या ड्रग्स केस में फंसाने की धमकी दी जाती थी, और शेयर बाजार या क्रिप्टो निवेश में भारी मुनाफे का लालच देकर लोगों से पैसे ऐंठे जाते थे. कॉल के लिए भारतीय (+91) नंबरों का इस्तेमाल होने से पीड़ित इसे भरोसेमंद समझकर जाल में फंस जाते थे. ठगी की रकम म्यूल बैंक खातों के जरिए हवाला और क्रिप्टो चैनलों से विदेश भेज दी जाती थी.
मलेशिया के एजेंटों को सप्लाई किया
जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ POS सिम वेंडरों और एजेंटों की मिलीभगत से यह पूरा नेटवर्क चल रहा था, जिन्होंने टेलीकॉम कंपनियों की आईडी का दुरुपयोग कर अतिरिक्त सिम एक्टिवेट किए और उन्हें कमीशन के बदले मलेशियाई एजेंटों को सप्लाई किया. छापेमारी के दौरान कई बैंक खातों, संदिग्ध दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की पहचान हुई है, जबकि कई चल और अचल संपत्तियां भी जांच के दायरे में आई हैं. एक संगठित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क है और मामले में आगे और बड़े खुलासों की संभावना है.
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