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राजस्थान में 17 जातियों का दबदबा, पहले नंबर पर कौन, सरकारी नौकरी किसके पास ज्यादा?

ओबीसी आयोग ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को रिपोर्ट सौंप दी है. आयोग ने सिफारिश की है कि जिन जातियों की भागीदारी कम है, उन्हें आगे लाने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं. 

राजस्थान में 17 जातियों का दबदबा, पहले नंबर पर कौन, सरकारी नौकरी किसके पास ज्यादा?
राजस्थान की राजनीति में OBC की 17 जातियों का दबदबा

राजस्थान में ओबीसी आयोग ने 5 अगस्त को ओबीसी की सभी जातियों के लिए आरक्षण यानी पंचायत और निकाय चुनाव में उनके प्रतिनिधित्व के लिए रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है. रिपोर्ट में ओबीसी की 92 जातियों में 17 से 20 जातियां ही ऐसी नजर आती है, जिनका राजनीतिक, सरकारी नौकरी से लेकर खेती और दूसरे संसाधनों पर पूरा दबदबा है. ओबीसी की टॉप 10 जनसंख्या में बड़ी जातियों का ही हर जगह बोलबाला है. प्रदेश में ओबीसी जातियों की राजनीतिक भागीदारी की बात करें तो जाट टॉप पर है.

राजनीति में किसकी भागीदारी सबसे ज्यादा

प्रदेश में जाटों के 22,666 परिवाारों की राजनीति में भागीदारी है. वहीं, गुर्जर जाति दूसरे पायदान पर है. प्रदेश के 9628 गुर्जर परिवारों की राजनीति में भागीदारी है. इसके बाद माली और सैनी है. प्रदेश में माली और सैनी जाति के 5994 परिवारों की राजनीतिक भागीदारी है. इसके बाद कुमावत 5883 परिवार चौथे और यादव 3826 परिवारों की राजनीतिक भागीदारी के साथ पांचवें नंबर पर हैं. 

राजनीतिक भागीदारी की संख्या में जाट- गुर्जर सबसे आगे हैं. लेकिन अपनी जनसंख्या के मुताबिक भागीदारी में बिश्नोई पहले स्थान पर है. प्रदेश में मौजूद कुल बिश्नोई परिवारों में से 2.10 प्रतिशत की राजनीति में भागीदारी है. यादवों की 1.63 फीसदी और जाटों की 1.49 फीसदी राजनीतिक भागीदारी वाले परिवार है. ओबीसी वर्ग में जो जातियां राजनीतिक भागीदारी में मजबूत हैं, वही सरकारी नौकरियों में भी शीर्ष पर दिखाई देती हैं.

IANS

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सरकारी नौकरी में कौन सी जाति का दबदबा?

आंकड़ों के अनुसार, 10 ऐसी जातियां हैं जिनके 10 हजार से अधिक लोग सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं. इनमें जाट, गुर्जर, सैनी, यादव, जांगिड़ और बिश्नोई प्रमुख हैं. सरकारी नौकरियों में जाट सबसे आगे हैं, जिनकी संख्या 1.81 लाख है, जबकि गुर्जर (44,475), सैनी (42,912) और यादव (39,707) भी बड़ी संख्या में सरकारी सेवा में हैं.

आर्थिक स्थिति के मामले में भी यही जातियां अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं. जाट, पाटीदार और जांगिड़ समुदायों में बीपीएल परिवारों का प्रतिशत सबसे कम है, जहां 8 फीसदी से भी कम लोग गरीबी रेखा के नीचे आते हैं.

18 ऐसी जातियां, जो सरकारी नौकरी में पीछे

हालांकि, ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में यह भी दिखता है कि ओबीसी की 18 जातियां ऐसी हैं, जिनके 100 लोग भी सरकारी नौकरी में नहीं हैं. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सपेरा जाति का एक भी व्यक्ति न राजनीति में भागीदार है और न ही सरकारी सेवा में मौजूद है. रिपोर्ट के अनुसार, ओबीसी की 92 जातियों में से केवल 17 जातियां ही ऐसी हैं, जिनके 2000 से अधिक परिवार राजनीति में सक्रिय हैं, जबकि 22 जातियों के 100 परिवार भी राजनीतिक भागीदारी तक नहीं पहुंच पाए हैं.

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सपेरा जाति राजनीतिक भागीदारी से बाहर

सपेरा जाति पूरी तरह से राजनीतिक भागीदारी से बाहर है. इसी तरह ओबीसी में शामिल अनाथ बच्चों की भी राजनीति में कोई हिस्सेदारी नहीं है. कई जातियों की स्थिति बेहद कमजोर है. 10 जातियां ऐसी हैं, जिनके केवल 2 से 8 परिवार ही राजनीति में भागीदारी कर पाए हैं. इनमें सिरकीवाल, न्यारिया और हेला जातियों के केवल 2-2 परिवार, भोपा और नट के 5-5, जबकि मोची और चूनगर के 7-7 परिवार ही राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं.

सरकारी नौकरियों में भी यही तस्वीर दिखती है. कई जातियां बेहद पिछड़ी हुई हैं. सिरकीवाल जाति के केवल 2, हेला के 5, गन्यारिया के 6 और ट्रांसजेंडर वर्ग के केवल 8 लोग ही सरकारी नौकरी में हैं.

यह रिपोर्ट शहरी निकायों और पंचायतीराज संस्थाओं में ओबीसी आरक्षण तय करने का आधार बनेगी. सरकार इसी के आधार पर तय करेगी कि किन निकायों में प्रमुख पद और वार्ड आरक्षित होंगे. आयोग ने सिफारिश की है कि जिन जातियों की भागीदारी कम है, उन्हें आगे लाने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं. 

ओबीसी में राजनीतिक दबदबे की तस्वीर देखें तो शीर्ष 17 जातियों का वर्चस्व सामने आता है. इनमें जाट/जट सिख सबसे आगे हैं, जिनके 22,666 परिवार राजनीति में भागीदारी रखते हैं. इसके बाद गुर्जर (9,628), माली-सैनी-बागवान (5,994), कुम्हार/प्रजापति-कुमावत (5,823) और अहीर (यादव) के 3,826 परिवार राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं.

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बढ़ई-जांगिड़-सुथार (2,725), बिश्नोई (2,402), कलबी-पटेल-आंजणा (2,326) और नाई-सैन-वेदनाई (2,079) भी प्रमुख भागीदारी वाले समूहों में शामिल हैं. इसके अलावा मेव (1,906), रावत (1,787), साद-स्वामी-बैरागी (1,746), सिंधी मुसलमान-सिपाही (1,640), राईका-रैबारी-देवासी (1,607), धाकड़ (1,592), दरोगा-रावणा राजपूत (1,501) और जोगी-नाथ (1,122) जातियां भी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली श्रेणी में आती हैं, जिनकी भागीदारी अन्य जातियों की तुलना में काफी अधिक है.

ओबीसी में कई जातियों की राजनीतिक भागीदारी बेहद सीमित है. 10 ऐसी जातियां हैं, जिनके केवल 2 से 8 परिवार ही राजनीति में सक्रिय हैं. इनमें मदारी-बाजीगर के 8 परिवार, चूनगर और गैर हिंदू मोची के 7-7 परिवार, जबकि गैर हिंदू नट और भोपा (नायक) जाति के 5-5 परिवार शामिल हैं. इसके अलावा जागरी और ट्रांसजेंडर समुदाय के केवल 3-3 परिवार राजनीति में भागीदारी रखते हैं. सबसे कमजोर स्थिति हेला, न्यारिया (न्यारगर) और सिरकीवाल जातियों की है, जिनके केवल 2-2 परिवार ही राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं.

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