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थार मरुस्थल से 'हरा सोना' हुआ गायब, वजूद की लड़ाई के लिए अनूठा जन अभियान शुरू

थार मरुस्थल का हरा सोना आज अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. कभी इसी हरे सोने से थार मरुस्थल की विशेष पहचान थी और अब यह विलुप्त होने की कगार पर है, जिसे बचाने के लिए जन अभियान शुरू किया गया है.

थार मरुस्थल से 'हरा सोना' हुआ गायब, वजूद की लड़ाई के लिए अनूठा जन अभियान शुरू
थार मरुस्थल से हरा सोना हुआ गायब (File Photo)
ANI

पश्चिमी राजस्थान के थार मरुस्थल की पहचान कभी दूर-दूर तक फैले सेवण घास के हरे समंदर से होती थी. जो आज अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. कभी पश्चिमी राजस्थान के पशुपालकों के लिए अकाल का साथी कहा जाता था, लेकिन अब यह सेवण घास लुप्त होती जा रही है. हालांकि इस 'हरे सोने' को बचाने के लिए बीकानेर के पर्यावरण प्रेमी और पर्यावरणविदों ने मिलकर अलग-अलग गोचर भूमि में एक बड़ा अभियान शुरू किया है. जिसमें सेवण घास उगाई गई है. इससे न सिर्फ जमीन को बंजर बनने से रोकेगा, बल्कि स्थानीय पशुपालकों की किस्मत भी बदलेगा. आखिर क्या वजह है कि सेवण घास लुप्त हो रही है, वन्य जीवों, गोडावण के लिये क्यों महत्वपूर्ण है? थार मरुस्थल के इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए सेवण घास की क्या भूमिका है, साथ ही सरकार क्या कदम उठा रही है?  

कभी पशुपालकों के लिए थी लाइफलाइन 

थार में पशुओं के लिए प्रकृति के वरदान के रूप में पाई जाने वाली सेवण धामन घास किसी जमाने में पशुपालकों के लिए लाइफ़ लाइन हुआ करती थी. थार में जहां बारिश की एक बूंद किसी सपने में कम नहीं थी. इसी विपरीत परिस्थिति में लह लहाती थी. इसे खा कर पशु अपना पेट भरते साथ ही अपने मालिकों का भी जीवन चलाते, जिससे वो इस विषम परिस्थितियों में अपनी पीढ़ियों को जिंदा रख सके. लेकिन धीरे-धीरे आधुनिकता या ये कहे कि मशीनी युग ने इस अमृत रूप घास को अपना ग्रास बना लिया. कभी कई मीलों में जहां सेवण घास दिखाई देती थी वो अब लुप्त होने की कगार पर पहुंच गया है.

नई मिसान बना अनूठा जनअभियान

थार में विलुप्त होती इस घास को स्थानीय पर्यावरणप्रेमियों ने बचाने और फिर से इसे स्थापित करने का संकल्प लिया लिया, लेकिन जमीनी स्तर पर इसने बड़े प्रोजेक्ट को मूर्तरूप देना अपने आप में चुनौती था. इसके लिए इसमें पर्यावरणविदों का सहयोग भी लिया गया. पर्यावरणविदों की वैज्ञानिक तकनीक और पर्यावण प्रेमियों की मेहनत ने मिल कर फिर से इस थार मरुस्थल में सेवन को जिंदा कर दिखाया. सारा काम जन सहयोग से किया जा रहा है.

जिले के श्रीकोलायत क्षेत्र स्थित सीसा भैरूजी मंदिर की 471 बीघा ओरण भूमि में गोवंश संरक्षण, जल संवर्धन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनूठा जनअभियान नई मिसाल बनता नजर आ रहा है.
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वर्षों से उपेक्षित पड़ी इस ओरण भूमि को पुनर्जीवित करने के लिए पहले सैकड़ों वर्ष पुराने प्राचीन तालाब की खुदाई कर उसका जीर्णोद्धार किया गया और अब बड़े स्तर पर सेवण घास की बुवाई का महाअभियान शुरू किया गया है. दर्जनों ट्रैक्टर एक साथ ओरण भूमि में सेवन घास का बीजारोपण करते दिखाई दिए. जिससे भविष्य में क्षेत्र में विचरण करने वाले गोवंश और अन्य पशुओं को सालभर प्राकृतिक चारा उपलब्ध हो सकेगा. इससे आवारा गोवंश के लिए भी स्थायी चारे की व्यवस्था सुनिश्चित होने की उम्मीद है.

दुनिया में सबसे उत्तम घास है सेवण

महाराजा गंगा सिंह यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल छगाणी बताते हैं कि सेवण दुनिया की सबसे उतम घास में से एक थी और आज भी है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से खेती का जो तरीका बदला है. साथ अंग्रेजी बबूल जिस तरह से फैला है, उसने सेवण के पैदा होने वाले क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है. हालांकि अब सरकार खुद अंग्रेजी बबूल को हटाने के लिए काम कर रही है. वही मशीनीकरण से होने वाली खेती से भी सेवन खत्म हो रही है.

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मरुस्थलीय क्षेत्रों में सेवन घास को पशुओं के लिए सबसे उत्तम प्राकृतिक चारे के रूप में माना जाता है. प्रो. अनिल छगाणी बताते हैं कि बीकानेर का रसगुल्ला जो विश्व प्रसिद्ध है, इसके पीछे सेवण घास की महत्वपूर्ण भूमिका है. इस क्षेत्र में राठी नस्ल की गाय पाई जाती हैं, जिनको खाने के लिए सेवण का ज्यादा इस्तेमाल होता था. जिससे उसके दूध में अतिरिक्त प्रोटीन पाया जाता, जिसके कारण यहा का रसगुल्ला अन्य स्थानों से अलग है.

जनअभियान का नेतृत्व कर रहे पूर्व प्रधान जयवीर सिंह भाटी ने बताया कि वर्षों से उपेक्षित पड़ी इस ओरण भूमि को फिर से जीवंत बनाने का संकल्प लिया गया है. अब पूरे क्षेत्र में व्यापक स्तर पर सेवन घास उगाने की शुरुआत की गई है. उन्होंने कहा कि करीब 20 वर्षों से ओरण भूमि पर हुए अतिक्रमण को हटाने के बाद अब इस भूमि का उपयोग जनहित, गोसेवा और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से किया जा रहा है. 

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