मध्यप्रदेश के सबसे बड़े टाइगर रिजर्व 'वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व' (पूर्व नाम नौरादेही) में आज अगर बाघों का कुनबा गुलजार है, तो इसका पूरा श्रेय एक ऐसी बाघिन को जाता है जिसकी अपनी जिंदगी किसी चमत्कार से कम नहीं रही. दरअसल करीब एक दशक पहले रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में सन्नाटा पसरा था लेकिन अब वो बाघों की दहाड़ इसी बाघिन के संघर्ष और मातृत्व की बदौलत गूंज रही है. हम बात कर रहे हैं बाघिन N-1 यानी 'राधा' की. बचपन में ही शिकारियों के जहर का शिकार होने से लेकर उड़ीसा सरकार द्वारा ठुकराए जाने तक, राधा ने हर मोड़ पर मौत और अस्वीकार को मात दी. 2018 में नौरादेही में पुनर्वासित होने के बाद उसने अपनी बेटियों के साथ मिलकर अब तक 28 शावकों को जन्म दिया है. एक उजड़ चुके जंगल को नया जीवन देने वाली इसी बाघिन को आज पूरा वन विभाग सम्मान से "मदर ऑफ VDTR" कहता है. वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व को ही संक्षेप में VDTR कहा जाता है.
बचपन में ही छिना परिवार, जहर से बची थी अकेली जान
राधा की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. उसका जन्म पेंच टाइगर रिजर्व में हुआ था और उसकी मां बाघिन 'नाला' ने तीन शावकों को जन्म दिया था. लेकिन किस्मत ने जन्म के कुछ समय बाद ही उसकी कठिन परीक्षा ली.
इस पूरे त्रासदी में केवल एक मादा शावक ही जीवित बच सकी, जिसे आगे चलकर 'राधा' नाम दिया गया.
एनक्लोजर में ट्रेनिंग और उड़ीसा का इनकार
अनाथ हो चुकी इस नन्हीं शावक को पहले सुरक्षित बाड़े और बाद में घुरेला एनक्लोजर में रखकर पाला-पोसा गया. वनकर्मियों की कड़ी देखरेख में उसने धीरे-धीरे खुद को संभाला और शिकार करने सहित जंगल में जीवित रहने की तमाम गतिविधियों का प्रशिक्षण लिया. जब वह करीब दो वर्ष की हुई तो उसे ओडिशा भेजने की योजना बनाई गई, लेकिन उड़ीसा ने उसे लेने से इंकार कर दिया. इसके बाद वर्ष 2018 में मध्यप्रदेश वन विभाग ने उसे तत्कालीन नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य भेजने का बड़ा निर्णय लिया.
वीरान जंगल में 'राधा' और 'किशन' की जोड़ी
सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिलों में फैले इस विशाल वन क्षेत्र में उस समय वर्षों से बाघों की कोई स्थायी मौजूदगी नहीं थी. वन विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस जंगल को दोबारा बाघों से आबाद करने की थी. कान्हा से लाई गई इस बाघिन को नौरादेही में 'राधा' नाम मिला और उसका आधिकारिक कोड N-1 रखा गया. विशेष प्रशिक्षण के बाद उसे बांधवगढ़ से लाए गए नर बाघ 'किशन' के साथ खुले जंगल में छोड़ दिया गया.
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एक साल में ही दिया नए जीवन को जन्म
शुरुआत में वन अधिकारियों का अनुमान था कि इस पुनर्वास परियोजना के नतीजे आने में काफी समय लगेगा. लेकिन राधा ने तमाम अनुमानों को गलत साबित कर दिया.
राधा की बदौलत मिला 'टाइगर रिजर्व' का दर्जा
इसके बाद राधा लगातार मातृत्व का फर्ज निभाती रही और समय के साथ उसकी बेटियों ने भी शावकों को जन्म देना शुरू किया. देखते ही देखते बाघों का कुनबा तेजी से बढ़ने लगा. महज चार वर्षों के भीतर इस क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़कर 18 तक पहुंच गई. इस शानदार उपलब्धि की गूंज देशभर में सुनाई दी. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने यहां बढ़ती बाघ आबादी और बेहतर संरक्षण प्रबंधन को देखते हुए नौरादेही अभयारण्य को 'वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व' (VDTR) का आधिकारिक दर्जा प्रदान कर दिया.
'मदर ऑफ VDTR' और वन्यजीव संरक्षण की मिसाल
आज स्थिति यह है कि राधा और उसकी बेटियां मिलकर अब तक 28 शावकों को जन्म दे चुकी हैं. यही वजह है कि वन विभाग के अधिकारी और वन्यजीव विशेषज्ञ उसे बेहद सम्मान के साथ "मदर ऑफ VDTR" कहते हैं. उसकी संतानों ने न केवल इस टाइगर रिजर्व को आबाद किया है, बल्कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन को भी एक नई मजबूती दी है. अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर राधा की यह कहानी साबित करती है कि अगर इंसान ईमानदारी से प्रयास करे, तो प्रकृति खुद अपने संरक्षण का रास्ता बना लेती है.
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