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This Article is From Sep 08, 2025

Rajasthan: पहले दिया चाय का ऑर्डर फिर दुकानदार की जाति जान किया ऑर्डर रद्द, मामला दर्ज

विवाद इतना बढ़ गया कि चेनाराम ने मामले की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई है. पुलिस ने एससी-एसटी एक्ट और बीएनएस की धाराओं में केस दर्ज किया है. आरोपी सोहन जाट के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच सर्किल ऑफिसर प्रहलाद राय को सौंपी गई है.

Rajasthan: पहले दिया चाय का ऑर्डर फिर दुकानदार की जाति जान किया ऑर्डर रद्द, मामला दर्ज
  • राजस्थान के चूरू जिले के सांडवा इलाके में चाय की दुकान पर जाति के आधार पर विवाद हुआ था
  • सोहन जाट ने चाय पीने से इनकार किया जब दुकान मालिक चेनाराम मेघवाल की जाति पता चली
  • चेनाराम मेघवाल ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई और एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ
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चूरू:

समाज में जातीय जहर घोलने वाला एक वीडियो राजस्थान के चूरू जिले के सांडवा इलाके से सामने आ रहा है. इस वीडियो में हाईवे पर स्थित चाय की दुकान चलाने वाले चेनाराम मेघवाल और ग्राहक सोहन जाट के बीच बहस होते हुए नजर आ रही है. जानकारी के मुताबिक बोलेरो गाड़ी में सवार सोहन जाट ने चाय की दुकान पर चाय बनाने के लिए कहा था लेकिन चाय बनने के बाद जब सोहन जाट ने दुकान के मालिक से उसकी जाति पूछी तो मेघवाल पता चलने पर उसने चाय पीने से इनकार कर दिया. इसी बात को लेकर दोनों के बीच बहस हो गई और सोहन जाट ने चाय के पैसे देने से भी इनकार कर दिया. हालांकि, इस घटना का वीडियो मोबाइल फोन में जरूर कैद हो गया. 

विवाद इतना बढ़ गया कि चेनाराम ने मामले की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई है. पुलिस ने एससी-एसटी एक्ट और बीएनएस की धाराओं में केस दर्ज किया है. आरोपी सोहन जाट के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच सर्किल ऑफिसर प्रहलाद राय को सौंपी गई है.

मामला सामने आने के बाद अब इसे लेकर सियासत भी शुरू हो गई है. कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार में दलित अत्याचार बढ़े हैं. वहीं गृह राज्य मंत्री का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार यूपी के बाद राजस्थान और मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा दलित अत्याचार हुए हैं. जुलाई 2024 से जुलाई 2025 तक राजस्थान में SC/ST एक्ट के 8075 मामले दर्ज, 44.73% मामले अब भी लंबित हैं. 

इसे सामाजिक विडंबना ही कहा जाएगा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जाति के नाम पर इस तरह का भेदभाव जारी है. चूरू का ये मामला  सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्यों 21वीं सदी में भी हम जाति की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाए हैं.

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