एक सकरी गली में लकड़ी के पलंग पर सफेद चादर बिछाकर कुछ लोग बैठक कर रहे हैं. इस पलंग के एक कोने पर एक पिता अपनी 4 साल की बेटी के साथ बैठा है. बगल में एक जाली का गेट खुलता है. पिता उस गेट से अंदर झांककर बार-बार अपने 7 दिन के बच्चे को देख लेता है. बच्चा सो रहा है. उसके पास में ही उसकी मौसी बैठी है. उसकी मां उसे जन्म देने के 48 घंटे बाद ही चल बसी. अब दोनों बच्चे मां के बिना हैं.
"मम्मी कब आएगी?"
ये शोक बैठक ईशा की मौत के बाद रखी गई है. ईशा की 8 जुलाई को भीलवाड़ा के सरकारी अस्पताल में मौत हो गई. शोक बैठक में ईशा की कोई तस्वीर नहीं लगाई गई है, क्योंकि 4 साल की बेटी दिशा मम्मी की फोटो देखकर उसे याद करती है. सवाल करती है, पूछती है, मम्मी कब आएगी? 4 साल की दिशा के सवालों के जवाब पिता या नाना-नानी के पास नहीं है. बस उसके मन में सवाल है, जिनका जवाब नहीं मिल रहा. कुछ इसी तरह के सवाल पिछले एक सप्ताह में भीलवाड़ा के सरकारी अस्पताल में हुई 5 महिलाओं की मौत को लेकर है, जिनका जवाब अभी नहीं मिला है.
"लापरवाही से पत्नी की मौत"
ईशा के पति मनीष ने बताया, "हम उसे (पत्नी) 5 जुलाई की रात अस्पताल लेकर गए थे. सबसे पहले तो रातभर हमें बेड ही नहीं मिला. इसके बाद अगले दिन ऑपरेशन हुआ. ऑपरेशन के बाद वह ठीक थी, लेकिन 7 जुलाई को दोपहर बाद अचानक उसकी (पत्नी) तबीयत खराब हो गई. इसके बाद हम कई बार डॉक्टर्स के पास गए, लेकिन किसी ने हमारी सुनवाई नहीं की. मेरी पहली बेटी की डिलीवरी वहीं हुई थी, लेकिन इस बार लापरवाही हुई और इस लापरवाही से उसकी (पत्नी) मौत ही हो गई."
7 दिन का बच्चा अपनी मौसी के पास
ईशा का 7 दिन का बच्चा अब मौसी के पास रहता है. अपनी मां को देखने महसूस करने से पहले ही उसके सिर से मां का साया उठ गया. बड़ी बहन छोटे भाई को लाड़ करती है. छोटा बाबू कहती है. मां की मौत से बेखबर डॉक्टर वाले खिलौनों से खेलती है. पिता से मां से मिलने की जिद करती है.
चाय और बिस्किट में मस्त थे डॉक्टर
ईशा की मां हेमलता बताती हैं, "मैं खुद ही 4 बार डॉक्टरों के पास गई. वो चाय पीते रहे और बिस्किट खाते रहे. आपस में बात करते रहे, लेकिन हमें संभालने नहीं आए. अगर समय रहते सम्भाल लेते तो बच्ची हमारे बीच होती. डॉक्टरों की लापरवाही से उसकी मौत हो गई. पिता भी डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हैं."
जमीन और बेंच पर बैठकर इंतजार करते रहे मरीज
धरातल पर प्रशासन के दावों का सच जानने NDTV की टीम भीलवाड़ा की सरकारी अस्पताल में भी पहुंची. हमने देखा कि अस्पताल में हालात कुछ ज्यादा अच्छे नहीं हैं. मरीज और उनके परिजन अस्पताल में कई जगहों पर बेंच और जमीन पर इंतजार करते दिखे, तो वहीं एक मरीज करीब 10 मिनट तक किसी की सार संभाल करने के इंतजार में बेहोश हो गई. जब अस्पताल के डॉक्टर उसे देखने पहुंचे, तो बड़ी मुश्किल से उसे स्ट्रेचर पर लिटाया गया.
एक ऑपरेशन थिएटर अभी बंद है. ऑपरेशन थिएटर की गेट पर लिखा है, "ममता का विश्वास हमारे साथ". लेकिन इन घटनाओं के बाद अब विश्वास डगमगाने लगा है. अस्पताल की दीवारों पर लगे पोस्टर मां की दूध की महत्ता बताते हैं. लेकिन इन नौनिहालों के सर से मां का साया उठ चुका है.
राजस्थान में जब लगातार प्रसूताओं की मौत के मामले सामने आ रहे हैं. इसी बीच आशा सहयोगनियां हड़ताल पर है. इस आशा सहयोगनियों पर ही ग्रामीण इलाकों में गर्भवती महिलाओं की निगरानी और चेकअप की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में आशा सहयोगनियों की विभिन्न मांगों को लेकर हड़ताल भी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है.
अस्पताल प्रशासन खुद को दे चुका क्लीन चिट
अस्पताल प्रशासन इस पूरे मामले में खुद को क्लीन चिट दे चुका है. मेडिकल कॉलेज अधीक्षक डॉ अरुण गौड़ ने बताया कि महिलाओं की मौत अलग अलग कारणों से हुई है. अधीक्षक ने बताया कि पांच महिलाओं में से एक महिला गर्भवती नहीं थी. फोरी देवी को 30 जून को बच्चेदानी के ऑपरेशन हेतु भर्ती किया गया था. उनका ऑपरेशन 1 जुलाई को किया गया. उनकी मौत 7 जुलाई को मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (हृदयाघात) के कारण हुई.
दूसरा मरीज, शिमला गुर्जर 5 जुलाई को उप-जिला चिकित्सालय, गुलाबपुरा से गंभीर बीमारी के कारण रेफर हो आई थी. हॉस्पिटल में उनका किसी भी प्रकार का ऑपरेशन नहीं किया गया. 7 जुलाई 2026 को हाइपोवोलेमिक शॉक, तीव्र गैस्ट्रोएंटेराइटिस, सेप्टीसीमिया, IUD एवं एनीमिया जैसी गंभीर चिकित्सीय जटिलताओं के कारण हुई.
तीसरी मरीज ईशा पाण्डेय को 5 जुलाई को भर्ती किया गया तथा 6 जुलाई को ऑपरेशन किया गया. उनकी मौत 8 जुलाई 2026 को पल्मोनरी थ्रोम्बोएम्बोलिज्म के कारण हुई.
दिव्या सेन को 7 जुलाई 2026 को सीएचसी रायपुर से रेफर कर भर्ती किया गया. उसी दिन ऑपरेशन किया गया 9 जुलाई को गर्भावस्था जनित गंभीर उच्च रक्तचाप के कारण उत्पन्न HELLP सिंड्रोम (Hemolysis, Elevated Liver Enzymes एवं Low Platelet Count) तथा एक्लेम्प्सिया जैसी
गंभीर चिकित्सीय जटिलताओं के कारण मौत हुई.
वहीं, पांचवीं मरीज संगीता जीनगर को 9 जुलाई 2026 को भर्ती किया गया. उसी दिन ऑपरेशन किया गया. उनकी मौत 10 जुलाई को प्रसवोत्तर अत्यधिक रक्तस्राव (Atonic Post Partum Haemorrhage with DIC) के कारण हुई.
अस्पताल में दो ऑपरेशन थिएटर
अस्पताल की पड़ताल के दौरान एक बात सामने आई कि अस्पताल में दो ऑपरेशन थिएटर है. 29 जून को दोनों की कल्चर रिपोर्ट सामने आई. इस रिपोर्ट में एक ऑपरेशन थिएटर पॉजिटिव आया. हालांकि, इसे तभी से बंद किया गया है. इसके बाद दोबारा इसकी जांच हुई तो फिर से रिपोर्ट पॉजिटिव आई. आज करीब 14 दिन बाद तीसरी बार जांच करवाने पर यह ऑपरेशन थिएटर ऑपरेशन के लिए ठीक हुआ है. अस्पताल प्रशासन का कहना है कि इस ऑपरेशन थिएटर में एक भी ऑपरेशन नहीं हुआ है.
मंत्री खींवसर ने जयपुर में बैठक की
पूरे मामले में चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर जयपुर में बड़ी बैठक की. इस दौरान उन्होंने कहा कि हमारे पास जो ब्लड रिपोर्ट्स आई है, वे सभी सामान्य हैं. हमने डिहाइड्रेशन की संभावना पर भी विचार किया था, क्योंकि उस समय गर्मी थी, लेकिन अब मानसून भी आ चुका है. इसलिए हमारा पूरा फोकस इस बात पर है कि आखिर इसका रूट कॉज क्या है.
उन्होंने कहा कि बेसिकली, पूरे देश में एक लाख डिलीवरी पर 48 मातृ मृत्यु का राष्ट्रीय औसत है. इसमें सामान्य और सीजेरियन, दोनों तरह की डिलीवरी शामिल हैं. राजस्थान इस राष्ट्रीय औसत से नीचे है.
ऑपरेशन थिएटर को तीन बार में क्लीन चिट
एक ओर जहां अस्पताल प्रशासन महिलाओं की मेडिकल कंडीशन और चिकित्सा मंत्री आंकड़ों का हवाला देकर जांच करवाने की बात कर रहे हैं. वहां एक के बाद एक कोटा, बीकानेर, जोधपुर, बांसवाड़ा और भीलवाड़ा से प्रसूताओं की मौत के मामले सामने आ रहे हैं. भीलवाड़ा के इस अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर को तीन बार में क्लीन चिट मिल रही है. फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर आशा सहयोगनियां हड़ताल पर है. ये सभी बातें गंभीर सवाल खड़े करती है.
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