अगर आप महाराष्ट्र के किसी चर्च में प्रार्थना सभा में शामिल होने जा रहे हैं तो संभव है कि आपको पहले एक फॉर्म भरने के लिए कहा जाए. इस फॉर्म में आपको लिखकर देना होगा कि आप अपनी मर्जी से चर्च आए हैं, किसी ने आप पर दबाव नहीं डाला और न ही किसी लालच या प्रलोभन के तहत आप यहां पहुंचे हैं. आपको सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू होने के बाद कुछ चर्चों ने एहतियात के तौर पर यह व्यवस्था शुरू कर दी है. चर्चों का कहना है कि यह धार्मिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि भविष्य में किसी तरह के आरोप या जांच की स्थिति में खुद को सुरक्षित रखने का एक तरीका है. यही वजह है कि अब प्रार्थना सभा में शामिल होने वाले लोगों से लिखित घोषणा ली जा रही है और इन रिकॉर्ड्स को चर्च कार्यालयों में संभालकर रखा जा रहा है.
क्या है यह फॉर्म और क्या लिखवाया जा रहा है?
मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) के कई चर्चों में आने वाले श्रद्धालुओं से सेल्फ-डिक्लेरेशन फॉर्म भरवाया जा रहा है. इसमें व्यक्ति को यह घोषित करना होता है कि वह अपनी इच्छा से प्रार्थना सभा में शामिल हो रहा है. उसके ऊपर किसी प्रकार का दबाव नहीं है और उसे किसी तरह का लालच या प्रलोभन नहीं दिया गया है.
'यह सुरक्षा के लिए है, किसी पर दबाव के लिए नहीं'
पालघर जिले के वसई इलाके के पादरी सैम मैथाई ने पीटीआई से बातचीत में कहा कि यह व्यवस्था चर्चों की "सेल्फ सेफ्टी" के लिए शुरू की गई है. उन्होंने बताया कि श्रद्धालुओं द्वारा भरे गए फॉर्म चर्च कार्यालयों में सुरक्षित रखे जाएंगे. अगर भविष्य में पुलिस या सरकारी अधिकारी ऐसे रिकॉर्ड मांगते हैं तो उन्हें दिखाया जा सकेगा. चर्चों का कहना है कि इसका मकसद लोगों को प्रार्थना करने से रोकना नहीं, बल्कि रिकॉर्ड रखना है.
फिलहाल ये इंतजाम मुंबई और आसपास के चर्चों में
धार्मिक मामलों के जानकारों का मानना है कि चर्चों की यह पहल सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राज्य में बदलते कानूनी माहौल को लेकर बढ़ी सतर्कता का संकेत है. पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों में धर्मांतरण से जुड़े कानूनों पर बहस होती रही है. ऐसे में धार्मिक संस्थाएं अब अपने कार्यक्रमों और गतिविधियों से जुड़ा ज्यादा से ज्यादा दस्तावेजी रिकॉर्ड रखना चाहती हैं ताकि किसी विवाद की स्थिति में उनके पास स्पष्ट सबूत मौजूद हों.फिलहाल यह व्यवस्था मुंबई महानगर क्षेत्र और आसपास के कुछ चर्चों में शुरू हुई है. लेकिन अगर यह मॉडल प्रभावी साबित होता है तो संभव है कि दूसरे चर्च या धार्मिक संस्थान भी इस तरह के रिकॉर्ड रखने पर विचार करें.
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