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मुंबई महापौर पद पर सियासी संग्राम: मराठी, उत्तर भारतीय, मुस्लिम या हिंदू- BMC चुनाव में चरम पर पहचान की राजनीति

BMC चुनाव में अकेले उतर रही AIMIM ने ठाकरे ब्रदर्स के इस नैरेटिव को सीधे चुनौती दी. AIMIM नेता वारिस पठान ने कहा, 'हम संविधान और सेक्युलरिज्म में विश्वास रखते हैं. खान, पठान या बुर्का पहनने वाली महिला भी मुंबई की महापौर बन सकती है.'

मुंबई महापौर पद पर सियासी संग्राम: मराठी, उत्तर भारतीय, मुस्लिम या हिंदू- BMC चुनाव में चरम पर पहचान की राजनीति
  • मुंबई महापौर पद को लेकर ठाकरे ब्रदर्स ने मराठी अस्मिता और स्थानीय नेतृत्व को चुनावी नैरेटिव बनाया है
  • AIMIM ने सेक्युलरिज्म और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के आधार पर महापौर पद को लेकर ठाकरे ब्रदर्स को चुनौती दी है
  • महायुति ने महापौर पद के लिए मराठी और हिंदू होने की बात कही और ठाकरे गुट पर हिंदुओं को बांटने का आरोप लगाया है
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मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे मुंबई के अगले महापौर को लेकर राजनीतिक लड़ाई तेज होती जा रही है. अब यह मुकाबला सिर्फ सत्ता और प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पहचान, अस्मिता और नैरेटिव की राजनीति में बदल चुका है. भाजपा, शिवसेना (UBT), मनसे गठबंधन, AIMIM और महायुति-सभी अपने-अपने बयान और पोस्ट के जरिये एक-दूसरे पर हमला बोल रहे हैं.

ठाकरे ब्रदर्स का नैरेटिव: ‘महापौर मराठी होगा'

ठाकरे ब्रदर्स-राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे-के गठबंधन की आधिकारिक घोषणा के साथ ही एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश सामने आया. दोनों नेताओं ने यह नैरेटिव सेट किया कि 'मुंबई का महापौर मराठी होगा और ठाकरे ब्रदर्स के गठबंधन से होगा.'

इस बयान को मराठी अस्मिता और स्थानीय नेतृत्व के मुद्दे से जोड़कर देखा जा रहा है. विपक्षी दलों का आरोप है कि ठाकरे गुट चुनाव को प्रशासनिक मुद्दों से हटाकर भावनात्मक पहचान की ओर मोड़ रहा है.

AIMIM की एंट्री और नया मोड़ 

BMC चुनाव में अकेले उतर रही AIMIM ने ठाकरे ब्रदर्स के इस नैरेटिव को सीधे चुनौती दी. AIMIM नेता वारिस पठान ने कहा, 'हम संविधान और सेक्युलरिज्म में विश्वास रखते हैं. खान, पठान या बुर्का पहनने वाली महिला भी मुंबई की महापौर बन सकती है.'

इस बयान के बाद चुनावी बहस ने नया मोड़ ले लिया. अब चर्चा सिर्फ मराठी बनाम गैर-मराठी नहीं रही, बल्कि धर्म और सेक्युलरिज्म भी केंद्र में आ गए.

भाजपा-शिंदे शिवसेना (महायुति) का स्टैंड 

भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने, जो BMC चुनाव में महायुति के तौर पर मैदान में हैं, स्पष्ट रुख अपनाया है. महायुति का कहना है, 'मुंबई का महापौर मराठी होगा और हिंदू होगा.' साथ ही, ठाकरे ब्रदर्स पर यह आरोप भी लगाया गया कि वे हिंदुओं को बांटने की राजनीति कर रहे हैं.

कृपाशंकर सिंह के बयान से सियासी विस्फोट 

इस पूरे विवाद को और भड़काने वाला बयान भाजपा नेता कृपाशंकर सिंह का रहा. उन्होंने कहा, 'हम यह सुनिश्चित करेंगे कि ज्यादा से ज्यादा उत्तर भारतीय चुने जाएं और मुंबई का महापौर उत्तर भारतीय होगा.' इस बयान के बाद सियासी तूफान खड़ा हो गया.

शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने कृपाशंकर सिंह का वीडियो X (पूर्व ट्विटर) पर साझा करते हुए लिखा, 'भाजपा ने तय कर लिया है - मुंबई का महापौर बाहरी होगा! मराठी लोगों… जागो!'

यह पोस्ट ठाकरे गुट के उस पुराने राजनीतिक नैरेटिव को फिर से सामने लाती है, जिसमें मुंबई की सत्ता को 'बाहरी बनाम मराठी' के रूप में पेश किया जाता रहा है.

नीतीश राणे की एंट्री, किया जवाबी हमला 

इसके जवाब में महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नीतीश राणे ने X पर तीखा हमला बोला. उन्होंने सवाल उठाया कि जब वारिस पठान मुस्लिम महापौर की बात करते हैं, तब ठाकरे गुट चुप क्यों रहता है, लेकिन उत्तर भारतीय महापौर की बात आते ही विरोध क्यों? नीतीश राणे ने लिखा, 

ठाकरे गुट को जितनी मिर्ची उत्तर भारतीय महापौर को लेकर लगी..
उतनी मिर्ची बुर्का पहनने वाली महापौर बनने पर क्यों नहीं लगी?
लगता है इन्होंने हिंदुओं के बीच फूट डालने की सुपारी ले रखी है.
बाकी…
मुंबई का महापौर
मराठी और हिंदू ही होगा.
और वह हमारा ही होगा!

जानकारों का क्‍या मानना है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महापौर पद को लेकर चल रही यह बहस BMC के असली मुद्दों-जैसे भ्रष्टाचार, बुनियादी सुविधाएं, सड़कें, जलभराव, स्वास्थ्य और शिक्षा-से ध्यान हटाकर पहचान की राजनीति में बदलती जा रही है.

ठाकरे ब्रदर्स मराठी अस्मिता को केंद्र में रखकर कोर वोट बैंक को साधना चाहते हैं. भाजपा-महायुति हिंदुत्व और मराठी पहचान के संयुक्त नैरेटिव से जवाब दे रही है. AIMIM सेक्युलरिज्म और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की बात कर अलग ध्रुव बनाने की कोशिश में है. उत्तर भारतीय वोट बैंक को लेकर भी राजनीतिक दलों के बीच खींचतान साफ दिख रही है.

मुंबई के महापौर का पद अब सिर्फ एक संवैधानिक पद नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक बन चुका है. BMC चुनाव में यह साफ हो चुका है कि लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि मुंबई की पहचान कौन तय करेगा और किस नैरेटिव के तहत तय करेगा. आने वाले दिनों में जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज होगा, महापौर पद को लेकर यह सियासी जंग और भी तीखी होने के आसार हैं.
 

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