इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेरठ से जुड़ी एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है. कोर्ट ने कहा कि जब एडिशनल सेशंस जज को यह जानकारी थी कि संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट एसएलपी पर फैसला सुना चुका है, तो ट्रायल कोर्ट को उसके आदेश की प्रति का इंतज़ार करना चाहिए था. अगर मामले को एक या दो दिन के लिए टाल दिया जाता तो 'कोई आसमान नहीं टूट पड़ता.'
जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की सिंगल बेंच ने हामिद, अकरम और दानिश की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को स्वीकार करते हुए मेरठ सेशन कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत शक्ति का प्रयोग बेहद सावधानी से किया जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने अत्यधिक जल्दबाजी दिखाई.
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ताओं ने सीआरपीसी की धारा 397/401 के तहत सितंबर 2024 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उन्होंने मेरठ सेशन कोर्ट के 17 अगस्त 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत विपक्षी पक्ष अजवार द्वारा दाखिल धारा 319 के आवेदन (133-खा) को स्वीकार कर लिया गया था. इसके जरिए याचिकाकर्ताओं को थाना मुंडाली, मेरठ में दर्ज दोहरे हत्याकांड से जुड़े मामले में ट्रायल का सामना करने के लिए समन जारी किया गया था.
यह मामला 19 मई 2020 को मेरठ के थाना मुंडाली क्षेत्र में हुई दो व्यक्तियों की हत्या से जुड़ा है. पुलिस जांच के बाद याचिकाकर्ताओं के नाम चार्जशीट से हटा दिए गए थे, लेकिन वादी पक्ष ने धारा 319 के तहत इन्हें मुकदमे में शामिल करने की मांग की थी, जिसे ट्रायल कोर्ट ने मंज़ूर कर लिया था.
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं
याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि सेशन कोर्ट को यह जानकारी थी कि 8 जुलाई 2024 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी लंबित है. इसी कारण आवेदन 133-खा की सुनवाई 14 अगस्त 2024 तक टाल दी गई थी. उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी पर फैसला सुना दिया था, लेकिन आदेश 17 अगस्त को अपलोड हुआ और उसी दिन सेशन कोर्ट को इसकी सूचना दी गई। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतजार किए बिना समन जारी कर दिया, जो अपने आप में आदेश को रद्द करने का पर्याप्त आधार है.
वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि यह दोहरे हत्याकांड का मामला है और आरोपियों के नाम मूल एफआईआर में दर्ज थे. स्वतंत्र गवाहों के आधार पर नाम हटाना गलत था और आरोपियों ने सीधे फायरिंग की थी, इसलिए ट्रायल जरूरी है.
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अपने 18 पन्नों के फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही पहले 30 दिनों में फैसला करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश को देखकर फैसला देने में एक-दो दिन की देरी से कोई नुकसान नहीं होता. कोर्ट ने कहा कि ऐसी जल्दबाजी अनुचित है और अदालतों को ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे न्यायिक संस्थाओं में लोगों का भरोसा कमजोर पड़े.
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वह सेशन कोर्ट की अनुचित और बेवजह जल्दबाजी पर और कठोर टिप्पणियां कर सकता था, लेकिन ऐसा करने से बच रहा है.
अब आगे क्या?
हाईकोर्ट ने समन आदेश को रद्द करते हुए संबंधित सेशंस कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह सभी पक्षों को सुनकर 31 मार्च 2026 तक नया आदेश पारित करे.
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