- बीएमसी चुनाव के लिए बीजेपी से लेकर शिवसेना और कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी
- शिवसेना (उद्धव गुट) और शिवसेना (शिंदे गुट) के लिए बीएमसी की लड़ाई अस्तित्व की जंग है
- बीजेपी इस बार के चुनाव में बीएमसी की सत्ता पाने की पूरी कोशिश कर रही है
मुंबई में समंदर की लहरों से ज्यादा तेज इस वक्त सियासत का पारा चढ़ रहा है. मुद्दा है देश की सबसे अमीर महापालिका यानी BMC बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) का चुनाव. यह चुनाव महज एक नगर निगम का चुनाव नहीं है, बल्कि यह अस्तित्व की लड़ाई है, साख का सवाल है और सबसे बढ़कर 'मुंबई का असली बॉस' कौन, इसका फैसला करने वाला रणक्षेत्र है!
मुंबई नगर निगम का सालाना बजट 74,000 करोड़ रुपये से अधिक है. यह बजट कई छोटे राज्यों के कुल बजट से भी बड़ा है. जो बीएमसी पर राज करता है, उसकी पकड़ मुंबई की धड़कन और अर्थव्यवस्था पर होती है. यही कारण है कि इसे 'मिनी विधानसभा' कहा जाता है.
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देवेंद्र फडणवीस भी झोंक रहे पूरी ताकत
3 गुटों में महासंग्राम
इस बार का बीएमसी चुनाव 2017 जैसा सरल नहीं है. तब लड़ाई सीधी थी, अब समीकरण उलझ गए हैं.
1. महायुति (BJP और शिंदे की शिवसेना)
बीजेपी इस बार किसी भी कीमत पर बीएमसी से उद्धव की शिवसेना का दशकों पुराना कब्जा हटाना चाहती है. एकनाथ शिंदे के लिए यह खुद को 'असली शिवसेना' साबित करने की अग्निपरीक्षा है. 227 सीटों में से बीजेपी 137 और शिंदे सेना 90 सीटों पर जोर लगा रही है.
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उद्धव और राज ठाकरे एकसाथ आए
2. ठाकरे ब्रदर्स का गठजोड़ (UBT + MNS + NCP-SP)
बीएमसी चुनाव ने वो कर दिखाया जो बीते बीस सालों में मुमकिन नहीं हो पाया! सबसे बड़ी खबर उद्धव और राज ठाकरे का एक साथ आना है. शिंदे द्वारा नाम और निशान ले जाने के बाद उद्धव के पास कैडर बचाने की चुनौती है, तो राज को अपनी प्रासंगिकता. शिवसेना (UBT) 163, मनसे 53 और शरद पवार की एनसीपी 11 सीटों पर तालमेल कर रही है. "ठाकरे" सरनेम के साथ आने से शिवसैनिकों में यह विश्वास जगा है कि शक्ति वापस लौट रही है. इससे मराठी वोटों का बंटवारा रुकेगा, जिसका सीधा नुकसान शिंदे गुट को होगा.
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3. कांग्रेस और वंचित बहुजन आघाडी (VBA)
एमएनएस से दूरी बनाने के लिए विपक्षी गठबंधन MVA में ना रहते हुए कांग्रेस अपने दम पर 167 सीटों पर लड़ रही है, जबकि प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी 46 सीटों पर है. ये गुट धर्मनिरपेक्ष और दलित वोटों के सहारे पासा पलटने की फिराक में है. मुंबई में मराठी भाषी आबादी अब करीब करीब 20% में सिमट गई है. गुजराती, मारवाड़ी और उत्तर भारतीय मतदाताओं का प्रभाव निर्णायक हो चुका है. इसलिए राजनीति इसके इर्द गिर्द ही घूमती है.
मुंबई की राजनीति में मुसलमान अहम
मुंबई की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिनकी जनसंख्या 1961 के 8% से बढ़कर 2011 में 21% हो गई है और 2026 के बीएमसी चुनावों तक इसके 22% से अधिक होने का अनुमान है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान रुझान जारी रहने पर 2051 तक यह आबादी 30% तक पहुंच सकती है. मुंबई की लगभग 60 नगर निगम और विधानसभा सीटों पर यह मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, विशेषकर मुंबादेवी (51%), भायखला (53%), मानखुर्द-शिवाजी नगर (53%) और धारावी (33.4%) जैसे क्षेत्रों में जहाँ इनकी घनी आबादी है.

कौन पार्टी मुस्लिमों की पसंद
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पारंपरिक रूप से इनकी पसंद रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में शिवसेना (UBT) ने भी इस वर्ग में अपनी पैठ बनाई है, जबकि AIMIM 'मुस्लिम मेयर' जैसे नारों के साथ अपना प्रभाव बढ़ा रही है. इसके विपरीत, भाजपा अक्सर जनसांख्यिकीय बदलाव और घुसपैठ जैसे मुद्दों के जरिए अपने कोर वोट बैंक को एकजुट कर इस प्रभाव का मुकाबला करने की रणनीति अपनाती है. उद्धव के पास बालठाकरे के कट्टर समर्थकों की सहानुभूति है. राज ठाकरे के पास युवाओं का आकर्षण और आक्रामक शैली है. बीजेपी की ताकत उत्तर भारतीय और व्यापारिक वर्गों का एकजुट समर्थन है.
BMC में बीजेपी की बढ़ती ताकत
बीएमसी में बीजेपी का वजूद समय के साथ काफी मजबूत हुआ है, 1980 और 90 के दशक में बीजेपी, शिवसेना के 'जूनियर पार्टनर' के रूप में रही. 2017 के बीएमसी चुनावों में बीजेपी का वजूद सबसे तेजी से बढ़ा, जब पार्टी ने 31 सीटों से छलांग लगाकर 82 सीटें जीतीं, जो शिवसेना (84 सीटें) के लगभग बराबर थीं. गैर-मराठी और प्रवासी मतदाताओं के बढ़ते समर्थन के कारण बीजेपी अब बीएमसी में एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरी है.
2017 के पिछले बीएमसी चुनाव में शिवसेना और बीजेपी अलग लड़े थे और नतीजे बेहद चौंकाने वाले थे.
* शिवसेना: 84 सीटें (सबसे बड़ी पार्टी)
* BJP: 82 सीटें (सिर्फ 2 सीट पीछे)
* कांग्रेस: 31 सीटें
* NCP: 9 सीटें
* MNS: 7 सीटें (बाद में 6 पार्षद शिवसेना में शामिल हो गए थे)
कौन बनेगा मुंबई का किंग?
उद्धव ठाकरे ने 2002 में बीएमसी चुनाव के लिए शिवसेना के प्रचार प्रभारी के रूप में अपना राजनीतिक करियर शुरू किया और लगभग तीन दशकों तक बीएमसी पर अपनी पार्टी का वर्चस्व बनाए रखा. उनके कार्यकाल में मराठी मानुष और क्षेत्रीय विकास के मुद्दों पर जोर दिया गया. लेकिन अब लगभग सभी दल डरे हुए हैं क्योंकि यह चुनाव भविष्य की सत्ता तय करेगा. उद्धव ठाकरे के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है; अगर बीएमसी हाथ से गई तो पार्टी को दोबारा खड़ा करना मुश्किल होगा. एकनाथ शिंदे के लिए डर यह है कि अगर मराठी वोट एकजुट होकर ठाकरे की तरफ गया, तो उनका बगावत का दांव फेल हो सकता है. BJP के लिए यह अपनी श्रेष्ठता साबित करने और मुंबई पर पूर्ण नियंत्रण पाने का मौका है. मुद्दा मराठी अस्मिता बनाम विकास का तो है ही, लेकिन पर्दे के पीछे असली लड़ाई उस 74,000 करोड़ की चाबी की है जो मुंबई के संसाधनों पर नियंत्रण देती है.
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