महाराष्ट्र में एफडीए चीफ तुकाराम मुंडे ने घटिया खाद्य पदार्थों के बाद अब दवा कंपनियों की मनमानी और कीमतों में बढ़ोतरी का भंडाफोड़ किया है. आईएएस तुकाराम ने खुलासा किया है कि 11 रुपये की दवा 30 गुना ज्यादा कीमत पर बेची जा रही है. महाराष्ट्र FDA ने सरकार से गुजारिश की है कि मरीजों से सर्जिकल सामान को सख्त कीमत नियंत्रण के दायरे में लाया जाए. तुकाराम ने खुद ट्वीट कर इनपेशेंट मेडिकल उपकरणों पर भारी मुनाफाखोरी का पर्दाफाश किया है.महाराष्ट्र FDA प्रमुख तुकाराम मुंडे ने बेरोकटोक कीमत तय करने की परंपरा को खत्म करने के लिए ट्रेड मार्जिन पर लिमिट लगाने की मांग की है. बिस्तर पर पड़े मरीजों से बुनियादी मेडिकल सामान के लिए कैसे मुंहमांगे पैसे वसूले जाते हैं, उसकी नजीर तुकाराम ने पेश की है. राज्य FDA ने मेडिकल सामान पर ज्यादा रेट वसूलने की प्रथा को खत्म करने की मांग की.
आईएएस तुकाराम मुंडे का एक्स पोस्ट
आईएएस तुकाराम ने एक्स पोस्ट में कहा, 11 रुपये में खरीदा गया IV इन्फ्यूजन सेट बिस्तर पर पड़े मरीज को 325 रुपये में बेचा गया. 40 का नेबुलाइजर मास्क 715 में बेचा गया. 22.50 रुपये में खरीदी गई IV कैनुला की कीमत 424 तक बढ़ा दी गई. ये आंकड़े महाराष्ट्र खाद्य और औषधि प्रशासन (FDA) ने ऐसे मेडिकल सामानों की लागत और रेट की तुलना करके पेश किए हैं.
दवा कंपनियों की मुनाफाखोरी
फार्मास्यूटिकल्स विभाग के केंद्रीय सचिव को ये रिपोर्ट भेजी गई है. महाराष्ट्र FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे ने इस बेरोकटोक मुनाफाखोरी को खत्म करने और सर्जिकल सामान को भी तुरंत ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) 2013 के नियामक दायरे में लाने का आग्रह किया है.सर्वेक्षण में IV सेट, सिरिंज, नेबुलाइज़र, ऑक्सीजन मास्क और अन्य सामानों की कीमतों की जांच की गई. जांच में FDA ने कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी को बेतुका और गैर-वाजिब बताया.
The most expensive part of a hospital bill may never touch the hospital at all.
— Tukaram Mundhe (@Tukaram_IndIAS) September 15, 2026
A patient admitted for care has no way of knowing whether the price on a medical consumable reflects its actual cost or a markup fixed long before it ever reached the ward. That gap in information…
IV सेट की मुंहमांगी कीमत
मेडिप्लस हरियाणा के मेडीफ्यूजन IV सेट की खरीद कीमत 11.05 और MRP 325 थी.कंपनी को करीब 30 गुना मार्जिन मिला. एक और ब्रांड लिवोफ्यूजन में 20 गुना का मार्जिन देखा गया. 22.50 में खरीदे गए IV कैनुला की MRP 424 थी यानी 18 गुना. 29 में खरीदे गए रिबेल कैथेटर की कीमत 310 रखी गई थी, जो करीब 10 गुना का मार्जिन दिखाता है. 50.68 रुपये में खरीदे गए रोमसन फिल्टर की कीमत 473 रुपये थी, यानी 8 गुना का मार्जिन.
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नेबुलाइजर और मास्क के मनमाने रेट
Mediplus India के Nebplus नेबुलाइजर की खरीद कीमत 40 रुपये थी, लेकिन मरीज़ों से इसके लिए 715 रुपये लिए गए जो 17 गुना का मार्जिन दिखाता है. विन्जो हेल्थकेयर के एडल्ट नेबुलाइजर मास्क किट पर 14 गुना का मार्जिन देखा गया. लाइफलॉन्ग मेडिटेक की एक स्टैंडर्ड 10 एमएल सिरिंज 6.75 के रेट से 8 गुना ज्यादा 57.20 रुपये में बेचा गया. सर्वे से पता चला कि ट्रेड-लेवल पर मार्जिन थोक खरीद लागत का लगभग 29 गुना तक पहुंच गया.शेड्यूल की गई दवाओं के विपरीत कई तरह के मेडिकल डिवाइस अभी DPCO के तहत सख्त कानूनी कीमत नियंत्रण के दायरे से बाहर हैं. यह रेगुलेटरी कमी मैन्युफैक्चरर कंपनियों को बढ़ा-चढ़ाकर MRP छापने का मौका देती हैं.इससे अस्पतालों और ट्रेड बिचौलियों को भारी मार्जिन कमाने का मौका मिलता है.
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दवा कंपनियों कैसे कर रहीं गोलमाल
- खरीद लागत में पहले से ही मार्जिन शामिल है. थोक खरीद कीमत में दवा निर्माता कंपनी का पूरा खर्च पहले से ही शामिल होता है. इसमें प्रोडक्शन कॉस्ट, रिसर्च और प्रोडक्ट डेवलपमेंट, मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और मैन्युफैक्चरर का प्रॉफिट मार्जिन शामिल है.
- बेबस ग्राहक: अस्पताल में भर्ती मरीजों के पास मोलभाव करने की कोई ताकत नहीं होती. गंभीर बीमारियों के इलाज के दौरान अस्पताल के स्टाफ द्वारा दिए गए सामान को न तो चुन सकते हैं, न तुलना कर सकते हैं और न ही लेने से मना कर सकते हैं. इमरजेंसी में अस्पताल में भर्ती होने वाले परिवारों का अपनी जेब से होने वाला हेल्थकेयर खर्च सीधे तौर पर बढ़ जाता है.
महाराष्ट्र FDA ने केंद्र को क्या सुझाव दिया?
- कमिश्नर मुंडे ने केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्रालय और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के सामने 4 मुख्य पॉलिसी मांगें रखीं
- डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स और NPPA द्वारा नतीजों की तुरंत संयुक्त जांच हो
- DPCO 2013 के तहत कानूनी रूप से सर्जिकल सामानों को शामिल किया जाए
- रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का विस्तार किया जाए ताकि अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए इस्तेमाल सर्जिकल सामान को व्यवस्थित, कानूनी कीमत निगरानी के दायरे में लाया जा सके.
- थोक खरीद लागत और छपे हुए MRP के बीच प्रतिशत के अंतर पर एक स्वीकार्य सीमा (कैप) तय करना.
- सप्लाई चेन में पारदर्शिता, निष्पक्ष व्यापारिक कामकाज करने के लिए राज्य और नेशनल लेवल पर निगरानी तंत्र बनाया जाए.
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