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अरुण फरेरा को ₹2 लाख का मुआवजा; अवैध गिरफ्तारी पर बॉम्बे HC की फटकार, महाराष्ट्र सरकार को दिया 8 हफ्ते का समय

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने 2011 में अरुण फरेरा की दोबारा गिरफ्तारी को अवैध करार देते हुए महाराष्ट्र सरकार को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है. अदालत ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना.

अरुण फरेरा को ₹2 लाख का मुआवजा; अवैध गिरफ्तारी पर बॉम्बे HC की फटकार, महाराष्ट्र सरकार को दिया 8 हफ्ते का समय
अरुण फरेरा को HC से राहत, अवैध गिरफ्तारी पर मिलेगा मुआवजा
अल्टर्ड बाय NDTV
  • जेल से रिहा होते ही फिर गिरफ्तार हुए थे अरुण फरेरा, 15 साल बाद HC का बड़ा फैसला
  • पुलिस ने नहीं बताए थे गिरफ्तारी के कारण, हाईकोर्ट ने दिया ₹2 लाख मुआवजा
  • अरुण फरेरा की अवैध गिरफ्तारी पर महाराष्ट्र सरकार को फटकार
नागपुर:

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने वर्ष 2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अरुण थॉमस फरेरा की दोबारा गिरफ्तारी को अवैध ठहराते हुए महाराष्ट्र सरकार को उन्हें दो लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. अदालत ने माना कि नागपुर सेंट्रल जेल से रिहाई के तुरंत बाद सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा की गई कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्राप्त अधिकारों का उल्लंघन थी. कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून की रक्षा करने वालों को ही कानून का सम्मान करना चाहिए. नागपुर से NDTV के लिए प्रवीण मुधोलकर की रिपोर्ट.

रिहाई के तुरंत बाद हुई थी दोबारा गिरफ्तारी

अरुण फरेरा को मई 2007 में कथित माओवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था. वह चार वर्ष से अधिक समय तक जेल में रहे. बाद में उन्हें उस समय लंबित आठ मामलों में बरी कर दिया गया.

27 सितंबर 2011 को जब फरेरा नागपुर सेंट्रल जेल से रिहा हो रहे थे, तभी जेल के बाहर सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें दोबारा हिरासत में ले लिया. आरोप है कि उन्हें एक बिना नंबर वाली गाड़ी में बैठाकर ले जाया गया.

फरेरा की मां, भाई और वकील मौके पर मौजूद थे, लेकिन पुलिस ने न तो गिरफ्तारी के कारण बताए और न ही कोई लिखित दस्तावेज उपलब्ध कराया.

हाईकोर्ट ने कहा- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस राज डी. वाकोड़े की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि पुलिस की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण) का सीधा उल्लंघन है.

अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय कारण बताना संवैधानिक दायित्व है और इसमें किसी प्रकार का अपवाद स्वीकार नहीं किया जा सकता.

राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि फरेरा के कथित नक्सली संबंधों के कारण गोपनीयता बरतना जरूरी था. लेकिन अदालत ने राज्य सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया.

अरुण फरेरा उन 16 सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और वकीलों में भी शामिल रहे हैं, जिन पर जनवरी 2018 में पुणे के निकट भीमा कोरेगांव में जातीय हिंसा भड़काने के कथित आरोप में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया गया था.

पुलिस को लगी फटकार

फैसले में अदालत ने पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कानून की रक्षा करने वाले ही कानून का उल्लंघन करते हैं, तो ऐसे मामलों में प्रभावी दंड जरूरी हो जाता है ताकि समाज का भरोसा बना रहे. कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस के आदर्श वाक्य 'सदरक्षणाय खलनिग्रहणाय' (सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का दमन) का उल्लेख करते हुए कहा कि पुलिस का दायित्व केवल आरोपी के प्रति नहीं बल्कि राज्य और पूरे समाज के प्रति भी होता है. फरेरा को जनवरी 2012 में जमानत मिली थी और वर्ष 2014 में उस समय उनके खिलाफ लंबित सभी मामलों में उन्हें बरी कर दिया गया था.

25 लाख की मांग, मिले 2 लाख

अरुण फरेरा ने अपनी याचिका में 25 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी. हालांकि अदालत ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दो लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. नागपुर बेंच ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि यह राशि आठ सप्ताह के भीतर जमा कराई जाए. साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि फरेरा अधिक मुआवजा चाहते हैं तो वे अलग से सिविल वाद दायर करने के लिए स्वतंत्र हैं.

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