- मध्य प्रदेश के उमरिया में कुपोषण से सात साल के सनम बैगा की मौत हो गई.
- सनम के माता-पिता खुद अपने बहुत कमजोर हो चुके बेटे का इलाज करे रहे थे.
- परिवार का आरोप है कि प्रशासन की ओर से उनकी कोई मदद नहीं की गई.
सात साल का सनम बैगा इतना कमजोर था कि उसका ठीक से चलना तो दूर खड़ा रहना भी मुश्किल था. परिवार ने उमरिया, शहडोल, कटनी और जबलपुर तक में उसका इलाज कराया, लेकिन सनम जिंदगी की जंग समय से पहले ही हार गया. उसका परिवार बेटे को खोने के दर्द से गुजर रहा है.
उमरिया जिले के करकेली ब्लॉक के ग्राम नरवर-25 का रहने वाला सनम बैगा गंभीर कुपोषण और खराब स्वास्थ्य से जूझ रहा था. माता-पिता का आरोप है कि सनम की हालत लगातार बिगड़ती रही, लेकिन न तो आंगनवाड़ी स्तर पर उसकी नियमित निगरानी की गई और न ही स्वास्थ्य विभाग ने यह सुनिश्चित किया कि उसे जरूरी पोषण सहायता मिले. मेरा बेटा चला गया, अब जिला प्रशासन जांच की बात कह रहा है. जांच के लिए आदेश भी जारी किए गए हैं.

सात साल का सनम बैगा जिसकी कुपोषण से हुई मौत. Photo- Anurag Dwary
बेटे को खोने का दर्द हमेशा रहेगा
मां बोली- हमने खुद ही इलाज कराया
मां लक्ष्मी बैगा ने कहा कि सनम के इलाज की पूरी व्यवस्था परिवार को खुद करनी पड़ी. उन्होंने NDTV से कहा, “मेरा बच्चा बहुत कमजोर था. आंगनवाड़ी हो या स्वास्थ्य विभाग कहीं से कोई भी नहीं आया. हमें कभी पोषण आहार तक नहीं मिला, जो हम अपने बच्चे को खिलाते. उसका इलाज भी हमने अपने स्तर पर कराया.” परिवार का आरोप है कि सनम के जन्म के बाद सरकारी विभाग के लोग एक बार आए थे, लेकिन बाद में उसके गिरते स्वास्थ्य की निगरानी के लिए कोई नहीं आया.
ये सोनम बैगा है, उम्र 7 साल ...मौत हो गई.. उमरिया में रहते थे... मां-बाप कहते हैं बच्चा कुपोषित था सरकारी फाइलें कभी घर तक पहुंची ही नहीं pic.twitter.com/iGwXMhmZgl
— Anurag Dwary (@Anurag_Dwary) September 1, 2026
एसडीएम बोले- मामले की जांच करा रहे

प्रदेश की लगभग 97 हजार आंगनवाड़ियों को ही करीब 170 दिन नियमित पोषण आहार मिल सका. Photo- Anurag Dwary
300 दिन पोषण का प्रावधान, करीब 170 दिन ही नियमित आपूर्ति
केंद्र सरकार के मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के तहत गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं तथा छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों को साल में कम से कम 300 दिन पूरक पोषण आहार दिया जाना है. मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां 453 बाल विकास परियोजनाओं के तहत करीब 97,882 स्वीकृत आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जिनमें लगभग 85 लाख लाभार्थी पंजीकृत हैं. NDTV की पड़ताल में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र की ओर से 300 दिन के तय प्रावधान के मुकाबले प्रदेश की लगभग 97 हजार आंगनवाड़ियों को ही करीब 170 दिन नियमित पोषण आहार मिल पाया.
रिकॉर्ड अपडेट, पर राशन की आपूर्ति नहीं हुई
भोपाल, सागर, विदिशा और आगर-मालवा में NDTV की ग्राउंड पड़ताल में भी कई आंगनवाड़ी केंद्रों पर टेक-होम राशन की आपूर्ति एक से तीन महीने तक बाधित पाई गई. बच्चे, गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली माताएं सरकारी रिकॉर्ड में पंजीकृत रहीं. उनके नाम सरकारी ऐप पर दिखाई देते रहे और रिकॉर्ड अपडेट होते रहे, लेकिन कई केंद्रों की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने बताया कि वास्तविक राशन की आपूर्ति नहीं हुई.
मंत्री ने भी आपूर्ति व्यवस्था में स्वीकार की थी दिक्कतें

आंगनवाड़ी केंद्रों पर वजन नापने की व्यवस्था, लेकिन व्यवस्था सही नहीं. Photo- Anurag Dwary
बैगा परिवारों को ₹1,500 आहार अनुदान
सनम बैगा, मध्य प्रदेश की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में शामिल बैगा समुदाय से था. साल 2017 से बैगा, भारिया और सहरिया जनजातियों के परिवारों की महिला मुखिया को आहार अनुदान योजना के तहत आर्थिक सहायता दी जा रही है. योजना का उद्देश्य इन जनजातीय समुदायों में कुपोषण से मुकाबला करना है. शुरुआत में यह राशि ₹1,000 प्रतिमाह थी, जिसे अब बढ़ाकर ₹1,500 प्रतिमाह कर दिया गया है. लेकिन इसी के साथ एक दूसरी सरकारी योजना का नियम इन महिलाओं के लिए अलग स्थिति पैदा करता है.
लाडली बहना योजना में पात्रता का पेंच
लाडली बहना योजना के नियम 4.4 के मुताबिक, ऐसी महिला जो किसी अन्य सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत ₹1,500 या उससे अधिक प्रतिमाह प्राप्त कर रही है, वह लाड़ली बहना योजना के लिए पात्र नहीं है. इसी वजह से बैगा, भारिया और सहरिया समुदाय की तीन लाख से अधिक महिलाएं, जो लाडली बहना के दायरे में आतीं, लेकिन आहार अनुदान के तहत मिलने वाले 1,500 रुपये के कारण इस योजना से बाहर हैं.
चार में से दो बच्चे कम वजन के
31.4 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग यानी उम्र के अनुपात में कम लंबाई से प्रभावित हैं. आसान शब्दों में कहें तो प्रदेश में पांच साल से कम उम्र के करीब हर 10 में से 4 बच्चे कम वजन के हैं, जबकि लगभग हर चौथा बच्चा वेस्टिंग से प्रभावित है.
88 प्रतिशत बच्चों को नहीं मिल रहा विविधता वाला भोजन
NFHS-6 के आंकड़ों के अनुसार, छह से 23 महीने के बच्चों में केवल 12 प्रतिशत को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल रहा है. यानी करीब 88 प्रतिशत बच्चों को उनकी उम्र के मुताबिक पर्याप्त मात्रा और विविधता वाला भोजन नहीं मिल पा रहा. इसी बीच रीवा, सतना, देवास, शिवपुरी और नर्मदापुरम समेत अन्य जिलों के लिए पूरक पोषण आहार बनाने वाले राज्य से जुड़े सभी सात उत्पादन संयंत्र भारी घाटे के कारण बंद हो चुके हैं.

प्रदेश के कई आंगनवाड़ी केंद्रों की हालत भी खराब है. Photo- Anurag Dwary
पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी मौतें
सनम पहला गंभीर रूप से कम वजन वाला बच्चा नहीं है जिसकी मौत के बाद पोषण निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठे हैं. अप्रैल 2026 में सतना जिले के मझगवां ब्लॉक में चार महीने की सुप्रियांशी की मौत हो गई थी. उसका वजन सिर्फ 2.86 किलोग्राम था. उसका जुड़वां भाई नैतिक भी तीन किलो से कम वजन का था. सुप्रियांशी का नाम सरकारी पोषण ट्रैकर पर दर्ज था.
अगस्त 2025 में शिवपुरी में 15 महीने की दिव्यांशी की मौत हुई. मौत के समय उसका वजन सिर्फ 3.7 किलोग्राम था और हीमोग्लोबिन 7.4 ग्राम था, जो गंभीर एनीमिया की स्थिति को दर्शाता है. दिव्यांशी भी सरकारी अभियान के दौरान चिन्हित की गई थी और पोषण ट्रैकर पर दर्ज थी. सुप्रियांशी की मौत से करीब छह महीने पहले सतना में चार महीने के हुसैन रजा की भी मौत हुई थी. जन्म के समय उसका वजन करीब तीन किलो बताया गया था, लेकिन चार महीने बाद अस्पताल पहुंचने तक उसका वजन गिरकर केवल 2.5 किलो रह गया था. वह निमोनिया और गंभीर कम वजन की स्थिति से जूझ रहा था.
1,200 करोड़ की व्यवस्था, फिर भी आपूर्ति पर सवाल
टेक-होम राशन योजना के तहत छह महीने से तीन साल तक के बच्चों को हर महीने दो पैकेट हलवा प्रीमिक्स, एक पैकेट चाइल्ड फूड सप्लीमेंट और एक पैकेट खिचड़ी मिलनी चाहिए. गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को दो पैकेट गेहूं-सोया बर्फी, एक पैकेट गेहूं-बेसन मिश्रण और एक पैकेट खिचड़ी दिए जाने का प्रावधान है.
परिवहन और वितरण पर उठ चुके हैं सवाल
आंगनवाड़ी केंद्रों पर दर्ज आपूर्ति व्यवधान पहली बार सामने नहीं आए हैं. साल 2022 में NDTV की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया था कि सरकारी रिकॉर्ड में पोषण आहार ढोने वाले जिन वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर दर्ज थे, उनमें कई नंबर मोटरसाइकिल, ऑटो-रिक्शा और टैंकर के निकले. करीब 400 मीट्रिक टन राशन के परिवहन और वितरण पर सवाल उठे थे. इन खुलासों के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा में खूब हंगामा और विरोध हुआ था तब सरकार ने इसे खारिज किया था, लेकिन दो साल बाद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, यानी CAG, ने 2018 से 2021 के बीच करीब ₹428 करोड़ की अनियमितताएं चिन्हित कीं. इनमें लाभार्थियों की पहचान, उत्पादन, परिवहन और वितरण से जुड़े मामले शामिल थे.
राशन की नियमित आपूर्ति नहीं
वाहनों से जुड़ी विसंगतियां और ऑडिट की आपत्तियों पहले से रिकॉर्ड पर थीं. इसके बावजूद NDTV की हालिया ग्राउंड पड़ताल में कई जिलों की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने फिर बताया कि राशन की नियमित आपूर्ति नहीं हुई. भोपाल के एक आंगनवाड़ी केंद्र में, जो उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा के आवास के पीछे की एक गली में संचालित होता है, कार्यकर्ता रमा कुशवाहा ने बताया कि केंद्र को अप्रैल में स्टॉक मिला था, लेकिन मई और जून में नई आपूर्ति नहीं आई. जुलाई में फिर से आया है.
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