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15 साल पहले चोरी हुई थी राजा जयसिंह की ऐतिहासिक तोप, MP के इस थाने में है 'कैद'; 300 साल पुराना इतिहास दर्ज

2011 में चोरी हुई, पुलिस ने बरामद भी कर ली. लेकिन 15 साल बाद भी अपने घर नहीं लौट पाई राजा जयसिंह की ऐतिहासिक शत्रु संघार तोप. देवनागरी और फारसी में दर्ज इस अनमोल इतिहास की कहानी आज फिर चर्चा में है.

15 साल पहले चोरी हुई थी राजा जयसिंह की ऐतिहासिक तोप, MP के इस थाने में है 'कैद'; 300 साल पुराना इतिहास दर्ज
Narwar Fort Cannon Story: 15 साल से थाने में सुरक्षित राजा जयसिंह की ऐतिहासिक शत्रु संघार तोप
शिवपुरी:

Narwar Fort Historical Cannon: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले का ऐतिहासिक नरवर किला अपनी वीरता, स्थापत्य कला और गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है. लेकिन इसी इतिहास का एक अहम हिस्सा पिछले 15 वर्षों से अपने असली ठिकाने पर लौटने का इंतजार कर रहा है. यह कहानी है राजा जयसिंह के काल की ऐतिहासिक 'शत्रु संघार' तोप की, जिसे वर्ष 2011 में चोर किले से चुराकर ले गए थे. पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए तोप को बरामद कर लिया, लेकिन भारी वजन और दुर्गम रास्तों के कारण इसे दोबारा किले तक नहीं पहुंचाया जा सका. आज यह ऐतिहासिक धरोहर नरवर थाने में सुरक्षित है, लेकिन इसकी पहचान अब भी किले की प्राचीर से जुड़ी हुई है.

2011 में चोरी हुई थी ऐतिहासिक तोप

नरवर किले के इतिहास में वर्ष 2011 एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में दर्ज है. इसी वर्ष किले में स्थापित ऐतिहासिक तोप को अज्ञात चोर चुराकर ले गए थे. मामले की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और कुछ समय बाद इस बेशकीमती धरोहर को बरामद कर लिया. हालांकि बरामदगी के बाद सबसे बड़ी चुनौती इसे दोबारा किले तक पहुंचाने की रही, जो आज तक पूरी नहीं हो सकी. लगभग डेढ़ दशक बीत जाने के बावजूद यह तोप अब भी अपने मूल स्थान से दूर है.

Narwar Fort Historical Cannon: थाने में रखी तोप

Narwar Fort Historical Cannon: थाने में रखी तोप

तोप नहीं, इतिहास का जीवंत दस्तावेज

इतिहासकारों के अनुसार यह तोप केवल युद्ध में इस्तेमाल होने वाला हथियार नहीं, बल्कि अपने समय का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज भी है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस पर देवनागरी और फारसी दोनों लिपियों में शिलालेख अंकित हैं. यही कारण है कि इसका ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है.

देवनागरी में दर्ज है राजा जयसिंह का उल्लेख

तोप पर देवनागरी लिपि में राजा जयसिंह का नाम, निर्माण काल, वजन और कुछ धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख होने की बात सामने आती है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे इस तोप का संबंध राजस्थान के कछवाहा राजवंश और सवाई जयसिंह के शासनकाल से जुड़ता है. यह जानकारी उस दौर की सैन्य और राजकीय व्यवस्था के महत्वपूर्ण प्रमाण के रूप में देखी जाती है.

फारसी शिलालेख भी बताते हैं इतिहास

तोप पर फारसी भाषा में भी कई पंक्तियां खुदी हुई हैं. मुगल काल में फारसी प्रशासन और सैन्य व्यवस्था की प्रमुख भाषा थी. ऐसे में माना जाता है कि इन शिलालेखों में तोप निर्माण करने वाले कारीगर, शाही तोपखाने या किसी सैन्य अभियान से जुड़ी जानकारियां अंकित हो सकती हैं. इतिहासकारों के अनुसार एक ही तोप पर देवनागरी और फारसी का होना उस समय राजपूत और मुगल संस्कृति तथा तकनीकी सहयोग का अद्भुत उदाहरण है.

मालखाने में नहीं, थाने में सम्मान के साथ सुरक्षित

आमतौर पर पुलिस द्वारा बरामद वस्तुओं को मालखाने में रखा जाता है, लेकिन नरवर पुलिस ने इस तोप के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए अलग व्यवस्था की है. यह तोप किसी बंद कमरे में नहीं रखी गई है. इसे थाने परिसर में सुरक्षित घेरे के भीतर स्थापित किया गया है, जहां आने वाले लोग इसे देख सकते हैं. स्थानीय नागरिकों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि पुलिस ने इस धरोहर को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

Narwar Fort Historical Cannon: नरवर किले में रखीं तोप

Narwar Fort Historical Cannon: नरवर किले में रखीं तोप

किले तक पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा उसका वजन

इतिहासकार और स्थानीय नागरिक मानते हैं कि तोप का वास्तविक स्थान नरवर किले की प्राचीर ही है. हालांकि किले तक पहुंचने वाला मार्ग बेहद संकरा है और तोप का वजन काफी अधिक है. यही कारण है कि वर्षों बाद भी इसे वापस किले पर स्थापित नहीं किया जा सका. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आधुनिक क्रेन, हाइड्रोलिक मशीनों और विशेष तकनीक का उपयोग किया जाए तो इस धरोहर को उसके मूल स्थान तक पहुंचाया जा सकता है.

नई चुनौती बनी दूसरी चोरी हुई तोप

नरवर की ऐतिहासिक धरोहरों से जुड़ी चुनौती यहीं खत्म नहीं होती. हाल ही में किले से एक अन्य ऐतिहासिक तोप चोरी होने की घटना ने प्रशासन, पुलिस और पुरातत्व विभाग की चिंता बढ़ा दी है. बताया जा रहा है कि इस मामले में अभी तक कोई बड़ा सुराग हाथ नहीं लगा है. पुलिस लगातार जांच कर रही है और ऐतिहासिक महत्व की इस धरोहर को चुराने वालों तक पहुंचने का प्रयास जारी है.

धरोहर को घर लौटाने की मांग तेज

स्थानीय इतिहासकारों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों का कहना है कि बरामद तोप को अब उसके असली स्थान नरवर किले में स्थापित किया जाना चाहिए. उनका मानना है कि इससे न केवल किले की ऐतिहासिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा. फिलहाल 15 साल से थाने में सुरक्षित रखी गई राजा जयसिंह की यह 'शत्रु संघार' तोप अपने घर लौटने का इंतजार कर रही है. अब सभी की निगाहें पुरातत्व विभाग और प्रशासन पर हैं कि आखिर कब यह ऐतिहासिक धरोहर फिर से नरवर किले की प्राचीर पर अपनी पुरानी शान के साथ दिखाई देगी.

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