अजब-गजब मध्य प्रदेश में अब एक ऐसा कथित एथेनॉल घोटाला सामने आया है, जिसने पूरे सरकारी तंत्र को हिलाकर रख दिया है. हद यह है कि इस खेल में शामिल घोटालेबाज सरकार से ही भारी सब्सिडी पर चावल खरीदकर वापस उसे नए नाम से सरकार को ही बेच रहे थे. सबसे बड़ी परेशानी और चिंता की बात यह है कि यह कोई सामान्य अनाज नहीं, बल्कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषण के लिए तैयार किया गया फोर्टिफाइड चावल था, जिसे मुनाफाखोरी के एक संगठित नेटवर्क ने अपनी तिजोरियां भरने का जरिया बना लिया. बालाघाट में एक ट्रक की धरपकड़ से शुरू हुआ यह मामला अब करीब 50 लाख क्विंटल सरकारी चावल की हेराफेरी और 1160 करोड़ रुपये के संभावित घोटाले की विस्तृत जांच तक पहुंच गया है.
एक ट्रक की संदिग्ध मौजूदगी ने खोली महाघोटाले की परतें
NDTV की जांच में सामने आया है कि इस पूरे कथित घोटाले की शुरुआत 3 जून 2026 को हुई. अधिकारियों को एक गोपनीय सूचना मिली थी कि सरकारी चावल से भरे तीन ट्रक बालाघाट जिले के भारतीय खाद्य निगम (FCI) के नवेगांव गोदाम से छिंदवाड़ा के बोरगांव स्थित एवीजे एग्रीको प्राइवेट लिमिटेड के एथेनॉल संयंत्र के लिए रवाना हुए थे. इनमें से एक ट्रक, जिसका नंबर सीजी 04 जेडी 3147 था, उसमें 490 बोरी सरकारी चावल लदा था जिसका कुल वजन 242.55 क्विंटल था.

छिंदवाड़ा के बोरगांव स्थित एवीजे एग्रीको प्राइवेट लिमिटेड के एथेनॉल संयंत्र के लिए रवाना हुए ये वही ट्रक है जिसमें चावल का घपला हुआ है.
Photo Credit: अनुराग द्वारी
कागजों पर तो यह चावल देश की हरित ईंधन नीति को मजबूत करने के लिए एथेनॉल बनाने के वास्ते भेजा गया था, लेकिन यह ट्रक अपने निर्धारित एथेनॉल प्लांट तक कभी पहुंचा ही नहीं. खाद्य विभाग, राजस्व विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम ने जब इसकी तलाश शुरू की, तो जो सच सामने आया उसने जांच की दिशा ही बदल दी. यह सरकारी ट्रक हाईवे या किसी गैराज में नहीं, बल्कि वारासिवनी स्थित एक निजी मिल 'संचेती राइस मिल' के परिसर के भीतर 500 मीटर अंदर खड़ा मिला.
मौसम और भोजन का बहाना बना संदेहास्पद
जांच अधिकारियों ने जब ट्रक के चालक से पूछताछ की, तो उसने दावा किया कि वह सिर्फ भोजन करने अपने घर चला गया था. वहीं दूसरी तरफ राइस मिल के मालिकों ने कहानी गढ़ी कि अचानक बारिश शुरू होने के कारण ट्रक को मिल परिसर के भीतर सुरक्षित खड़ा किया गया था. हालांकि, जांच अधिकारियों को ये दोनों ही जवाब पूरी तरह संदेहास्पद और मनगढ़ंत लगे. जांच के आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, उस वक्त न तो कोई तकनीकी खराबी थी और न ही मौसम की परिस्थितियां ऐसी थीं कि तेज बारिश से बचने के लिए ट्रक को एक निजी मिल के भीतर इतनी दूर तक ले जाना जरूरी हो. अधिकारियों ने माना कि ट्रक के वहां खड़े होने का कोई भी वैध या कानूनी कारण नहीं था. यहीं से प्रशासन को अंदेशा हुआ कि यह केवल परिवहन नियमों का सामान्य उल्लंघन नहीं है, बल्कि सरकारी चावल को एथेनॉल संयंत्र तक पहुंचने से पहले ही निजी मिलों में खपाने का एक बहुत बड़ा संगठित नेटवर्क है.

एक ही चावल के लिए सरकार ने कैसे कर दिया दो बार भुगतान
NDTV के हाथ जो दस्तावेज लगे हैं उसके मुताबिक इस पूरे खेल की कार्यप्रणाली बेहद चौंकाने वाली है. केंद्र सरकार की नीति के तहत पेट्रोल में मिश्रण के लिए एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसके लिए सरकारी गोदामों में रखे अतिरिक्त चावल को रियायती दरों पर एथेनॉल निर्माताओं को दिया जाता है. सरकारी एजेंसियां इस चावल की खरीद, परिवहन और भंडारण पर करीब 3900 से 4000 रुपये प्रति क्विंटल तक का भारी खर्च उठाती हैं, लेकिन एथेनॉल संयंत्रों को यही चावल महज 2320 रुपये प्रति क्विंटल की भारी सब्सिडी वाली दर पर आवंटित किया जाता है. जांच एजेंसियों को गहरा संदेह है कि इसी रियायती व्यवस्था का फायदा उठाकर एथेनॉल संयंत्रों को आवंटित करीब 5 लाख मीट्रिक टन (50 लाख क्विंटल) सरकारी चावल का एक बड़ा हिस्सा कभी एथेनॉल में बदला ही नहीं गया. इस चावल को पहले चोरी-छिपे निजी राइस मिलों तक पहुंचाया गया और फिर मिलर्स ने इसी चावल को 'कस्टम मिल्ड राइस' (CMR) का नया नाम देकर दोबारा ऊंचे दामों पर सरकारी गोदामों में जमा कर दिया. यानी सरकार ने जिस चावल को सस्ते में एथेनॉल के लिए बेचा, उसी चावल को दोबारा महंगे दामों पर खुद ही खरीद लिया.

कुपोषितों के निवाले पर मुनाफाखोरों का डाका
इस पूरे मामले की सबसे गंभीर और संवेदनशील परत यह है कि इस हेराफेरी के केंद्र में मौजूद अनाज कोई साधारण चावल नहीं था. यह बकायदा 'फोर्टिफाइड राइस' था, जिसे केंद्र सरकार के विशेष पोषण कार्यक्रम के तहत आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी 12 मिलाकर तैयार किया जाता है. इस विशेष योजना का एकमात्र उद्देश्य देश के गरीब परिवारों, मासूम बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं में एनीमिया व कुपोषण जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ना है. जिस फोर्टिफाइड चावल को समाज के सबसे कमजोर और जरूरतमंद तबके की सेहत सुधारने के लिए राशन दुकानों तक पहुंचना था, उसे नियमों की धज्जियां उड़ाकर बाजार में घुमाया जाता रहा. 50 लाख क्विंटल के इस पूरे आवंटित चावल के अनुमानित मूल्य और सब्सिडी के गणित को देखा जाए, तो यह कथित घोटाला करीब 1160 करोड़ रुपये का बैठता है. हालांकि जांच एजेंसियां अभी इस बात की अंतिम पड़ताल कर रही हैं कि कुल आवंटित चावल में से कितने हिस्से की इस तरह से दोबारा री-साइकिलिंग कर धोखाधड़ी की गई.
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कलेक्टर की गोपनीय रिपोर्ट से मंचा हड़कंप, उच्च स्तरीय जांच शुरू
मामले की गंभीरता को देखते हुए बालाघाट के कलेक्टर मृणाल मीणा ने 10 और 11 जुलाई 2026 को दो बेहद गोपनीय पत्र वरिष्ठ अधिकारियों को भेजे. इनमें से एक पत्र भारतीय खाद्य निगम (FCI) को और दूसरा मध्य प्रदेश सरकार को भेजा गया है. इन गोपनीय पत्रों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि जिला प्रशासन इसे केवल एक ट्रक की मामूली हेराफेरी के रूप में नहीं देख रहा है. कलेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि एथेनॉल नीति के तहत जारी किया गया चावल अपने निर्धारित प्लांट तक पहुंचने से पहले ही रास्ते में मोड़ दिया गया. उन्होंने इस बात की एक व्यापक और उच्च स्तरीय जांच की सिफारिश की है कि एथेनॉल योजना के तहत जारी होने वाला लाखों क्विंटल चावल वास्तव में उन फैक्ट्रियों तक पहुंच भी रहा है या नहीं. इस मामले में अब एथेनॉल संयंत्र संचालकों, राइस मिलर्स, ट्रांसपोर्टरों और सरकारी तंत्र के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत की गहराई से पुलिस, राज्य सरकार और एफसीआई द्वारा संयुक्त जांच की जा रही है.लेकिन एक बात स्पष्ट है- बालाघाट में पकड़ा गया 242.55 क्विंटल चावल से भरा ट्रक अब केवल एक ट्रक नहीं रहा. वह एक ऐसी कथित व्यवस्था का पहला सुराग बन गया है, जिसके तार 1160 करोड़ रुपये के सरकारी चावल, एथेनॉल संयंत्रों, निजी मिलों और सरकारी गोदामों तक फैले हो सकते हैं.
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