क्या आपने कभी सुना है कि पुलिस की फाइलों में दर्ज कोई मोस्ट वांटेड अपराधी दिल्ली के चमचमाते ऑटोमोबाइल शो-रूम में नकदी से भरा बैग लेकर पहुंचे और एक-दो नहीं, बल्कि एक साथ 22 नई-नवेली जीपें खरीदे और बड़े आराम से बीहड़ की ओर रवाना हो जाए? चंबल के दस्यु इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि डाकू मोहर सिंह की ठसक और रईसी की असली दास्तान है. चंबल के इतिहास में डकैतों के खौफ और उनकी रईसी के कई किस्से दर्ज हैं, लेकिन डाकू मोहर सिंह की कहानी सबसे अलग और हैरान करने वाली है. एक दौर में 2 लाख रुपये का इनामी रहे मोहर सिंह की चंबल इलाके में अपनी एक समानांतर सरकार और 'अदालत' चलती थी, जहां गरीबों के हक में कथित तौर पर 'ऑन-द-स्पॉट' इंसाफ होता था. ऐसा कहा जाता है कि डकैत मोहर सिंह ने 250 से ज्यादा अपहरण किए थे और दर्जनों हत्याएं की थी. उसने जेल की सजा भी काटी औऱ बकायदा चुनाव लड़कर नगर पंचायत अध्यक्ष भी बना. आइए, 'चंबल डायरी' की इस दूसरी किस्त में ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुराने संस्मरणों के झरोखे से जानते हैं बीहड़ के उस बागी की पूरी इन-डेप्थ कहानी, जिसने इंदिरा गांधी सरकार तक की नींद उड़ा दी थी.
भिंड का वो गांव, जहां पैदा हुआ था चंबल का ये बागी
अब बात को शुरु से शुरु से करते हैं. ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स और चंबल के दस्यु इतिहास पर लिखे गए संस्मरणों के अनुसार, मोहर सिंह का जन्म मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मेहगांव क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक छोटे से गांव 'जदौली' में हुआ था. एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे मोहर सिंह का शुरुआती जीवन बेहद साधारण था. वह खेती-किसानी और पशुपालन के जरिए अपना जीवन यापन कर रहा था. उस दौर के स्थानीय बुजुर्गों और जानकारों के संस्मरण बताते हैं कि मोहर सिंह स्वभाव से बहुत आक्रामक नहीं था, लेकिन स्वाभिमान के मामले में वह किसी के आगे झुकना पसंद नहीं करता था. चंबल की मिट्टी की तासीर ही कुछ ऐसी है कि वहां आत्मसम्मान पर चोट लगते ही लोग कानून अपने हाथ में ले लेते हैं और मोहर सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

डाकू मोहर सिंह ने 1982 की एक फिल्म 'चंबल के डाकू' में अभिनय भी किया था
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कैसे डकैत बन गया एक सीधा-साधा किसान?
चंबल के सर्वोदय आंदोलन के दस्तावेजों और पुराने पुलिस रिकॉर्ड्स के मुताबिक, मोहर सिंह के बागी (डकैत) बनने के पीछे कोई शौक नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय था. बताया जाता है कि गांव में ही उसकी पुश्तैनी जमीन को लेकर कुछ रसूखदार और दबंग लोगों से विवाद शुरू हो गया था. दबंगों ने मोहर सिंह की जमीन पर जबरन कब्जा करने की कोशिश की और जब उसने इसका विरोध किया, तो उसे और उसके परिवार को प्रताड़ित किया जाने लगा. मोहर सिंह ने पहले कानून और पुलिस का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उस दौर की प्रशासनिक व्यवस्था में रसूखदारों के आगे उसकी एक न सुनी गई. जब न्याय के सारे रास्ते बंद हो गए और आत्मसम्मान पर बन आई, तो मोहर सिंह ने बदला लेने की ठान ली. उसने गांव के दबंगों पर हथियार उठा लिया और सीधे चंबल के बीहड़ों में कूद गया, जहां वह कानून की नजर में 'डकैत' और स्थानीय लोगों की नजर में 'बागी' कहलाया.
दिल्ली के शो-रूम में जब डाकू ने बिछा दी थी नोटों की गड्डियां
बीहड़ में कदम रखने के बाद मोहर सिंह ने तेजी से अपना गैंग बढ़ाया. मध्य प्रदेश पुलिस के रिकॉर्ड्स को खंगालें तो डाकू मोहर सिंह को अपनी रईसी, रसूख और ठसक के लिए जाना जाता था. उससे जुड़ा सबसे चर्चित किस्सा दिल्ली के एक नामी ऑटोमोबाइल शो-रूम का है.
मोहर सिंह के आदमियों ने बिना किसी मोल-तोल या कागजी देरी के सीधे नकद में पूरा भुगतान किया और टेबल पर नोटों की गड्डियां बिछा दीं. ऐतिहासिक दस्तावेज गवाह हैं कि एक साथ 22 जीपों का यह विशाल काफिला जब दिल्ली की सड़कों से गुजरता हुआ चंबल के बीहड़ों की तरफ रवाना हुआ, तो उसने खूब सुर्खियां बटोरी थी.
बीहड़ में लगती थी मोहर सिंह की 'समानांतर अदालत'
चंबल के इतिहास पर आधारित पुरानी केस स्टडीज के मुताबिक, मोहर सिंह सिर्फ अपनी बंदूकों और खौफ के दम पर राज नहीं करता था, बल्कि उसने चंबल के सुदूर इलाकों में अपनी एक समानांतर सरकार और बाकायदा एक अदालत कायम कर रखी थी. उस दौर के ग्रामीण परिवेश के दस्तावेज बताते हैं कि तब गरीब ग्रामीणों का सरकारी व्यवस्था और अदालती चक्करों की लंबी औपचारिकता से भरोसा उठ चुका था. ऐसे में मोहर सिंह के बीहड़ वाले गुप्त ठिकानों पर बकायदा 'अदालत' सजाई जाती थी.
मोहर सिंह दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर पूरे मामले की गंभीरता से सुनवाई करता था और कानून की लंबी पेचीदगियों के बिना 'ऑन-द-स्पॉट' (तुरंत) अपना फैसला सुना देता था.
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गरीबों के लिए मसीहा और 'रॉबिनहुड' की छवि
स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, मोहर सिंह की इस बीहड़ वाली अदालत का फैसला अंतिम और पत्थर की लकीर माना जाता था, जिसे टालने या चुनौती देने की हिम्मत उस पूरे इलाके में किसी में नहीं थी. इन रिकॉर्ड्स में सबसे खास बात यह दर्ज है कि उसकी अदालत में अक्सर उन सामंतों, जमींदारों और सूदखोरों को बेहद कड़ी सजा मिलती थी जो गरीब किसानों और लाचार मजदूरों का शोषण करते थे. मोहर सिंह अमीरों और धनवानों को लूटता जरूर था, लेकिन उस लूटी हुई दौलत का एक बहुत बड़ा हिस्सा वह गरीबों की बेटियों की शादी करवाने, बीमारों के इलाज और बेसहारा बुजुर्गों की मदद में खर्च कर देता था. यही वजह है कि चंबल के पुराने इतिहासकार अपनी किताबों में लिखते हैं कि आम जनमानस में उसकी छवि किसी खूंखार अपराधी की नहीं, बल्कि एक 'रॉबिनहुड' जैसी बन गई थी, जो लोगों को तुरंत और बिना खर्च के न्याय दिलाता था.
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मोहर सिंह ने अपने पूरे गैंग यानी 140 डाकुओं के साथ जयप्रकाश नारायण के सामने साल 1972 में सरेंडर किया था.
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जयप्रकाश नारायण के सामने ऐतिहासिक आत्मसमर्पण
60 और 70 के दशक के सरकारी रिकॉर्ड्स बताते हैं कि मोहर सिंह का प्रभाव और खौफ इस कदर बढ़ चुका था कि मध्य प्रदेश सरकार ने उस पर उस जमाने में 2 लाख रुपये का भारी-भरकम आधिकारिक व्यक्तिगत इनाम घोषित कर रखा था, जो उस दौर के हिसाब से देश का सबसे बड़ा इनाम था.
बिहार विधान परिषद की पत्रिका 'साक्ष्य'जो जेपी के संस्मरण के बारे में बताती है उसके मुताबिक जब मोहर सिंह ने सरेंडर किया तो उसके गिरोह के सदस्यों की संख्या 140 थी.तब जयप्रकाश नारायण ने कहा था- मैं ये देखने को तैयार नहीं हूं कि मेरे सामने आत्म समर्पण करनेवाले किसी बागी को फांसी दी जाए. आपमें से हर एक की जान मेरी जान के बराबर है. अगर किसी को फांसी दी गई तो मैं उपवास करके मर जाउंगा. बहरहाल जेल में अपनी तय सजा काटने के बाद मोहर सिंह समाज की मुख्यधारा में लौट आया. बाद के सालों में उसने स्थानीय निकाय की राजनीति में कदम रखकर लोकतांत्रिक तरीके से समाज सेवा का रास्ता चुना. वे भिंड जिले में मेहगांव नगर पंचायत के अध्यक्ष भी चुने गए. मई 2020 में 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. लेकिन उनकी रईसी और बीहड़ की समानांतर अदालत के अनोखे किस्से आज भी चंबल के इतिहास का एक बेहद दिलचस्प हिस्सा हैं.
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